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Sunday, 18 September 2016

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ग्राम | हिंदी कहानी | जय शंकर प्रासाद | Gram | Hindi story | Jayashankar Prasad

'ग्राम' कहानी जय शंकर प्रसाद जी द्वारा लिखी गई है | जमींदार मोहनदास नए इलाके के इंस्पेक्शन के लिए जाते हैं परन्तु अपना रास्ता भटकने के कारण उन्हें एक अन्य ग्राम में ठहरना पड़ता जहाँ उस इलाके से सम्बंधित एक दुखियारी स्त्री की कथा सुनकर उन्हें बहुत ही लज्जा अनुभव होती है | 
     टन ! टन ! टन ! स्टेशन पर घंटी बोली |
     श्रावण-मास की संध्या भी कैसी मनोहारिणी होती है ! मेघ-माला-विभूषित गगन की छाया सघन रसाल-कानन में पड़ रही है ! अंधियारी धीरे-धीरे अपना अधिकार पूर्व-गगन में जमाती हुई, सुशासन-कारिणी महाराणी से समान, विहंगप्रजागण को सुखनिकेतन में शयन करने की आज्ञा दे रही है | आकाशरूपी शासन-पत्र पर प्रकृति के हस्ताक्षर के समान बिजली की रेखा दिखाई पड़ती है.....ग्राम्य स्टेशन पर कहीं एक-दो दीपलोक दिखाई पड़ता है | पवन हरे-हरे निकुजों में से भ्रमण करता हुआ झिल्ली के झनकार के साथ भरी हुई झीलों में लहरों के साथ खेल रहा है | बूंदियाँ  धीरे-धीरे गिर रही है, जो कि जूही के कलियों को आर्द्र करके पवन को भी शीतल कर रही है |
      थोड़े समय में वर्षा बंद हो गई | अंधकार-रुपी अंजन के अग्रभागस्थित आलोक के समान चतुर्दशी की लालिमा को लिए हुए चंद्रदेव प्राची में हरे-हरे तरुवरों की आड़ में से अपनी किरण-प्रभा दिखाने लगे | पवन की सनसनाहट के साथ रेलगाड़ी का शब्द सुनाई पड़ने लगे | सिग्नेलर ने अपना कार्य किया | घंटा का शब्द उस हरे-भरे मैदान में गूंजने लगा | यात्री लोग अपनी गठरी बांधते हुए  स्टेशन पर पहुँचे | महादैत्य के लाल-लाल नेत्रों के समान अन्जन-गिरिनिभ इन्जिन का अग्रस्थित रक्त-आलोक दिखाई देने लगा | पागलों के सामान बड़बड़ाती हुई अपने धुन की पक्की रेलगाड़ी स्टेशन पर पहुंच गई | धड़ाधड़ यात्री लोग उतरने-चढ़ने लगे | एक स्त्री की ओर देखकर फाटक के बहर खड़ी हुई दो औरतें---जो उसकी सहेली मालूम देती है---रो रही है,और वह स्त्री एक मनुष्य के साथ रेल में बैठने को उद्यत है | उनकी क्रंदन-ध्वनि से वह स्त्री दीन भाव से उनकी ओर देखती हुई, बिना समझे हुए, सेकण्ड क्लास की गाड़ी में चढ़ने लगी; पर उसमें बैठें हुए बाबू साहब---'यह दूसरा दर्जा है, इसमें मत चढ़ो' कहते हुए उतर पड़े, और अपना हंटर घुमाते हुए स्टेशन से बाहर होने का उद्योग करने लगे |
     विलायती पिक का वृचिस पहने, बूट चढ़ाये, हंटिंग कोट धानी रंग का साफा, अंग्रजी हिन्दुस्तानी का महासम्मेलन बाबू साहब के अंग पर दिखाई पड़ रहा है | गौर वर्ण, उन्नत ललाट उसकी आभा को बढ़ा रहे हैं | स्टेशन मास्टर से सामना होते ही शेकहैण्ड करने के उपरांत बाबू साहब से बातचीत होने लगी |
     स्टे० मा०---आप इस वक्त कहाँ के आ रहे हैं ?
     मोहन०--कारिन्दों ने इलाके में बड़ा गड़बड़ मचा रक्खा है, इसलिए मैं कुसुमपुर---जो कि हमारा इलाका है---इंस्पेक्शन के लिए जा रहा हूँ |
     स्टे० मा०---फिर कब पलटियेगा ?
