Friday, 6 May 2016

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इक्केवाला-१| विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक' | कहानी | Ikkewala-1 | Vishwambharnath Sharma 'Kaushik' | Hindi Story

     स्टेशन के बाहर मैंने अपने साथी मनोहरलाल से कहा---कोई इक्का मिल जाय तो अच्छा है---'दस मील का रास्ता है |'
     मनोहरलाल बोले---'आइये, इक्के बहुत हैं | उस तरफ खड़े होते हैं |'
     हम दोनों चले | लगभग दो सौ गज चलने के पश्चात देखा, तो सामने एक बड़े वृक्ष के नीचे तीन-चार इक्के खड़े दिखाई दिये | एक इक्का अभी आया था और उस पर से दो आदमी अपना असबाब उतर रहे थे | मनोहरलाल ने पुकारा---'कोई इक्का गंगापुर चलेगा ?'
     एक इक्केवाला बोला---'आइये सरकार, मैं ले चलूँ | कै सवारी है ?'
     'दो सवारी---गंगापुर का क्या लोगे ?'
     जो सब देते हैं, वही आप भी दे दीजियेगा |'
     आखिर कुछ मालूम तो हो ?'
     'दो रुपये का निरख (निर्ख) है |'
     'दो रुपये ?---इतना अधेर |'
     इसी समय जो लोग अभी आये थे, उनमे और उनके इक्केवाले में झगड़ा होने लगा | इक्केवाला बोला---'यह अच्छी रही, वहाँ से डेढ़ रुपया तय हुआ, अब यहाँ बीस ही आने दिखाते हैं !'
     यात्रियों में से एक बोला---'हमने पहले ही ख दिया था कि हम बीस आने से एक पैसा अधिक न देंगे |'
     'मैंने भी तो कहा था, कि डेढ़ रुपये ससे एक पैसा कम न लूँगा |'
     'कहा होगा, हमने सुना ही नहीं |'
     'हाँ, सुना नहीं---ऐसी बात आप काहे को सुनेंगे |'
     'अच्छा तुम्हे बीस आने मिलेंगे---लेना हो तो लो, नहीं अपना रास्ता देखो |'
     इक्केवाला, जो हृष्ट-पुष्ट तथा गौरवर्ण था, अकड़ गया | बोला---'रास्ता देखे, कोई अधेर है ! ऐसे रास्ता देखले लगे, तो बस कमाई कर चुके | बाये हाथ से इधर डेढ़ रुपया रख दीजिये, तब आगे बढ़िएगा | वहाँ तो बोले, अच्छा जो तुम्हारा रेट होगा, वह देंगे, अब यहाँ कहते हैं, रास्ता देखो---अच्छे मिलें !'
     हम लोग यह कथोपकथन सुनकर इक्का करना भूल गए और उनकी बाते सुनने लगे | एक यात्री बड़ी गंभीरतापूर्वक बोला---'देखो जे, यदि तुम भलमनसी से बाते करो, तो दो-चार पैसे हम अधिक दे सकते हैं, तुम गरीब आदमी हो; लेकिन जो झगड़ा करोगे तो एक पैसा न मिलेगा |'
     इक्केवाला किंचित मुस्कराकर बोला---'दो-चार पैसे ! ओफ! ओफ ! आप तो बड़े दाता मालूम होते हैं | जब चार पैसे देते हो, तो चार आने ही क्यों नहीं दे देते ?'
     'चार आने हमारे पासे नहीं हैं |'
     'नहीं है---अच्छी बात है, तो हो आपके पास हो वही दे दीजिये---न हो न दीजिये और ज़रूरत हो तो एकाध रुपया मैं आपको दे सकता हूँ |'
     'तुम बेचारे क्या डोज, चार-चार पैसे के लिए तो तुम झूट बोलते हो और  बेईमानी करते हो |'
     अरे बाबूजी, लाखों रुपये के लिए तो मैंने बेईमानी की नहीं---चार पैसे के लिए बेईमानी करूँगा ? बेईमानी करता तो इस समय इक्का न हाकता होता | खैर, आपको जो देना हो दे दीजिये---नहीं जाइए---मैंने किराया भर पाया |'
     उन्होंने बेश आने निकालकर दिए, इक्केवाले ने चुपचाप ले लिए |
     उस इक्केवाले कका आकर-प्रकार, उसकी बातचीत से मुखे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि अंध इक्केवालों की तरह यह साधारण आदमी नही है | इसमें कुछ विशेषता अवश्य है; अतेव मैंने सोचा कि यदि हो सके, तो गंगापुर इसी इक्के पर चलना चाहिए | यह सोचकर मैंने उससे पुछा---'क्यों भाई गंगापुर चलोगे ?'
     वह बोला---'हाँ ! हाँ ! आइए !'
     'क्या लोगे ?'
     'वही डेढ़ रुपया !'
     मैंने सोचा, अन्य इक्केवाले टी ओ दो रुपये मांगते थे, वह डेढ़ रुपया कहता है, आदमी सच्चा मालूम होता है | वह सोचकर मैंने कहा---'अच्छी बात है, चलो डेढ़ रुपया देंगे |'
     हम दोनों सवार होकर चले | थोड़ी दूर चलने पर मैं पुछा---'वे दोनों कौन थे ?' इक्केवाले ने कहा---'नारायण जाने कौन थे ? परदेशी मालूम होते हैं, लेकिन परले-सिरे के झूठे और बेईमान ! चार आने के लिए प्राण तज दे रहे थे |'
     मैंने पुछा---तो'तो सचमुच तुमसे डेढ़ रुपया ही तय हुआ था ?'
     'और नही क्या आप झूठ समझते हैं ? बाबूजी, यह पेशा ही बदनाम है, आपका कोई कसूर नही | इक्के, तांगेवाले सदा झूठे और बेईमान समझे जाते हैं | और होते भी हैं---अधिकतर तो ऐसे ही होते हैं | इन्हें चाहें आप रूपये की जगह सवा रुपया दीजिये, तब भी संतुष्ट नहीं होते |'
     मैंने पुछा---'तुम कौन जाति हो ?'
     'मैं ? वैश्य सरकार वैश्य हूँ |'
     'अच्छा ! वैश्य होकर इक्का हांकते हो ?'
     'क्यों सरकार, इक्का हाँकना कोई बुरा काम तो है नहीं ?'
     'नही, मेरा मतलब यह नहीं है कि इक्का हाँकना कोई बुरा काम है | मैंने इसलिए कहा कि वैश्य तो बहुधा व्यापार करते हैं |'
     'यह भी तो व्यापार ही है |'
     'हाँ, है तो व्यापार ही |'
     मैंने मन-ही-मन अपनी इस बेतुकी बात पर लज्जित हुआ; अतएव मैंने प्रसग बदलने के लिए पुछा---कितने दिनों से यह काम करते हो ?
     'दो बरस हो गये |'
     'इसके पहले क्या करते थे ?'
     यह सुनकर इक्केवाला गंभीर होकर बोला---'क्या बताऊँ, क्या करता था ?
     उसकी इस बात से तथा यात्रियों से उसने जो बातें कहीं थीं, उनका तारतम्य मिलाकर मैंने सोचा---इस व्यक्ति का जीवन रहस्यमय मालूम होता है | यह सोचकर मैंने उससे पुछा---'कोई हर्ज न समझो तो बताओ |'
     'हर्ज तो कोई नही हिं बाबूजी | पर मेरी बात पर लोगों को विश्वास नहीं होता | इक्केवाले बहुधा परले-सिरे के गप्पी समझे जाते हैं; इसलिए मैं किसी को अपना हाल सुनाता नही |'
     'खैर, मैं उन आदमियों में नही हूँ, यह तुम विश्वास रखो |'
     'अच्छी बात है सुनिए----'
   
