Sunday, 7 August 2016

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वाणी | सुमित्रानंद पन्त | कविता | Vani | Sumitranand Pant | Hindi Poem

"Poet wants to dress his speech with the ornaments of words in such a way that it can transform the world."
"कवि अपनी वाणी को शब्दों के आभूषण से अलंकृत कर संसार का रूपांतरण करना चाहता है| मनुष्य के उर के नि:शब्द द्वार को खोलना चाहता है |"            
||वाणी||

            तुम वहन कर सको जन-मन में मेरे विचार,
            वाणी मेरी, चाहिए   तुम्हें   क्या   अलंकार !

भव-कर्म आज युग की स्थितियों से है पीड़ित,
जग का रूपान्तर भी जनैक्य    पर अवलंबित,

         तुम रूप कर्म से मुक्त, शब्द के पंख मार,
         कर सको सुदूर मनोनभ में जन के विहार,
            वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या   अलंकार !

चित शून्य---आज जग, नव निनाद से हो गुंजित 
मत जड़---उसमें नव स्थितियों के गुण हो जागृत

            तुम जड़ चेतन की    सीमओं   के   आर  पार 
            झंकृत भविष्य का सत्य कर सको स्वराकार,
            वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या अलंकार !

युग कर्म शब्द, युग रूप शब्द, युग सत्य शब्द,
शब्दित कर  भावी  के सहस्त्र  शत  मूक शब्द,

            ज्योतित कर जन मन के जीवन का अंधकार,
            तुम खोल सको मानव   उर के निःशब्द द्वार,
            वाणी मेरी,   चाहिए   तुम्हें    क्या   अलंकार !


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Sunday, 29 May 2016

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इक्केवाला-२ | विश्वम्भर नाथ शर्मा 'कौशिक' | कहानी | Ikkewala-2 | Vishwambhar Nath Sharma 'Kaushik | Hindi Story

     कहानी के इस भाग में श्यामलाल अपनी आत्म-कथा सुनाता है जिसमें लेखक ने उसके शीलवान  चरित्र का चित्रण किया है | 