     मोहन०---दो रोज में | अच्छा, गुड इवनिंग !
     स्टेशन मास्टर, जो लाइन-क्लियर दे चुके थे, गुड इवनिंग करते हुए अपने आफिस में घुस गए |
     बाबू मोहनदास अंग्रेजी काठी से सजे हुए घोड़े पर, जो कि पूर्व ही से स्टेशन पर खड़ा था, सवार होकर चलते हुए |
    सरलस्वभावा ग्रामवासिनी कुलकामिनीगण  का सुमधुर संगीत धीरे-धीरे आम्र-कानन में से निकलकर चारों ओर गूँज रहा है | अन्धकार-गगन में जुगनू-तारे चमक-चमककर चित्त को चंचल कर रहे हैं | ग्रामीण लोग अपना हल कंधे पर रक्खे, बिरहा गाते हुए, बैलों की जोड़ी के साथ, घर की ओर प्रत्यावर्तन कर रहे हैं | 
     एक विशाल तरुवर की शाखा में झूला पड़ा हुआ है, उसपर चार महिलाएं बैठी है, और पचासों उसको घेरकर गाती हुई घूम रही हैं | झूले के पेंग के साथ 'अबकी सावन सइयां घर रहुरे' की सुरीली पचासों कोकिल-कंठ से निकली हुई तान पशुगणों  को भी मोहित कर रही है | बालिकाएं स्वछन्द भाव से क्रीड़ा कर रही हैं | अकस्मात् अश्व के पद-शब्द ने उन सरला कामिनियों को चौंका दिया | वे सब देखती हैं तो हमारे पूर्व-परिचित बाबू मोहनलाल घोड़े को रोककर उसपर से उतर रहे हैं | वे सब उनका भेष देखकर घबड़ा गयीं और आपस में कुछ इंगित करके चुप रह गयीं | 
    बाबू मोहनलाल ने निस्तब्धता को भंग किया, और बोले ! भद्रे---यहाँ से कुसुमपुर कितनी दूर है ? और किधर से जाना होगा ? 
     एक प्रौढ़ा ने सोचा कि 'भद्रे' कोई परिहास-शब्द तो नहीं है, पर वह कुछ कह न सकी, केवल एक ओर दिखाकर बोली---इहाँ से डेढ़ऐ  कोस तो बाय, इहै पैड़वा जाई |
     बाबू मोहनलाल उसी पगडण्डी से चले | चलते-चलते उन्हें भ्रम हो गया और वह अपनी छावनी का पथ छोड़कर दुसरे मार्ग से जाने लगे | मेघ घिर आये, जल वेग से बरसने लगा, अन्धकार और घना हो गया | भटकते-भटकते वह एक खेत के समीप पहुंचे; वहां उस हरे-भरे खेत में एक ऊंचा और बड़ा मचान था जो कि फूस से छाया हुआ था, और समीप ही में एक छोटा-सा कच्चा मकान था |
     उस मचान पर बालक और बालिकाएं बैठी हुई कोलाहल मचा रही थीं | जल में भीगते हुए भी मोहनलाल खेत के समीप खड़े होकर उनके आनन्द-कलरव को श्रवण करने लगे |
          भ्रांत होने से उनका बहुत समय व्यतीत हो गया | रात्रि अधिक बीत गयी | कहाँ ठहरें ? इसी विचार में वह खड़े रहे, बूँदें कम हो गयीं | इतने में एक बालिका अपने मलिन वसन के अंचल की आड़ में दीप लिए हुए उसी मचान की ओर जाती हुई दिखाई पड़ी |
३ 
     बालिका की अवस्था १५ वर्ष की है | आलोक से उसका अंग अंधकार-घन में विद्युलेखा की तरह की तरह चमक रहा था | यद्यपि दरिद्रता ने उसे मलिन कर रक्खा है, पर ईस्वरीय सुषमा उसके कोमल अंग पर अपना निवास किये हुए है | मोहनलाल ने थोड़ा बढ़कर उससे पूछना चाहा, पर संकुचित होकर ठिठक गए | परन्तु पूछने के अतिरिक्त दूसरा उपाय ही नहीं था | अस्तु, रूखेपन के साथ पुछा---कुसुमपुर का रास्ता किधर है ?