   शेष अगले भाग में ....
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Thursday, 28 April 2016

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फूल और कांटे | कविता | कवि: अयोध्या सिंह 'उपाध्याय' | Phool Aur Kante | Hindi Poem | Poet:- Ayodhyaya Singh 'Upadhyaya' |

फूल और कांटे
     'फूल और कांटे' अयोध्या सिंह 'उपाध्याय' जी द्वारा रचित कविता है | इस कविता में कवि ने यह सन्देश देना चाहा है कि किसी का कर्म ही होता है जो उसे महानता के शिखर पर ले जाते हैं | इसमें उसका जन्म या कुल का कोई हाथ नहीं होता | इस बात को स्पष्ट करने के लिए कवि ने फूल और कांटे का चयन किया |
                                               (१) 
हैं जनम लेते जगह में एक ही,
                                        एक ही पौधा उन्हें है पालता |
रात में उनपर चमकता चाँद भी,
                                        एक ही सी चाँदनी है डालता ||
                                             

                                            (२) 
मेघ उनपर है बरसता एक-सा,
                                        एक-सी उनपर हवाएँ हैं बहीं |
पर सदा ही यह दिखाता है समय,
                                        ढंग उनके एक से होते नहीं ||
                                              (३)
छेदकर काँटा किसीकी उँगलियाँ,
                                        फाड़ देता है किसीका वर वसन |
और प्यारी तितलियों का पर कतर,
                                        भौंर का है बेध देता श्याम तन ||
                                               (४)
फूल लेकर तितलियों को गोद में,
                                        भौंर को अपना अनूठा रस पिला |
निज सुगन्धि औ' निराले रंग में,
                                        है सदा देती कली दिल की खिला ||
                                               (५) 
खटकता है एक सबकी आंख में,
                                         दूसरा है सोहता सुर-सीस पर
किस तरह कुल के बड़ाई काम दे,
                                         जो किसीमें हो बड़प्पन की कसर ||
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Tuesday, 26 April 2016

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शत्रु | अज्ञेय | कहानी | Shatru | Agyey | Hindi Story