 'मैं अगरवाला बनिया हूँ । मेरा नाम श्यामलाल है । मेरा जन्म-स्थान मैनपूरी है । मेरे पिता व्यापार करते थे । जिस समय मेरे पिता की मृत्यु हुई, उस समय मेरी उम्र पंद्रह साल की थी । पिता के मरने पर घर-गृहस्थी का सारा भार मेरे ऊपर पड़ा । मैंने एक वर्ष तक काम-काज चलाया, पर मुझे व्यापार का अनुभव न था, उस कारण घाटा हुआ और मेरा सब काम  बिगड़ गया | अंत को और कोई उपाय न देखे मैंने वहीं एक धनी आदमी के यहाँ नौकरी कर ली | उस समय मेरे परिवार में मेरी माता और एक छोटी बहन थी | जिसके यहाँ मैंने नौकरी की थी, वह तो थे मालदार, परन्तु बड़े कंजूस थे | ऊपर से देखने में वह एक मामूली हैसियत के आदमी दिखाई पड़ते थे; परन्तु लोग कहते थे कि उनके पास एक लाख के लगभग नकद रुपया है | उस समय मैंने लोगों की बात पर विश्वास नही किया था; क्योंकि घर की हालत देखने से किसी को यह विश्वास नहीं हो सकता कि उनके पास इतना रुपया होगा | उनकी उम्र चालीस से ऊपर थी | उन्होंने दूसरी शादी की थी और उनकी पत्नी की उम्र बीस वर्ष के लगभग थी | पहली स्त्री से उनके एक लड़का था | वह जवान था और उसका विवाह इत्यादि सब हो चूका था | उसका नाम शिवचरणलाल था | पहले तो वह अपने पिता के पास ही रहता था; परन्तु जब पिता  ने दूसरा विवाह किया, तो वह नाराज़ होकर अपनी स्त्री सहित फरुर्खाबाद चला गया | वहां उसने एक दूकान कर ली और वहीं रहने लगा |'
     'उन दिनों मुझे कसरत करने का बड़ा शौक था, इसलिए मेरा बदन बहुत अच्छा बना हुआ था | कुछ दिनों पश्चात् मेरी मालकिन मेरी बहुत खातिर करने लगी | खूब मेवा-मिठाई खिलाती थीं और महीने में दस-बीस रूपये नकद दे देती थी | इस कारण दिन बड़ी अच्छी तरह कटने लगे | मैं मालकिन के खातिर करने का असली मतलब उस समय नहीं समझा | मैंने जो समझा, वह यह था कि मेरी सेवा से प्रसन्न होकर तथा मुझे गरीब समझकर वह ऐसा करती हैं | आखिर जब एक दिन उन्होंने मुझे एकांत में बुलाकर छेड़-छाड़ की, तब मेरी आंखे खुली | मुझे आरम्भ से ही इन कामों से नफ़रत थी | मैं इन बातों को जानता भी नहीं था | न कभी ऐसी संगति ही में रहा था जिसमे इन बातो का ज्ञान प्राप्त होता | मैं उस समय जो जानता था वह यह था कि आदमी को खूब कसरत करना चाहिए और स्त्रियों से बचना चाहिए | जब मालकिन ने छेड़-छाड़ की , तो मेरा कलेजा धड़कने लगा | मुझे ऐसा मालूम हुआ, कि वह एक चुड़ैल है और मुझे भक्षण करना चाहती है |'
     इक्केवाले की इस बात पर मेरे साथी मनोहरलाल बहुत हँसे | बोले---तुम तो बिलकुल बुद्धू थे जी !
     श्यामलाल बोला---'अब जो समझिये, परुन्तु बात ऐसी ही थी | खैर, मैं अपना हाथ छुड़ाकर उनके सामने से भाग आया | अब मुझे उनके सामने जाते डर मालूम होने लगा | यही खटका लगा रहता था, कि कही किसी दिन फिर न -पकड़ ले | तीन-चार दिन के बाद वही हुआ | उन्होंने अवसर पाकर फिर मुझे घेरा | उस दिन मैंने उनसे साफ़-साफ़ कह दिया, कि यदि वह ऐसी हरकत करेंगी, तो मैं मालिक से कह दूंगा | बस, उसी दिन से मेरी खातिर बंद हो गई | केवल खातिर बंद रह जाती, वहां तक गनीमत थी; परन्तु अब उन्होंने मुझे तंग करना आरम्भ कर दिया | बात-बात पर डांटती थी | कभी मालिक से शिकायत कर देती थी | आखिर जब एक दिन मालिक ने मुझे मालकिन के कहने से बहुत डांटा, तो मैंने उन्हें अलग ले जाकर कहा---लालाजी, मेरा हिसाब कर दीजिये, मैं अब आपके यहाँ नौकरी नहीं करूँगा | लालाजी लाल-पीली आँखे करके बोले---एक तो कसूर करता है और उसपर हिसाब मांगता है ? मुझे भी तैश आ गया | मैंने कहा---कसूर किस ससुरे ने किया है ? लालाजी बोले---तो क्या मालकिन झूठ कहती है ? मैंने कहा---बिल्कुल झूट ! लालाजी ने कहा---तेरे से उनकी शत्रुता है क्या ? मैंने कहा---हाँ शत्रुता है | उन्होंने पुछा---क्यों ? मैंने कहा---अब आपसे क्या बताऊं | आप उसे भी झूठ मानेंगे | इसलिए सबसे अच्छी बात यही है कि मेरा हिसाब कर दीजिये | मेरी बात सुनकर लाला के पेट में खलबली मची | उन्होंने कहा---पहले यह बता कि बात क्या है ? मैंने कहा---उसके कहने से  कोई फायदा नहीं, आप मेरा हिसाब दे दीजिए | परन्तु लाला मेरे पीछे पड़ गए | मैंने विवश होकर सब हाल बता दिया | मुझे भय था, कि लाला को मेरी बात पर विश्वाश न होगा, पर ऐसा नहीं हुआ |  लाला ने मेरी पीठ पर हाथ फेरकर कहा---शाबास श्यामलाल, मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ | अब तुम आनंद से रहो, तुम्हारी तरफ कोई आँख नहीं देख सकेगा | बस उस दिन से मैं निर्द्वन्द्व हो गया | अब अधिकतर मैं मालिक के पास बाहर ही रहने लगा, भीतर कम जाता था | उसके पश्चात् भी मालकिन ने मेरे निकलवाने के लिए चेष्टा की, पर लाला ने उनकी एक न सुनी | आखिर वह भी हारकर बैठ गयी |'
     इस प्रकार एक वर्ष और बीता | इस बीच में लाला के एक रिश्तेदार- जो उनके चचेरे भाई होते थे---बहुत आने-जाने लगे | उनकी उम्र पच्चीस-छब्बीस वर्ष के लगभग होगी | शरीर के मोटे-ताजे और तंदरुस्त आदमी थे | पहले तो मुझे उनका आना-जाना कुछ नही खटका, पर जब उनका आना-जाना हद से अधिक बढ़ गया और मैंने देखा कि वह मालकिन के पास घंटों बठे रहते हैं तो मुझे संदेह हुआ, कि हो न हो दाल में कुछ कला अवश्य है | लालाजी अधिकत दुकान में रहने के कारण यह बात न जानते थे | घर का कहार भी मालकिन से मिला हुआ मालूम होता था, इसलिए वह भी चुप्पी साधे था | एक मै ही ऐसा था, जिसके द्वारा लाला को यह खबर मिल सकती थी | अंत में मैंने इस रहस्य का पता लगाने पर कमर बाँधी और एक दिन अपनी आँखों उनकी पापमयी लीला देखी | बस उसी दिन मैंने लाला को खबर कर दी | लाला उस बात को चुपचाप पी गए | आठ-दस रोज बाद लाला ने मुझे बुलाकर कहा---श्यामलाल, तेरीबात ठीक निकली, आज मैंने भी देखा | जिस दिन तूने कहा था, उसी दिन से मैं इसकी टोह में था---आज तेरी बात की सत्यता प्रमाणित हो गई | अब बता क्या करना चाहिए ? मैंने कहा---मै क्या बताऊँ, आप जो उचित समझे, करें |'
     'लाला ने पूछा---तेरी क्या राय है ? मैंने इस उम्र में विवाह करके बड़ी भूल की; पर अब इसका उपाय क्या है ? मैंने कहा---अपने भाई साहब का आना-जाना बंद कर दीजिये, यही उपाय है और हो ही क्या सकता हा ? लाला ने सोचकर कहा---हाँ, यही ठीक है | जी में तो आता है कि इस औरत को निकाल बाहर करूँ, पर इसमें बड़ी बदनामी होगी | लोग हँसेंगे कि पहले तो विवाह किया, फिर निकाल दिया |'