     बालिका इस भव्य मूर्ति को देखकर डरी, पर साहस के साथ बोली---मैं नहीं जानती | ऐसे सरल नेत्र-संचालन से इंगित करके उसने यह शब्द कहा कि युवक को क्रोध के स्थान में हंसी आ गई और कहने लगा---तो जो जानता हो,मुझे बतलाओ, मैं उससे पूछ लूँगा |
     बालिका---हमारी माता जानती होंगी |
     मोहन०---इस समय तुम कहां जाती हो ?
     बालिका---(मचान की ओर दिखाकर) वहां जो कई लड़के है, उनमें से एक हमारा भाई है, उसी को खिलाने जाती हूँ |
     मोहन०---बालक इतनी रात को खेत में क्यों बैठा है |
     बालिका---वह रात-भात और लड़कों के साथ खेत ही में रहता है |

     मोहन०---तुम्हारी माँ कहाँ हैं ?
     बालिका---चलिए, मैं लिवा चलती हूँ |
     इतना कहकर बालिका अपने भाई के पास गई, और उसको खिलाकर तथा उसके पास बैठे हुए लड़कों को भी कुछ देकर उसी क्षुद्र-कुटीराभिमुख गमन करने लगी | मोहनलाल उस सरला बालिका के पीछे चले |
४ 
     उस क्षुद्र कुटीर में पहुँचने पर एक स्त्री मोहनलाल को दिखाई पड़ी जिसकी अंगप्रभा स्वर्ण-तुल्य थी, तेजोमय मुख-मंडल, तथा ईषत उन्नत अधर अभिमान से भरे हुए थे, अवस्था उसकी ५० वर्ष से अधिक थी | मोहनलाल की आंतरिक अवस्था, जो ग्राम्यजीवन देखेने से कुछ बदल चुकी थी, उस सरल गंभीर तेजोमय मूर्ति को देख और भी सरल विनययुक्त हो गई | उसने झुककर प्रणाम किया | स्त्री ने आशीर्वाद दिया और पुछा---बेटा! कहाँ के आते हो ?
     मोहन०---मैं कुसुमपुर जाता था, किन्तु, रास्ता भूल गया.....
     'कुसुमपुर' का नाम सुनते ही स्त्री का मुख-मंडल आरक्तिम हो गया और उसके नेत्र से दो बूँद आंसू निकल आये | वे अश्रु करुणा के नहीं, किन्तु अभिमान के थे |
     मोहनलाल आश्चर्यान्वित होकर देख रहे थे | उन्होंने पुछा----आपको कुसुमपुर के नाम से क्षोभ क्यों हुआ?
     स्त्री---बेटा ! उसकी बड़ी कथा है, तुम सुनकर क्या करोगे ! 
     मोहन०---नहीं मई सुनना चाहता हूँ, यदि आप कृपा करके सुनावें |
     स्त्री---अच्छा, कुछ जलपान कर लो, तब सुनाउंगी |
     पुन: बालिका की और देखकर स्त्री ने कहा---कुछ जल पीने को ले आओ |
     आज्ञा पाते ही बालिका उस क्षुद्र गृह के एक मिट्टी के बर्तन में  से कुछ वस्तु निकाल, उसे एक पात्र में घोलकर ले आयी, और मोहनलाल के सामने रख दिया | मोहनलाल उस शर्बत को पान करके फूस की चटाई पर बैठकर स्त्री की कथा सुनने लगे |
     स्त्री कहने लगी---हमारे पति उस प्रांत के गण्य भूस्वामी थे, और वंश भी हमलोगों का बहुत उच्च था | जिस गाँव का अभी आपने नाम लिया है, वही हमारे पति की प्रधान ज़मीदारी थी | कार्य-वश एक कुंदनलाल नामक महाजन से कुछ ऋण लिया गया | कुछ भी विचार न करने से उनका बहुत रुपया बढ़ गया, और जब ऐसी अवस्था पहुंची तो अनेक उपाय करके हमारे पति धन जुटाकर उनके पास ले गए, तब उसे धूर्त ने कहा,"क्या हर्ज़ है बाबू साहब !आप आठ रोज़ में आना, हम रूपया ले लेंगे, और जो घाटा होगा, उसे छोड़ देंगे, आपका इलाका भी जायगा, इस  समय रेहननाम भी नहीं मिल रहा है |" उसका विश्वास करके हमारे पति फिर बैठे रहे, और उसने कुछ भी न पुछा | उनकी उदारता के कारण वह संचित धन भी थोड़ा हो गया, और उधर दावा करके इलाका---जो की वह ले लेना चाहता था---बहुत थोड़े रूपये में नीलाम करा लिया | फिर हमारे पति के हृदय में, उस इलाका के इस भांति निकल जाने के कारण, बहुत चोट पहुंची और इसी से उनकी मृत्यु हो गयी | इस दशा के होने के उपरांत हम लोग इस दुसरे गाँव में आकर रहने लगे | यहाँ के ज़मीदार बहुत धर्मात्मा हैं, उन्होंने कुछ सामान्य 'कर' पर यह भूमि दी है, इसी से अब हमारी जीविका है |.....