      'शत्रु' कहानी अज्ञेय जी द्वारा रचित कहानी है जिसमें ज्ञान को भगवान् स्वप्न में दर्शन देते हैं और उसे अपना प्रतिनिधि घोषित करके संसार का पुनर्निर्माण करने के लिए कहते हैं | ज्ञान संसार में जा के विभिन्न समस्याएं देखता है| पर जब भी वह इनका समाधान करने जाता तो नई समस्याएं आ जाती | अंत में हार मानकर वह 
आत्म-हत्या करने जाता है और तभी...
 १  
     ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिए, और कहा---ज्ञान, मैंने तुम्हे अपना प्रतिनिधि बनाकर संसार में भेजा है | उठो, संसार का पुनर्निर्माण करो |
     ज्ञान जाग पड़ा | उसने देखा, संसार अंधकार से पड़ा है और मानव जाति उस अंधकार में पथभ्रष्ट होकर विनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है | वह ईश्वर का प्रतिनिधि है, तो उसे मानव-जाति को पथ पर लाना होगा, उसका नेता बनकर उसके शत्रु से युद्ध करना होगा |
     और वह जाकर चौराहे पर खड़ा हो गया और सबको सुनाकर कहने लगा---मै मसीह हूँ, पैगम्बर हूँ | भगवान का प्रतिनिधि हूँ | मेरे पास तुम्हारे उद्धार के लिए एक संदेश है |
     लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी | कुछ उसकी ओर देख कर हँस पड़ते, कुछ कहते, पागल है, अधिकांश कहते, यह हमारे धर्म के विरुद्ध शिक्षा देता है, नास्तिक है, इसे मारो ! और बच्चे उसे पत्थर मारा करते |
     आखिर तंग आकर वह एक अँधेरी गली में छिपकर बैठ गया, और सोचेने लगा | उसने निश्चय किया कि मानव-जाति का सबसे बड़ा शत्रु है धर्म, उसी से लड़ना होगा |
     तभी पास कहीं से उसने स्त्री के करुण क्रन्दन की आवाज़ सुनी | उसने देखा, एक स्त्री भूमि पर लेटी है, उसके पास एक बहुत छोटा-सा बच्चा पड़ा है, जो या तो बेहोश है या मर चुका है, क्योंकि उसके शरीर में किसी प्रकार की गति नहीं है |
     ज्ञान ने पूछा---बहन, क्यों रोती हो ?
     उस स्त्री ने कहा---मैंने एक विधर्मी से विवाह किया था | जब लोगों को इसका पता चला, तब उन्होंने उसे मार डाला और मुझे निकाल दिया | मेरा बच्चा भूख से मर रहा है |
     ज्ञान का निश्चय और दृढ हो गया | उसने कहा---तुम मेरे साथ आओ, मै तुम्हारी रक्षा करूँगा |---और उसे अपने साथ ले गया |
     ज्ञान ने धर्म के विरुद्ध प्रचार शुरू किया | उसने कहा---धर्म झूठा बंधन है | परमात्मा एक है, अबाध है और धर्म से परे है | धर्म हमे सीमा में रखता है, रोकता है, परमात्मा से अलग रखता है, अतः शत्रु है ?
     लेकिन किसी ने कहा---जो व्यक्ति पराई और बहिष्कृता औरत को अपने साथ रखता है, उसकी बात हम क्यों सुने ? वह समाज से पतित है, नीच है |
     तब लोगों ने उसे समाजच्युत करके बाहर निकाल दिया |
ज्ञान ने देखा कि धर्म से लड़ने के पहले समाज से लड़ना है | जब तक समाज पर विजय नहीं मिलती, तब तक धर्म का खंडन नहीं हो सकता |
     तब वह इसी प्रकार करने लगा---वह कहने लगा---धर्मध्वजी ये पुगी-पुरोहित, मुल्ला, ये कौन हैं ? इन्हें क्या अधिकार है हमारे जीवन को बाँध रखने कर ? आओ, हम इन्हें दूर कर दे, एक स्वतंत्र समाज की रचना करे, ताकि हम उन्नति के पथ पर बढ़ सके |