     'मैंने कहा---हाँ, यह तो आपका कहना ठीक है | बस, उनका आना जाना बंद कर दीजिये, अतएव उसी दिन से यह हुकुम लग गया, कि लाला की अनुपस्थिति में बाहर का कोई आदमी---चाहे रिश्तेदार हो, चाहे कोई हो---अंदर न जाने पाए | और यह काम मेरे सुपुर्द किया गया | उस दिन से मैंने उन्हें नहीं धंसने दिया | इसपर उन्होंने मुझे प्रलोभन भी दिए, धमकी भी दी, पर मैंने एक न सुनी | मालकिन ने भी बहुत कुछ कहा-सुनाया, खुशामद की, पर मै जरा भी न पसीजा | कहरवा भी बोला---तुमसे क्या मतलब है, जो होता है, होने दो | मैंने उससे कहा---सुनता है बे, तू तो पक्का नमकहराम है, जिसका नामक खाता हिया, उसी के साथ दगा करता है | खैरियत इसी में है कि चुप रह, नही तो तुझे भी निकाल बाहर करूँगा |'
     ' यह सुनकर कहारराम चुप हो गए |'
      'थोड़े दिन बाद लाला के उन रिश्तेदार ने आना-जाना बिल्कुल बंद कर दिया | अब वह लाला के पास भी नहीं आते थे | मैंने भी सोचा, चलो अच्छा हुआ, आँख फूटी पीर गई |'
     'इसके छ: महीने बाद एक दिन लाला को हैजा हो गया मैंने बहुत दौड़-धूप की, इलाज इत्यादि कराया; पर कोई फायदा न हुआ | लाला जी समझे गए कि अंत समय निकट है; अतएव उन्होंने मुझे बुलाकर कहा---श्यामलाल, मै तुझे अपना नौकर नहीं, पुत्र समझता हूँ; इसलिए मैं अपनी कोठरी की ताली तुझे देता हूँ | मेरे मरने पर ताली मेरे लड़के को दे देना और जब तक वह न आ जाय, तब तक किसी को कोठरी न खोलने देना | बस, तुझेसे मै इतनी अंतिम सेवा चाहता हूँ |'
     'मैंने कहा---ऐसा ही होगा, चाहे मेरे प्राण ही क्यों न चले जायँ, पर मै इसमें अंतर न पड़ने दूंगा | इसके पश्चात् उन्होंने मुझे पाच हजार रूपये नकद दिए और बोले---यह लो, मैं तुम्हे देता हूँ | मैं लेता न था | पर उन्होंने कहा---तू यदि न लेगा, तो मुझे दुःख होगा, अतएव मैंने ले लिए | इसके चार घंटे बाद उनका देहांत हो गया | उनके लड़के को उनके मरने के तीन घंटे पहले तार दे दिया गया था | उनके मरने के पांच घंटे बाद वह मैनपुरी पंहुचा था | उनका देहांत रात को आठ बजे हुआ और वह रात के दो बजे के निकट पहुंचा था | लाला के मरने के बाद उनकी स्त्री ने मुझेसे कहा---कोठरी की ताली लाओ | मैंने कहा---ताली तो लाला शिवचरणपाल के हाथ में देने को कह गए हैं, मै उन्ही को दूंगा | उन्होंने कहा---अरे मूर्ख, इससे तुझे क्या मिलेगा | कोठरी खोलकर रूपया निकल ले---मुझे मत दे, तू ले ले, मैं भी तेरे साथ रहूंगी, जहाँ तू चलेगा, तेरे साथ चलूंगी | मैंने कहा---मुझसे न होगा | मैं तुम्हे ले जाकर रखूँगा कहाँ ? दुसरे तुम मेरे उस मालिक की स्त्री हो, जो मुझे अपने पुत्र के समान मानता था | मुझसे यह न होगा, कि तुम्हे अपनी स्त्री बनाकर रखूं |'
     'बाबूजी, एक घंटे तक उसने मुझे समझाया, रोई भी, हाथ भी जोड़े; परन्तु मैंने एक न मानी | आखिर उसने अन्य उपाय न देख अपने देवर अर्थात् उन्ही को बुलाया, जिनका आना-जाना मैंने बंद कराया था | उन्होंने आते ही बड़ा रुआब झाड़ा | मुझे पुलिस में देने की धमकी दी, पर मैं इससे भयभीत न हुआ | तब वह ताला तोड़ने पर आमादा हुए | मैं कोठरी के द्वार पर एक मोटा डंडा लेकर बैठ गया और मैंने उनसे कह दिया कि जो कोई ताला तोड़ने आएगा, पहले मैं उसका सिर तोडूंगा, इसके बाद जो होगा देखा जायगा | बस फिर उनका साहस न हुआ | इस रगड़े-झगड़े में रात के दो बज गए और शिवचरणलाल आ गए | मैंने उनको ताली दे दी और सब हाल बता दिया |
     'बाबूजी, जब कोठरी खोली गई, तो उसमे साठ हजार रूपये नकद निकले | इन रुपयों का हाल लाला के अतिरिक्त और किसी को भी मालूम न था | यदि मैं मालकिन की बात मानकर बीस-पच्चीस हजार रूपये भी निकाल लेता, तो किसी को भी संदेह न होता, पर मेरे मन में इसी बात का विचार एक क्षण के लिए भी पैदा न हुआ | मेरी माँ रोज रामायण पढ़कर मुझे सुनाया करती थीं, और मुझे यही समझाया करती थी कि---बेटा, पाप और बेईमानी से सदा बचना, इससे तुझे कभी दुःख न होगा | उनकी यह बातें मेरे जी में बसी हुई थीं और इसीलिए मैं बच गया | उसके बाद शिवचरणपाल ने भी मुझे एक हजार रुपया दिया | साथ ही उन्होंने यह कहा कि तुम मेरे पास रहो; पर लाला के मरने से और जो अनुभव मुझे हुए थे, उनके कारण मैंने उनके यहाँ रहना उचित न समझा | लाला की तेरही होने के बाद मैंने उनकी नौकरी छोड़ दी | छ: हजार अपने ब्याह में खर्च किये | एक हज़ार लगाकर एक दुकान की और हजार बचाकर रखा; पर दूकान में फिर घाटा हुआ | तब मैंने मैनपुरी छोड़ दी और इधर चला आया | नौकरी करने की इच्छा नही थी, इसलिए मैंने इक्का-घोड़ा खरीद लिया और किराये पर चलाने लगा---तबसे बराबर यही काम कर रहा हूँ | इसमें मुझे खाने-भर को मिल जाता है | अपने आनन्द से रहता हूँ, न किसी के लेने में हूँ, न देने में | अब बताइए, वह बाबू कहते थे कि चार आने पैसे के लिए मै बेईमानी करता हूँ | अब मैं उनसे क्या कहता | यह तो दुनिया है, जो जिसकी समझ में आता है, कहता है | मैं भी सब सुन लेता हूँ | इक्केवाले बदनाम हैं, इसलिए मुझे भी ये बाते सुननी पड़ती हैं |'
     शायमलाल की आत्मकहानी सुनकर मैं कुछ देर तक स्तब्ध रह बैठा रहा | इसके पश्चात् मैंने कहा---'भाई, तुम तो दर्शनीय आदमी हो, तुम्हारे तो चरण छूने को जी चाहता है |'
     शायमलाल हंसकर बोला---'अजी बाबूजी, क्यों काँटों में घसीटते हो ? मेरे चरण और आप छुए---राम ! राम ! मैं कोई साधू थोड़ा ही हूँ |'
     मैंने कहा---'और साधु कैसे होते हैं; उनके कोई सुर्खाव का पर तो लगा होता नही | सच्चे साधू तो तुम्ही हो |' यह सुनकर श्यामलाल हँसने लगा | इसी समय गंगापुर आ गया और हमलोग इक्के से उतरकर अपने निर्दिष्ट स्थान की ओर चल दिए |
     रास्ते में मैंने मनोहरलाल से कहा---'इस संसार में अनेकों लाल गुदड़ी में छिपे पड़े हैं | उन्हें कोई जानता तक नही |'
     मनोहरलाल----'जी हाँ ! और नामधारी ढोंगी महात्मा ईश्वर  की तरह पूजे जाते हैं |'
     बात बहुत पुरानी हो गई है, पता नही, महात्मा शायमलाल अब भी जीवित हों या नहीं, परन्तु अब भी जब कभी मुझे उनका स्मरण हो आता है तो ये उनकी काल्पनिक मूर्ति के चरणों में अपना मस्तक नत कर देता हूँ |