     इतना कहते-कहते स्त्री का गला अभिमान से भर आया, और कुछ कह न सकी |
     स्त्री की कथा को सुनकर मोहनलाल को बड़ा दू:ख  हुआ | रात विशेष बीत चुकी थी, अत: रात्रि-यापन करके, प्रभात में मलिन तथा पश्चिमगामी चन्द्र का अनुसरण करके, बताये हुए पथ से वह चले गए |
     पर उनके मुख पर विवाद तथा लज्जा ने अधिकार कर लिया था | कारण यह था कि स्त्री की ज़मींदारी हरण करनेवाले, तथा उसके प्राणप्रिय पति से उसे विच्छेद कराकर इस भांति दुःख देनेवाले कुंदनलाल, मोहनलाल के ही पिता थे |























  
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Tuesday, 5 April 2016

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चन्दा-II | जयशंकर प्रसाद | कहानी | Chanda-II | Jayshankar Prasad | Hindi story|

'चन्दा' कहानी के इस भाग में;
     जब हीरा लौट के नहीं आता तो रजा उसकी मदद के लिए एक कोल को  भेजेते हैं | वह कोल रामू होता है जो हीरा के मदद करने की जगह उसे मौत के मुंह में धकेल देता है और वह कोल-पति बन जाता | चन्दा हीरा के क़त्ल... 
     यह बात राजा साहब को विदित हुई | उन्होंने उसकी मदद के लिए कोलों को जाने की आज्ञा दी | रामू उस अवसर पर था | उसने सबके पहले जाने के लिए पैर बढ़ाया, और चला | वहां जब पहुंचा, तो उस दृश्य को देखकर घबड़ा गया, और हीरा से कहा---हाथ ढीला कर; जब यह छोड़ने लगे, तब गोली मारूँ, नहीं तो सम्भव है कि तुम्ही को लग जाय |
     हीरा---नहीं, तुम गोली मारो |
     रामू---तुम छोड़ो तो मैं वार करूं |
     हीरा---नहीं, यह अच्छा नहीं होगा |
     रामू---तुम उसे छोड़ो, मैं अभी मारता हूँ |
     हीरा---नहीं, तुम वार करो |
     रामू---वार करने से संभव है कि उछले और तुम्हारे हाथ छूट जाएँ,तो यह तोड़ डालेगा |
     हीरा---नहीं, तुम मार लो, मेरा हाथ ढीला हुआ जाता है |
     रामू---तुम हद करते हो, मानते नहीं |
     इतने में हीरा का हाथ कुछ बात-चीत करते-करते ढीला पड़ा; वह चीता उछलकर हीरा के कमर के को पकड़कर तोड़ने लगा |
     रामू खड़ा होकर देख रहा है, और पैशाचिक आकृति उस घृणित पशु के मुख पर लक्षित हो रही, और वह हँस रहा है |
     हीरा टूटी हुई साँस से कहने लगा---अब भी मार ले |
     रामू ने कहा---अब तू मर ले, तब वह भी मारा जायेगा | तूने हमारा हृदय निकाल लिया है, तूने हमारा घोर अपमान किया है, उसी का प्रतिफल है | इसे भोग |
     हीरा को चीता खाये डालता है; पर उसने कहा---नीच ! तू जानता है कि 'चंदा' अब मेरी होगी | कभी नहीं ! तू नीच है---इस चीते से भी भयंकर जानवर हो |
     हीरा ने टूटी हुई आवाज से कहा-तुझे इस विश्वासघात का फल शीघ्र मिलेगा और चन्दा फिर हमसे मिलेगी | चन्दा...प्यारी..च...