     तब एक दिन विदेशी सरकार के दो सिपाही आकर उसे पकड़ ले गए | क्योंकि वह वर्गों में परस्पर विरोध जगा रहा था |
     ज्ञान जब जेल काटकर बाहर निकला, तब उसकी छाती में इन विदेशियों के प्रति विद्रोह धधक रहा था | यही तो हमारी क्षुद्रताओं को स्थायी बनाये रखते हैं, और लाभ उठाते हैं | पहले अपने को विदेशी प्रभुत्व से मुक्त करना होगा, तब..और वह गुप्त रूप से विदेश्यों के विरुद्ध लड़ाई का आयोजन करने लगा |
     एक दिन उसके पास एक विदेशी आदमी आया | वह मैले-कुचले फटे -पुराने खाकी पहने हुए था | मुख पर झुर्रियाँ पड़ी थीं, आँखों में एक तीखा दर्द था | उसने ज्ञान से कहा---आप मुझे कुछ काम दे, ताकि मै अपनी रोजी कमा सकूँ | मैं विदेशी हूँ | आपके देश में भूखा मर रहा हूँ | कोई भी काम मुझे दे, मै करूँगा, आप परीक्षा लें | मेरे पास रोटी का टुकड़ा भी नही है |
     ज्ञान ने खिन्न होकर कहा---मेरी दशा तुमसे कुछ अच्छी नही है, मैं भी भूखा हूँ |
वह विदेशी एकाएक पिघल-सा गया | बोला---अच्छा, मैं आपके दुःख से बहुत दुखी हूँ | मुझे अपना भाई समझे | यदि आपस में सहानुभूति हो, तो भूखे मरना मामूली बात है | परमात्मा आपकी रक्षा करे | मैं आपके लिए कुछ कर सकता हूँ ?
     ज्ञान ने देखा कि देशी-विदेशी का प्रश्न तब उठता है, जब पेट भरा हो | सबसे पहला शत्रु तो यह भूख ही है, पहले भूख को जीतना होगा, तभी आगे कुछ सोचा जा सकेगा...
     और उसने 'भूख के लड़ाकों' का एक दल बनाना शुरू किया, जिसका उद्देश्य था अमीरों से धन छीनकर सबमे समान रूप से वितरण करना, भूखों को रोटी देना इत्यादि, लेकिन जब धनिकों को इस बात का पता चला तब उन्होंने एक दिन चुपचाप अपने चरों द्वारा उसे पकड़वा मंगाया और एक पहाड़ी किले में कैद कर दिया | वहाँ एकांत में वे उसे सताने के लिए नित्य एक मुट्ठी चबेना और एक लोटा पानी दे देते, बस |
     धीरे-धीरे ज्ञान का हृदय ग्लानि से भरने लगा | जीवन उसे बोझ-सा जान पड़ने लगा | निरंतर यह भाव उसके भीतर जगा करता कि मैं, ज्ञान, परमात्मा का प्रतिनिधि, इतना विवश हूँ कि पेट-भर रोटी का प्रबंध मेरे लिए असंभव है ? यदि ऐसा है, तो कितना व्यर्थ है यह जीवन, कितना छूंछा, कितना बेमानी |
     एक दिन वह किले की दीवार पर चढ़ गया | बाहर खाई में भरा हुआ पानी देखते-देखते उसे एकदम से विचार आया, और उसने यह निश्चय कर लिया कि वह उसमें कूदकर प्राण खो देगा | परमात्मा के पास लौटकर प्रार्थना करेगा कि मुझे इस भार से मुक्त करो, मैं तुम्हारा प्रतिनिधि तो हूँ, लेकिन ऐसे संसार में मेरा स्थान नही है |
     वह स्थिर मुग्ध दृष्टी से खाई के पानी में देखने लगा | वह कूदने को ही था की एकाएक उसने देखा, पानी में उसका प्रतिबिम्ब झलक रहा है और मानो कह रहा है---बस, अपने आपसे लड़ चुके ?
     ज्ञान सहमकर रुक गया, फिर धीरे-धीरे दीवार पर से नीचे उतर औया और किले में चक्कर काटने लगा |
     और उसने जान लिया कि जीवन की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि हम निरंतर आसानी की ओर आकृष्ट होते हैं |