     
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Friday, 6 May 2016

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इक्केवाला-१| विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक' | कहानी | Ikkewala-1 | Vishwambharnath Sharma 'Kaushik' | Hindi Story

     स्टेशन के बाहर मैंने अपने साथी मनोहरलाल से कहा---कोई इक्का मिल जाय तो अच्छा है---'दस मील का रास्ता है |'
     मनोहरलाल बोले---'आइये, इक्के बहुत हैं | उस तरफ खड़े होते हैं |'
     हम दोनों चले | लगभग दो सौ गज चलने के पश्चात देखा, तो सामने एक बड़े वृक्ष के नीचे तीन-चार इक्के खड़े दिखाई दिये | एक इक्का अभी आया था और उस पर से दो आदमी अपना असबाब उतर रहे थे | मनोहरलाल ने पुकारा---'कोई इक्का गंगापुर चलेगा ?'
     एक इक्केवाला बोला---'आइये सरकार, मैं ले चलूँ | कै सवारी है ?'
     'दो सवारी---गंगापुर का क्या लोगे ?'
     जो सब देते हैं, वही आप भी दे दीजियेगा |'
     आखिर कुछ मालूम तो हो ?'
     'दो रुपये का निरख (निर्ख) है |'
     'दो रुपये ?---इतना अधेर |'
     इसी समय जो लोग अभी आये थे, उनमे और उनके इक्केवाले में झगड़ा होने लगा | इक्केवाला बोला---'यह अच्छी रही, वहाँ से डेढ़ रुपया तय हुआ, अब यहाँ बीस ही आने दिखाते हैं !'
     यात्रियों में से एक बोला---'हमने पहले ही ख दिया था कि हम बीस आने से एक पैसा अधिक न देंगे |'
     'मैंने भी तो कहा था, कि डेढ़ रुपये ससे एक पैसा कम न लूँगा |'
     'कहा होगा, हमने सुना ही नहीं |'
     'हाँ, सुना नहीं---ऐसी बात आप काहे को सुनेंगे |'
     'अच्छा तुम्हे बीस आने मिलेंगे---लेना हो तो लो, नहीं अपना रास्ता देखो |'
     इक्केवाला, जो हृष्ट-पुष्ट तथा गौरवर्ण था, अकड़ गया | बोला---'रास्ता देखे, कोई अधेर है ! ऐसे रास्ता देखले लगे, तो बस कमाई कर चुके | बाये हाथ से इधर डेढ़ रुपया रख दीजिये, तब आगे बढ़िएगा | वहाँ तो बोले, अच्छा जो तुम्हारा रेट होगा, वह देंगे, अब यहाँ कहते हैं, रास्ता देखो---अच्छे मिलें !'
     हम लोग यह कथोपकथन सुनकर इक्का करना भूल गए और उनकी बाते सुनने लगे | एक यात्री बड़ी गंभीरतापूर्वक बोला---'देखो जे, यदि तुम भलमनसी से बाते करो, तो दो-चार पैसे हम अधिक दे सकते हैं, तुम गरीब आदमी हो; लेकिन जो झगड़ा करोगे तो एक पैसा न मिलेगा |'
     इक्केवाला किंचित मुस्कराकर बोला---'दो-चार पैसे ! ओफ! ओफ ! आप तो बड़े दाता मालूम होते हैं | जब चार पैसे देते हो, तो चार आने ही क्यों नहीं दे देते ?'
     'चार आने हमारे पासे नहीं हैं |'
     'नहीं है---अच्छी बात है, तो हो आपके पास हो वही दे दीजिये---न हो न दीजिये और ज़रूरत हो तो एकाध रुपया मैं आपको दे सकता हूँ |'
     'तुम बेचारे क्या डोज, चार-चार पैसे के लिए तो तुम झूट बोलते हो और  बेईमानी करते हो |'
     अरे बाबूजी, लाखों रुपये के लिए तो मैंने बेईमानी की नहीं---चार पैसे के लिए बेईमानी करूँगा ? बेईमानी करता तो इस समय इक्का न हाकता होता | खैर, आपको जो देना हो दे दीजिये---नहीं जाइए---मैंने किराया भर पाया |'
     उन्होंने बेश आने निकालकर दिए, इक्केवाले ने चुपचाप ले लिए |
     उस इक्केवाले कका आकर-प्रकार, उसकी बातचीत से मुखे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि अंध इक्केवालों की तरह यह साधारण आदमी नही है | इसमें कुछ विशेषता अवश्य है; अतेव मैंने सोचा कि यदि हो सके, तो गंगापुर इसी इक्के पर चलना चाहिए | यह सोचकर मैंने उससे पुछा---'क्यों भाई गंगापुर चलोगे ?'
     वह बोला---'हाँ ! हाँ ! आइए !'
     'क्या लोगे ?'
     'वही डेढ़ रुपया !'
     मैंने सोचा, अन्य इक्केवाले टी ओ दो रुपये मांगते थे, वह डेढ़ रुपया कहता है, आदमी सच्चा मालूम होता है | वह सोचकर मैंने कहा---'अच्छी बात है, चलो डेढ़ रुपया देंगे |'
     हम दोनों सवार होकर चले | थोड़ी दूर चलने पर मैं पुछा---'वे दोनों कौन थे ?' इक्केवाले ने कहा---'नारायण जाने कौन थे ? परदेशी मालूम होते हैं, लेकिन परले-सिरे के झूठे और बेईमान ! चार आने के लिए प्राण तज दे रहे थे |'
     मैंने पुछा---तो'तो सचमुच तुमसे डेढ़ रुपया ही तय हुआ था ?'
     'और नही क्या आप झूठ समझते हैं ? बाबूजी, यह पेशा ही बदनाम है, आपका कोई कसूर नही | इक्के, तांगेवाले सदा झूठे और बेईमान समझे जाते हैं | और होते भी हैं---अधिकतर तो ऐसे ही होते हैं | इन्हें चाहें आप रूपये की जगह सवा रुपया दीजिये, तब भी संतुष्ट नहीं होते |'
     मैंने पुछा---'तुम कौन जाति हो ?'
     'मैं ? वैश्य सरकार वैश्य हूँ |'
     'अच्छा ! वैश्य होकर इक्का हांकते हो ?'
     'क्यों सरकार, इक्का हाँकना कोई बुरा काम तो है नहीं ?'
     'नही, मेरा मतलब यह नहीं है कि इक्का हाँकना कोई बुरा काम है | मैंने इसलिए कहा कि वैश्य तो बहुधा व्यापार करते हैं |'
     'यह भी तो व्यापार ही है |'
     'हाँ, है तो व्यापार ही |'
     मैंने मन-ही-मन अपनी इस बेतुकी बात पर लज्जित हुआ; अतएव मैंने प्रसग बदलने के लिए पुछा---कितने दिनों से यह काम करते हो ?
     'दो बरस हो गये |'
     'इसके पहले क्या करते थे ?'
     यह सुनकर इक्केवाला गंभीर होकर बोला---'क्या बताऊँ, क्या करता था ?
     उसकी इस बात से तथा यात्रियों से उसने जो बातें कहीं थीं, उनका तारतम्य मिलाकर मैंने सोचा---इस व्यक्ति का जीवन रहस्यमय मालूम होता है | यह सोचकर मैंने उससे पुछा---'कोई हर्ज न समझो तो बताओ |'
     'हर्ज तो कोई नही हिं बाबूजी | पर मेरी बात पर लोगों को विश्वास नहीं होता | इक्केवाले बहुधा परले-सिरे के गप्पी समझे जाते हैं; इसलिए मैं किसी को अपना हाल सुनाता नही |'
     'खैर, मैं उन आदमियों में नही हूँ, यह तुम विश्वास रखो |'
     'अच्छी बात है सुनिए----'
   