     इतना उसके मुख से निकला ही था की चीते ने उसका सिर दांतों के तले दाब लिया | रामू देखकर पैशाचिक हँसी हँस रहा था | हीरा के  समाप्त हो जाने पर रामू लौट आया, और झूठी बातें बनाकर राजा से कहा कि उसको हमारे जाने के पहले ही चीता ने मार दिया | राजा बहुत दुःखी हुए, और जंगल की सर्दारी रामू को मिली |
     वसंत की राका चारों ओर अनूठा दृश्य दिखा रही है | चन्द्रमा न मालूम किस लक्ष्य की ओर दौड़ा चला जा रहा है; कुछ पूछने से भी नहीं बताता | कुटज की कली का परिमल लिए पवन भी न मालूम कहाँ दौड़ रहा है, उसका भी कुछ समझ नहीं पड़ता | उसी तरह, चंद्रप्रभा के तीर पर बैठी हुई कोल-कुमारी का कोमल कंठ-स्वर भी किस धुन में है---नही ज्ञात होता |
     अकस्मात गोली की आवाज ने उसे चौंका दिया | गाने के समय जो उसका मुख उद्वेग और करुणा से पूर्ण दिखाई पड़ता था, वह घृणा और क्रोध से रंजित हो गया, और वह उठकर पुच्छमर्दिता  सिंहनी के समान तनकर खड़ी हो गई, और धीरे से कहा---यही समय है | ज्ञात होता है, राजा इस समय शिकार खेलने पुनः आ गये हैं---बस वह अपने वस्त्र को ठीक करके कोल-बालक बन गई, और कमर में से एक चमचमाता हुआ छूरा निकालकर चूमा | वह चांदनी में चमकने लगा | फिर वह कहने लगी---यद्यपि तुमने हीरा का रक्तपान कर लिया है, लेकिन पिता ने रामू से तुम्हे ले लिया था | अब तुम हमारे हाथ में हो, तुम्हें आज रामू का भी खून पीना होगा |
     इतना कहकर वह गोली के शब्द की ओर लक्ष्य करके चली | देखा कि तहखाने में राजासाहब बैठे हैं | शेर को गोली लग चुकी है, और वह भाग गया है, उसका पता नही लग रहा है, रामू सर्दार है, अतएव उसको खोजने के लिए आज्ञा हुई, वह शीघ्र ही सन्नद्ध हुआ | राजा ने कहा---कोई साथी लेते जाओ |  
     पहले तो उसने अस्वीकार किया, पर जब एक कोल-युवक स्वयं साथ चलने को तैयार हुआ, तो वह नही भी न कर सका, और सीधे---जिधर शेर गया था, उसी ओर चला | कोल-बालक भी उसके पीछे है | वहां घाव से व्याकुल शेर चिंघाड़ रहा है, इसने जाते ही ललकारा | उसने तत्काल ही निकलकर वार किया | रामू कम साहसी नहीं था, उसने उसके खुले हुए मुंह में निर्भीक होकर बन्दूक की नाल डाल दी; पर उसके जरा-सा मुहं घुमा लेने से गोली चमड़ा छेदकर पार निकल गई, और शेर ने क्रुद्ध होकर दांत से बन्दूक की नाल दबा ली | अब दोनों एक दुसरे को ढकेलेने लगे; पर कोल-बालक चुपचाप खड़ा है | रामू ने कहा---मार, अब देखता क्या है !
     युवक---तुम इससे बहुत अच्छी तरह लड़ रहे हो |
     रामू---मारता क्यों नहीं ?
     युवक---इसी तरह शायद हीरा से भी लड़ाई हुई थी, क्या तुम नहीं लड़ सकते ?