   शेष अगले भाग में ....
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Thursday, 28 April 2016

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फूल और कांटे | कविता | कवि: अयोध्या सिंह 'उपाध्याय' | Phool Aur Kante | Hindi Poem | Poet:- Ayodhyaya Singh 'Upadhyaya' |

फूल और कांटे
     'फूल और कांटे' अयोध्या सिंह 'उपाध्याय' जी द्वारा रचित कविता है | इस कविता में कवि ने यह सन्देश देना चाहा है कि किसी का कर्म ही होता है जो उसे महानता के शिखर पर ले जाते हैं | इसमें उसका जन्म या कुल का कोई हाथ नहीं होता | इस बात को स्पष्ट करने के लिए कवि ने फूल और कांटे का चयन किया |
                                               (१) 
हैं जनम लेते जगह में एक ही,
                                        एक ही पौधा उन्हें है पालता |
रात में उनपर चमकता चाँद भी,
                                        एक ही सी चाँदनी है डालता ||
                                             

                                            (२) 
मेघ उनपर है बरसता एक-सा,
                                        एक-सी उनपर हवाएँ हैं बहीं |
पर सदा ही यह दिखाता है समय,
                                        ढंग उनके एक से होते नहीं ||
                                              (३)
छेदकर काँटा किसीकी उँगलियाँ,
                                        फाड़ देता है किसीका वर वसन |
और प्यारी तितलियों का पर कतर,
                                        भौंर का है बेध देता श्याम तन ||
                                               (४)
फूल लेकर तितलियों को गोद में,
                                        भौंर को अपना अनूठा रस पिला |
निज सुगन्धि औ' निराले रंग में,
                                        है सदा देती कली दिल की खिला ||
                                               (५) 
खटकता है एक सबकी आंख में,
                                         दूसरा है सोहता सुर-सीस पर
किस तरह कुल के बड़ाई काम दे,
                                         जो किसीमें हो बड़प्पन की कसर ||
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Tuesday, 26 April 2016

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शत्रु | अज्ञेय | कहानी | Shatru | Agyey | Hindi Story

      'शत्रु' कहानी अज्ञेय जी द्वारा रचित कहानी है जिसमें ज्ञान को भगवान् स्वप्न में दर्शन देते हैं और उसे अपना प्रतिनिधि घोषित करके संसार का पुनर्निर्माण करने के लिए कहते हैं | ज्ञान संसार में जा के विभिन्न समस्याएं देखता है| पर जब भी वह इनका समाधान करने जाता तो नई समस्याएं आ जाती | अंत में हार मानकर वह 
आत्म-हत्या करने जाता है और तभी...
 १  
     ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिए, और कहा---ज्ञान, मैंने तुम्हे अपना प्रतिनिधि बनाकर संसार में भेजा है | उठो, संसार का पुनर्निर्माण करो |
     ज्ञान जाग पड़ा | उसने देखा, संसार अंधकार से पड़ा है और मानव जाति उस अंधकार में पथभ्रष्ट होकर विनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है | वह ईश्वर का प्रतिनिधि है, तो उसे मानव-जाति को पथ पर लाना होगा, उसका नेता बनकर उसके शत्रु से युद्ध करना होगा |
     और वह जाकर चौराहे पर खड़ा हो गया और सबको सुनाकर कहने लगा---मै मसीह हूँ, पैगम्बर हूँ | भगवान का प्रतिनिधि हूँ | मेरे पास तुम्हारे उद्धार के लिए एक संदेश है |
     लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी | कुछ उसकी ओर देख कर हँस पड़ते, कुछ कहते, पागल है, अधिकांश कहते, यह हमारे धर्म के विरुद्ध शिक्षा देता है, नास्तिक है, इसे मारो ! और बच्चे उसे पत्थर मारा करते |
     आखिर तंग आकर वह एक अँधेरी गली में छिपकर बैठ गया, और सोचेने लगा | उसने निश्चय किया कि मानव-जाति का सबसे बड़ा शत्रु है धर्म, उसी से लड़ना होगा |
     तभी पास कहीं से उसने स्त्री के करुण क्रन्दन की आवाज़ सुनी | उसने देखा, एक स्त्री भूमि पर लेटी है, उसके पास एक बहुत छोटा-सा बच्चा पड़ा है, जो या तो बेहोश है या मर चुका है, क्योंकि उसके शरीर में किसी प्रकार की गति नहीं है |
     ज्ञान ने पूछा---बहन, क्यों रोती हो ?
     उस स्त्री ने कहा---मैंने एक विधर्मी से विवाह किया था | जब लोगों को इसका पता चला, तब उन्होंने उसे मार डाला और मुझे निकाल दिया | मेरा बच्चा भूख से मर रहा है |
     ज्ञान का निश्चय और दृढ हो गया | उसने कहा---तुम मेरे साथ आओ, मै तुम्हारी रक्षा करूँगा |---और उसे अपने साथ ले गया |
     ज्ञान ने धर्म के विरुद्ध प्रचार शुरू किया | उसने कहा---धर्म झूठा बंधन है | परमात्मा एक है, अबाध है और धर्म से परे है | धर्म हमे सीमा में रखता है, रोकता है, परमात्मा से अलग रखता है, अतः शत्रु है ?
     लेकिन किसी ने कहा---जो व्यक्ति पराई और बहिष्कृता औरत को अपने साथ रखता है, उसकी बात हम क्यों सुने ? वह समाज से पतित है, नीच है |
     तब लोगों ने उसे समाजच्युत करके बाहर निकाल दिया |
ज्ञान ने देखा कि धर्म से लड़ने के पहले समाज से लड़ना है | जब तक समाज पर विजय नहीं मिलती, तब तक धर्म का खंडन नहीं हो सकता |
     तब वह इसी प्रकार करने लगा---वह कहने लगा---धर्मध्वजी ये पुगी-पुरोहित, मुल्ला, ये कौन हैं ? इन्हें क्या अधिकार है हमारे जीवन को बाँध रखने कर ? आओ, हम इन्हें दूर कर दे, एक स्वतंत्र समाज की रचना करे, ताकि हम उन्नति के पथ पर बढ़ सके |
     तब एक दिन विदेशी सरकार के दो सिपाही आकर उसे पकड़ ले गए | क्योंकि वह वर्गों में परस्पर विरोध जगा रहा था |
     ज्ञान जब जेल काटकर बाहर निकला, तब उसकी छाती में इन विदेशियों के प्रति विद्रोह धधक रहा था | यही तो हमारी क्षुद्रताओं को स्थायी बनाये रखते हैं, और लाभ उठाते हैं | पहले अपने को विदेशी प्रभुत्व से मुक्त करना होगा, तब..और वह गुप्त रूप से विदेश्यों के विरुद्ध लड़ाई का आयोजन करने लगा |
     एक दिन उसके पास एक विदेशी आदमी आया | वह मैले-कुचले फटे -पुराने खाकी पहने हुए था | मुख पर झुर्रियाँ पड़ी थीं, आँखों में एक तीखा दर्द था | उसने ज्ञान से कहा---आप मुझे कुछ काम दे, ताकि मै अपनी रोजी कमा सकूँ | मैं विदेशी हूँ | आपके देश में भूखा मर रहा हूँ | कोई भी काम मुझे दे, मै करूँगा, आप परीक्षा लें | मेरे पास रोटी का टुकड़ा भी नही है |
     ज्ञान ने खिन्न होकर कहा---मेरी दशा तुमसे कुछ अच्छी नही है, मैं भी भूखा हूँ |
वह विदेशी एकाएक पिघल-सा गया | बोला---अच्छा, मैं आपके दुःख से बहुत दुखी हूँ | मुझे अपना भाई समझे | यदि आपस में सहानुभूति हो, तो भूखे मरना मामूली बात है | परमात्मा आपकी रक्षा करे | मैं आपके लिए कुछ कर सकता हूँ ?
     ज्ञान ने देखा कि देशी-विदेशी का प्रश्न तब उठता है, जब पेट भरा हो | सबसे पहला शत्रु तो यह भूख ही है, पहले भूख को जीतना होगा, तभी आगे कुछ सोचा जा सकेगा...
     और उसने 'भूख के लड़ाकों' का एक दल बनाना शुरू किया, जिसका उद्देश्य था अमीरों से धन छीनकर सबमे समान रूप से वितरण करना, भूखों को रोटी देना इत्यादि, लेकिन जब धनिकों को इस बात का पता चला तब उन्होंने एक दिन चुपचाप अपने चरों द्वारा उसे पकड़वा मंगाया और एक पहाड़ी किले में कैद कर दिया | वहाँ एकांत में वे उसे सताने के लिए नित्य एक मुट्ठी चबेना और एक लोटा पानी दे देते, बस |
     धीरे-धीरे ज्ञान का हृदय ग्लानि से भरने लगा | जीवन उसे बोझ-सा जान पड़ने लगा | निरंतर यह भाव उसके भीतर जगा करता कि मैं, ज्ञान, परमात्मा का प्रतिनिधि, इतना विवश हूँ कि पेट-भर रोटी का प्रबंध मेरे लिए असंभव है ? यदि ऐसा है, तो कितना व्यर्थ है यह जीवन, कितना छूंछा, कितना बेमानी |
     एक दिन वह किले की दीवार पर चढ़ गया | बाहर खाई में भरा हुआ पानी देखते-देखते उसे एकदम से विचार आया, और उसने यह निश्चय कर लिया कि वह उसमें कूदकर प्राण खो देगा | परमात्मा के पास लौटकर प्रार्थना करेगा कि मुझे इस भार से मुक्त करो, मैं तुम्हारा प्रतिनिधि तो हूँ, लेकिन ऐसे संसार में मेरा स्थान नही है |
     वह स्थिर मुग्ध दृष्टी से खाई के पानी में देखने लगा | वह कूदने को ही था की एकाएक उसने देखा, पानी में उसका प्रतिबिम्ब झलक रहा है और मानो कह रहा है---बस, अपने आपसे लड़ चुके ?
     ज्ञान सहमकर रुक गया, फिर धीरे-धीरे दीवार पर से नीचे उतर औया और किले में चक्कर काटने लगा |
     और उसने जान लिया कि जीवन की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि हम निरंतर आसानी की ओर आकृष्ट होते हैं |