     रामू---कौन, चन्दा ! तुम हो ? आह, शीघ्र मारो, नहीं तो अब यह सबल हो रहा है |
     चन्दा ने कहा---हाँ, लो, मैं मारती हूँ, इसे छूरे से हमारे सामने तुमने हीरा को मारा था, यह वही छूरा है, यह तुझे दुःख से निश्चय ही छुड़ावेगा---इतना कहकर चन्दा ने रामू की बगल में छूरा उतार दिया | वह छटपटाया | इतने ही में शेर को मौका मिला, वह भी रामू पर टूट पड़ा और उसका इति कर आप भी वहीं गिर पड़ा |
     चन्दा ने अपना छूरा निकाल लिया, और उसको चांदनी में रंगा हुआ देखेने लगी, फिर खिलखिलाकर हंसी और कहा---'दरद दिल काहि सुनाऊं प्यार' ! फिर हंसकर कहा---हीरा ! तुम देखते होगे, अपर अब तो यह छूरा ही दिल की दाह सुनेगा | इतना कहकर अपनी छाती में उसे झोंक लिया और उसी जगह गिर गई, और कहने लगी-हीरा...हम...तुमसे...मिले ही.... ....
     चन्द्रमा अपने चन्द्र प्रकाश में यह सब देख रहा था |


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Thursday, 31 March 2016

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चन्दा -I | जयशंकर 'प्रसाद' | कहानी | Chanda-I | Jayshankar 'Prasad' | Hindi Story|


'चन्दा' दो कोल युवक-युवती की प्रेम कथा है | इस कहानी के लेखक श्री जयशंकर 'प्रसाद' हैं | इस कहानी में चन्दा और हीरा एक दुसरे से प्रेम करते हैं पर चन्दा का सम्बन्ध एक अन्य रामू नामक कोल से तय हो चूका था | रामू हीरा को मारने का प्रयास करता है पर हीरा को जंगल का एक वृद्ध जो कोल-पति है, बचा लेता है | वृद्ध कोल हीरा और चन्दा का ब्याह करा देता है तथा हीरा को अपना पद भी सौंप देता है | जंगल में एक दिन राजा शिकार करने आता है | इस दौरान ...

चैत्र-कृष्णाष्टमी का चन्द्रमा अपना उज्जवल प्रकाश 'चंद्रप्रभा' को निर्मल जल पर डाल रहा है | गिरी-श्रेणी के तरुवर अपने रंग को छोड़कर ध्वलित हो रहे हैं; कल-नादिनी समीर के संग धीरे-धीरे बह रही है | एक शिला-ताल पर बैठी हुई कोल-कुमारी सुरीले स्वर से---'दरद-दिल काहि  सुनाऊँ प्यारे! दरद'... गा रही है |
     गीत अधुरा ही है कि अकस्मात एक कोल-युवक धीर-पद-संचालन करता हुआ उस रमणी के सम्मुख आकर खड़ा हो गया | उसे देखते ही रमणी की हृदय-तंत्री बज उठी | रमणी बाह्य-स्वर भूलकर आन्तरिक स्वर से सुमुधर संगीत गाने लगी और उठकर खड़ी हो गई | प्रणय के वेग को सहन न करके वर्षावारिपूरिता स्रोतस्विनी के समान कोल-कुमार के कंध-कूल से रमणी ने आलिंगन किया |
     दोनों उसी शिला पर बैठ गए, और निनिर्मेष सजल नेत्रों से परस्पर अवलोकन करने लगे | युवती ने कहा----तुम कैसे आये ?
     युवक---जैसे तुमने बुलाया |
     युवती---( हंसकर ) हमने तुम्हे कब बुलाया ! और क्यों बुलाया !
     युवक---गाकर बुलाया और दरद सुनाने के लिए |
     युवती---( दीर्घ निश्वास लेकर ) कैसे क्या करूँ ? पिता ने तो उसी से विवाह करना निश्चय किया है |
     युवक---( उत्तेजना से खड़ा होकर ) तो जो कहो, मै करने के लिए प्रस्तुत हूँ |
     युवती---( चंद्रप्रभा  की ओर दिखाकर ) बस, यही शरण है |
     युवक---तो हमारे लिए कौन दूसरा स्थान है ?
     युवती---मै तो प्रस्तुत हूँ |
     युवक---हम तुम्हारे पहले |
     युवती ने कहा---तो चलो |
     युवक ने मेघ-गर्जन-स्वर से कहा---चलो |
उतरकर चंद्रप्रभा के तट पर आए, और एक शिला पर खड़े हो गए | तब युवती ने कहा---अब विदा !