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Sunday, 17 April 2016

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कलियों से | हरिवंश राय बच्चन | कविता | Kaliyon Se | Hindi poem | Harivansh Rai Bachchan |

          
कलियों से 
'कलियों से' कविता हिन्दी के महान कवि  हरिवंश राय बच्चन जी की रचना है| कवि कलियों से क्षमा मांगता है  क्योंकि उसने बचपन से उन्हें तोड़ कर उनपर अत्याचार किये हैं जिसपर कलियां उसे धन्यवाद देती हैं कि उसने उन्हें तोड़ कर उनकी उपयोगिता बढ़ाई है क्योंकि वे तो तोड़े न जाने के बाद भी कुम्हला के गिर ही जातीं... 
                 'अहे, मैंने कलियों के साथ,
    जब मेरा चंचल बचपन था,
    महा निर्दयी मेरा    मन था,
    अत्याचार अनेक   किये थे,
    कलियों को दुःख दीर्घ दिए थे,
    तोड़ इन्हें बागों से लाता,
    छेद-छेद कर हार बनाता !
    क्रूर कार्य, यह कैसे करता,
    सोच इसे हूँ आहें भरता |
कलियों, तुमसे क्षमा माँगते ये अपराधी हाथ |'
            'अहे, वह मेरे प्रति उपकार !
    कुछ दिन में कुम्हला ही जाती,
    गिरकर भूमि-समाधि बनाती |
    कौन जानता मेरा खिलना ?
    कौन, नाज़ से डुलना-हिलना ?
    कौन गोद में मुझको लेता ?
    कौन प्रेम का परिचय देता ?
    मुझे तोड़, की बड़ी भलाई,
    काम किसी के तो कुछ आई ,
बनी रही दो-चार घड़ी तो किसी गले का हार |'
            'अहे, वह क्षणिक प्रेम का जोश !
    सरस-सुगंधित थी तू जब तक,
    बनी स्नेह-भाजन थी तब तक |
    जहाँ तनिक-सी तू मुरझाई,
    फेंक दी गई, दूर हटाई |
इसी प्रेम से क्या तेरा हो जाता है परितोष ?'
            'बदलता पल-पल पर संसार 
    हृदय विश्व के साथ बदलता,
    प्रेम कहाँ फिर लहे अटलता ?
    इससे केवल यही सोचकर,
    लेती हूँ संतोष हृदय भर----
मुझको भी था किया किसी ने कभी हृदय से प्यार !'

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Tuesday, 5 April 2016

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चन्दा-II | जयशंकर प्रसाद | कहानी | Chanda-II | Jayshankar Prasad | Hindi story|