     युवक ने कहा---किससे ? मै तो तुम्हारे साथ---जब तक सृष्टि रहेगी तब तक ---रहूँगा |
     इतने ही में शाल-वृक्ष के नीचे एक छाया दिखाई पड़ी और वह इन्हीं दोनों की ओर आती हुई दिखाई देने लगी | दोनों ने चकित होकर देखा की एक कोल खड़ा है | उसने गंभीर स्वर से युवती से पुछा---चन्दा  ! तू यहाँ क्यों आई ?
     युवती---तुम पूछनेवाले कौन हो !
     आगंतुक युवक---मै तुम्हारा भावी पति 'रामू' हूँ |
     युवती---मै तुमसे ब्याह न करुँगी |
     आ० यु०---फिर किससे तुम्हारा ब्याह होगा ?
     युवती ने पहले के आये युवक की ओर इंगित करके कहा---इन्हीं से |
     आगन्तक युवक से अब न सहा गया | घूमकर पूछा---क्यों हीरा ! तुम ब्याह करोगे ?
     हीरा---तो इसमें तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?
     रामू---तुम्हे इससे अलग हो जाना चाहिए |
     हीरा--- क्यों, तुम कौन होते हो ?
     रामू---हमारा इससे सम्बन्ध पक्का हो चूका है |
     हीरा---पर जिससे सम्बन्ध होनेवाला है, वह सहमत हो तब न !
     रामू---क्यों चन्दा ! क्या कहती हो ?
     चन्दा---मै तुमसे ब्याह न करुँगी |
     रामू---तो हीरा से भी तुम ब्याह नहीं कर सकती !
     चन्दा---क्यों ?
     रामू---( हीरा से  ) अब हमारा-तुम्हारा फैसला हो जाना चाहिए, क्योंकि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं |
     इतना कहकर हीरे के ऊपर झपटकर उसने अचानक छूरे का वार किया |
     हीरा यद्यपि सचेत हो रहा था; पर उसको सम्हलने में विलम्ब हुआ, इससे घाव लग गया और वह वृक्ष थामकर बैठ गया |इतने में चन्दा जोर से क्रंदन कर उठी---साथ ही के वृद्ध भील आता हुआ दिखाई पड़ा |
     युवती मुंह ढांपकर रो रही है, और युवक रक्ताक्त छूरा लिए, घृणा की दृष्टि से खड़े हुए, हीरा की ओर देख रहा है | विमल चन्द्रिका में चित्र की तरह वे दिखाई दे रहे हैं | वृद्ध को जब चन्दा ने देखा, तो और वेग से रोने लगी | उस दृश्य को देखते ही वृद्ध कोल-पति सब बात समझ गया, और रामू के समीप जाकर छूरा उसके हाथ से ले लिया, और आज्ञा के स्वर में कहा---तुम दोनों हीरा को उठाकर नदी के समीप ले चलो  |
     इतना कहकर वृद्ध उन सबों के साथ आकर नदी-तट  पर जल के समीप खड़ा हो गया | रामू और चन्दा दोनों ने मिलकर उसके घाव को धोया और हीरा के मुंह पर छींटा दिया, जिससे उसकी मूर्छा दूर हुई | तब वृद्ध ने सब बातें हीरा से पूछीं; पूछ लेने पर रामू ने कहा---क्यों, यह सब ठीक है ?
     रामू ने कहा---सब सत्य है |
    वृद्ध---तो तुम अब चन्दा के योग्य नहीं हो, और यह छूरा भी---जिसे हमने तुम्हे दिया था---तुम्हारे योग्य नहीं है | तुम शीघ्र ही हमारे जंगल से चले जाओ, नहीं तो हम तुम्हारा हाल महाराज से कह देंगे, और उसका क्या परिणाम होगा सो तुम स्वयं समझ सकते हो | (हीरा की ओर देखकर) बेटा ! तुम्हारा घाव शीघ्र अच्छा हो जायेगा, घबड़ाना नही, चन्दा तुम्हारी ही होगी |
     यह सुनकर चन्दा और हीरा का मुख प्रसन्नता से चमकने लगा, पर हीरा ने लेटे-ही-लेटे हाथ जोड़कर कहा---पिता ! एक बात कहनी है, यदि आपकी आज्ञा हो |
     वृद्ध---हम समझ गए, बेटा ! रामू विश्वासघाती है |
     हीरा---नहीं पिता ! अब वह ऐसा कार्य नहीं करेगा | आप क्षमा करेंगे, मै ऐसी आशा करता हूँ |
     वृद्ध---जैसी तुम्हारी इच्छा |
     कुछ दिन के बाद जब हीरा अच्छी प्रकार से आरोग्य हो गया, तब उसका ब्याह चन्दा से हो गया | रामू भी उस उत्सव में सम्मिलित हुआ, पर उसका बदन मलीन और चिंतापूर्ण था | वृद्ध कुछ ही काल में अपना पद हीरा को सौंप स्वर्ग को सिधारा | हीरा और चन्दा सुख से विमल चांदनी में बैठकर पहाड़ी झरनों का कल-नाद-मय आनंद-संगीत सुनते थे |
३ 
     अंशुमाली अपनी तीक्ष्ण किरणों से वन्य-देश को परितापित कर रहे हैं | मृग-सिंह एक स्थान पर बैठकर, छाया-सुख में अपने बैर-भाव को भूलकर, ऊंघ रहे हैं | चंद्रप्रभा के तट पर पहाड़ी की एक गुहा में जहाँ कि छतनार पेड़ों की छाया उष्ण वायु को भी शीतल कर देती है, हीरा और चन्दा बैठे हैं | हृदय के अनन्त विकास से उनका मुख प्रफुल्लित दिखाई पड़ता है | उन्हें वस्त्र के लिए वृक्षगण वल्कल देते हैं; भोजन के लिये  प्याज-मेवा इत्यादि जंगली सुस्वादु फल, शीतल-स्वच्छंद पवन; निवास के लिये गिरी-गुहा; प्राकृतिक झरनों का शीतल जल उनके सब  अभावों को दूर करता है, और सबल तथा स्वच्छंद बनाने में ये सब सहायता देते हैं | उन्हें किसी की अपेक्षा नहीं करनी पड़ती | अस्तु, उन्हें सब सुखों से आनंदित व्यक्तिद्वय 'चंद्रप्रभा' के जल का कल-नाद सुनकर अपनी हृदय-वीणा को बजाते हैं |
     चन्दा---प्रिय ! आज उदासीन क्यों हो !
     हीरा---नहीं तो, मैं यह सोच रहा हूँ कि इस वन में राजा आनेवाले हैं | हमलोग यद्यपि अधीन नहीं हैं, तो भी उन्हें शिकार खेलाया जाता है, और इसमें हमलोगों की कुछ हानि भी नही है | उसके प्रतिकार में हमलोगों को कुछ मिलता है, पर आजकल इस वन में जानवर दिखाई नहीं पड़ते | इसलिये सोचता हूँ कि कोई शेर या छोटा चीता ही मिल जाता, तो कार्य हो जाता |
     चन्दा---खोज किया था ?
     हीरा---हाँ, आदमी तो गया है |
     इतने में एक कोल दौड़ता हुआ आया, और कहा---राजा आ गये हैं और तहखाने में बैठे हैं | एक तेंदुआ भी दिखाई दिया है |
     हीरा का मुख प्रसन्नता से चमकने लगा, और वह अपना कुल्हाड़ा सम्हालकर उस आगंतुक के साथ वहां पहुंचा, जहाँ शिकार का आयोजन हो चूका था |
     राजा साहब झंझरी में बन्दूक की नाल रखे हुए ताक रहे हैं | एक ओर से बाजा बज उठा | एक चीता भागता हुआ सामने से निकला | राजा साहब ने उस पर वार किया | गोली लगी, पर चमड़े को छेदती हुई पार हो गई; इससे वह जानवर भागकर निकल गया | अब तो राजा साहब बहुत ही दुःखित  हुए | हीरा को बुलाकर कहा---क्यों जी, यह जानवर नही मिलेगा ?
     उस वीर कोल ने कहा---क्यों नही ?
     इतना कहकर वह उसी ओर चला | झाड़ी में जहाँ वह चीता घाव से व्याकुल बैठा हुआ था, वहां पहुंचकर उसने देखना आरम्भ किया |क्रोध से भरा हुआ चीता उस कोल-युवक को देखते ही झपटा | युवक असावधानी के कारण वार न कर सका, पर दोनों हाथों से उस भयानक जंतु की गर्दन को पकड़ लिया, और उसने भी इसके कंधे पर अपने दोनों पंजों को जमा दिया |
     दोनों में बल-प्रयोग होने लगा | थोड़ी देर में दोनों जमीन पर लेट गये |

शेष अगले भाग में...



     
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