'चन्दा' कहानी के इस भाग में;
     जब हीरा लौट के नहीं आता तो रजा उसकी मदद के लिए एक कोल को  भेजेते हैं | वह कोल रामू होता है जो हीरा के मदद करने की जगह उसे मौत के मुंह में धकेल देता है और वह कोल-पति बन जाता | चन्दा हीरा के क़त्ल... 
     यह बात राजा साहब को विदित हुई | उन्होंने उसकी मदद के लिए कोलों को जाने की आज्ञा दी | रामू उस अवसर पर था | उसने सबके पहले जाने के लिए पैर बढ़ाया, और चला | वहां जब पहुंचा, तो उस दृश्य को देखकर घबड़ा गया, और हीरा से कहा---हाथ ढीला कर; जब यह छोड़ने लगे, तब गोली मारूँ, नहीं तो सम्भव है कि तुम्ही को लग जाय |
     हीरा---नहीं, तुम गोली मारो |
     रामू---तुम छोड़ो तो मैं वार करूं |
     हीरा---नहीं, यह अच्छा नहीं होगा |
     रामू---तुम उसे छोड़ो, मैं अभी मारता हूँ |
     हीरा---नहीं, तुम वार करो |
     रामू---वार करने से संभव है कि उछले और तुम्हारे हाथ छूट जाएँ,तो यह तोड़ डालेगा |
     हीरा---नहीं, तुम मार लो, मेरा हाथ ढीला हुआ जाता है |
     रामू---तुम हद करते हो, मानते नहीं |
     इतने में हीरा का हाथ कुछ बात-चीत करते-करते ढीला पड़ा; वह चीता उछलकर हीरा के कमर के को पकड़कर तोड़ने लगा |
     रामू खड़ा होकर देख रहा है, और पैशाचिक आकृति उस घृणित पशु के मुख पर लक्षित हो रही, और वह हँस रहा है |
     हीरा टूटी हुई साँस से कहने लगा---अब भी मार ले |
     रामू ने कहा---अब तू मर ले, तब वह भी मारा जायेगा | तूने हमारा हृदय निकाल लिया है, तूने हमारा घोर अपमान किया है, उसी का प्रतिफल है | इसे भोग |
     हीरा को चीता खाये डालता है; पर उसने कहा---नीच ! तू जानता है कि 'चंदा' अब मेरी होगी | कभी नहीं ! तू नीच है---इस चीते से भी भयंकर जानवर हो |
     हीरा ने टूटी हुई आवाज से कहा-तुझे इस विश्वासघात का फल शीघ्र मिलेगा और चन्दा फिर हमसे मिलेगी | चन्दा...प्यारी..च...
     इतना उसके मुख से निकला ही था की चीते ने उसका सिर दांतों के तले दाब लिया | रामू देखकर पैशाचिक हँसी हँस रहा था | हीरा के  समाप्त हो जाने पर रामू लौट आया, और झूठी बातें बनाकर राजा से कहा कि उसको हमारे जाने के पहले ही चीता ने मार दिया | राजा बहुत दुःखी हुए, और जंगल की सर्दारी रामू को मिली |
     वसंत की राका चारों ओर अनूठा दृश्य दिखा रही है | चन्द्रमा न मालूम किस लक्ष्य की ओर दौड़ा चला जा रहा है; कुछ पूछने से भी नहीं बताता | कुटज की कली का परिमल लिए पवन भी न मालूम कहाँ दौड़ रहा है, उसका भी कुछ समझ नहीं पड़ता | उसी तरह, चंद्रप्रभा के तीर पर बैठी हुई कोल-कुमारी का कोमल कंठ-स्वर भी किस धुन में है---नही ज्ञात होता |
     अकस्मात गोली की आवाज ने उसे चौंका दिया | गाने के समय जो उसका मुख उद्वेग और करुणा से पूर्ण दिखाई पड़ता था, वह घृणा और क्रोध से रंजित हो गया, और वह उठकर पुच्छमर्दिता  सिंहनी के समान तनकर खड़ी हो गई, और धीरे से कहा---यही समय है | ज्ञात होता है, राजा इस समय शिकार खेलने पुनः आ गये हैं---बस वह अपने वस्त्र को ठीक करके कोल-बालक बन गई, और कमर में से एक चमचमाता हुआ छूरा निकालकर चूमा | वह चांदनी में चमकने लगा | फिर वह कहने लगी---यद्यपि तुमने हीरा का रक्तपान कर लिया है, लेकिन पिता ने रामू से तुम्हे ले लिया था | अब तुम हमारे हाथ में हो, तुम्हें आज रामू का भी खून पीना होगा |
     इतना कहकर वह गोली के शब्द की ओर लक्ष्य करके चली | देखा कि तहखाने में राजासाहब बैठे हैं | शेर को गोली लग चुकी है, और वह भाग गया है, उसका पता नही लग रहा है, रामू सर्दार है, अतएव उसको खोजने के लिए आज्ञा हुई, वह शीघ्र ही सन्नद्ध हुआ | राजा ने कहा---कोई साथी लेते जाओ |  
     पहले तो उसने अस्वीकार किया, पर जब एक कोल-युवक स्वयं साथ चलने को तैयार हुआ, तो वह नही भी न कर सका, और सीधे---जिधर शेर गया था, उसी ओर चला | कोल-बालक भी उसके पीछे है | वहां घाव से व्याकुल शेर चिंघाड़ रहा है, इसने जाते ही ललकारा | उसने तत्काल ही निकलकर वार किया | रामू कम साहसी नहीं था, उसने उसके खुले हुए मुंह में निर्भीक होकर बन्दूक की नाल डाल दी; पर उसके जरा-सा मुहं घुमा लेने से गोली चमड़ा छेदकर पार निकल गई, और शेर ने क्रुद्ध होकर दांत से बन्दूक की नाल दबा ली | अब दोनों एक दुसरे को ढकेलेने लगे; पर कोल-बालक चुपचाप खड़ा है | रामू ने कहा---मार, अब देखता क्या है !
     युवक---तुम इससे बहुत अच्छी तरह लड़ रहे हो |
     रामू---मारता क्यों नहीं ?
     युवक---इसी तरह शायद हीरा से भी लड़ाई हुई थी, क्या तुम नहीं लड़ सकते ?
     रामू---कौन, चन्दा ! तुम हो ? आह, शीघ्र मारो, नहीं तो अब यह सबल हो रहा है |
     चन्दा ने कहा---हाँ, लो, मैं मारती हूँ, इसे छूरे से हमारे सामने तुमने हीरा को मारा था, यह वही छूरा है, यह तुझे दुःख से निश्चय ही छुड़ावेगा---इतना कहकर चन्दा ने रामू की बगल में छूरा उतार दिया | वह छटपटाया | इतने ही में शेर को मौका मिला, वह भी रामू पर टूट पड़ा और उसका इति कर आप भी वहीं गिर पड़ा |
     चन्दा ने अपना छूरा निकाल लिया, और उसको चांदनी में रंगा हुआ देखेने लगी, फिर खिलखिलाकर हंसी और कहा---'दरद दिल काहि सुनाऊं प्यार' ! फिर हंसकर कहा---हीरा ! तुम देखते होगे, अपर अब तो यह छूरा ही दिल की दाह सुनेगा | इतना कहकर अपनी छाती में उसे झोंक लिया और उसी जगह गिर गई, और कहने लगी-हीरा...हम...तुमसे...मिले ही.... ....
     चन्द्रमा अपने चन्द्र प्रकाश में यह सब देख रहा था |


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