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Sunday, 17 April 2016

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कलियों से | हरिवंश राय बच्चन | कविता | Kaliyon Se | Hindi poem | Harivansh Rai Bachchan |

          
कलियों से 
'कलियों से' कविता हिन्दी के महान कवि  हरिवंश राय बच्चन जी की रचना है| कवि कलियों से क्षमा मांगता है  क्योंकि उसने बचपन से उन्हें तोड़ कर उनपर अत्याचार किये हैं जिसपर कलियां उसे धन्यवाद देती हैं कि उसने उन्हें तोड़ कर उनकी उपयोगिता बढ़ाई है क्योंकि वे तो तोड़े न जाने के बाद भी कुम्हला के गिर ही जातीं... 
                 'अहे, मैंने कलियों के साथ,
    जब मेरा चंचल बचपन था,
    महा निर्दयी मेरा    मन था,
    अत्याचार अनेक   किये थे,
    कलियों को दुःख दीर्घ दिए थे,
    तोड़ इन्हें बागों से लाता,
    छेद-छेद कर हार बनाता !
    क्रूर कार्य, यह कैसे करता,
    सोच इसे हूँ आहें भरता |
कलियों, तुमसे क्षमा माँगते ये अपराधी हाथ |'
            'अहे, वह मेरे प्रति उपकार !
    कुछ दिन में कुम्हला ही जाती,
    गिरकर भूमि-समाधि बनाती |
    कौन जानता मेरा खिलना ?
    कौन, नाज़ से डुलना-हिलना ?
    कौन गोद में मुझको लेता ?
    कौन प्रेम का परिचय देता ?
    मुझे तोड़, की बड़ी भलाई,
    काम किसी के तो कुछ आई ,
बनी रही दो-चार घड़ी तो किसी गले का हार |'
            'अहे, वह क्षणिक प्रेम का जोश !
    सरस-सुगंधित थी तू जब तक,
    बनी स्नेह-भाजन थी तब तक |
    जहाँ तनिक-सी तू मुरझाई,
    फेंक दी गई, दूर हटाई |
इसी प्रेम से क्या तेरा हो जाता है परितोष ?'
            'बदलता पल-पल पर संसार 
    हृदय विश्व के साथ बदलता,
    प्रेम कहाँ फिर लहे अटलता ?
    इससे केवल यही सोचकर,
    लेती हूँ संतोष हृदय भर----
मुझको भी था किया किसी ने कभी हृदय से प्यार !'

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Tuesday, 5 April 2016

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चन्दा-II | जयशंकर प्रसाद | कहानी | Chanda-II | Jayshankar Prasad | Hindi story|

'चन्दा' कहानी के इस भाग में;
     जब हीरा लौट के नहीं आता तो रजा उसकी मदद के लिए एक कोल को  भेजेते हैं | वह कोल रामू होता है जो हीरा के मदद करने की जगह उसे मौत के मुंह में धकेल देता है और वह कोल-पति बन जाता | चन्दा हीरा के क़त्ल... 
     यह बात राजा साहब को विदित हुई | उन्होंने उसकी मदद के लिए कोलों को जाने की आज्ञा दी | रामू उस अवसर पर था | उसने सबके पहले जाने के लिए पैर बढ़ाया, और चला | वहां जब पहुंचा, तो उस दृश्य को देखकर घबड़ा गया, और हीरा से कहा---हाथ ढीला कर; जब यह छोड़ने लगे, तब गोली मारूँ, नहीं तो सम्भव है कि तुम्ही को लग जाय |
     हीरा---नहीं, तुम गोली मारो |
     रामू---तुम छोड़ो तो मैं वार करूं |
     हीरा---नहीं, यह अच्छा नहीं होगा |
     रामू---तुम उसे छोड़ो, मैं अभी मारता हूँ |
     हीरा---नहीं, तुम वार करो |
     रामू---वार करने से संभव है कि उछले और तुम्हारे हाथ छूट जाएँ,तो यह तोड़ डालेगा |
     हीरा---नहीं, तुम मार लो, मेरा हाथ ढीला हुआ जाता है |
     रामू---तुम हद करते हो, मानते नहीं |
     इतने में हीरा का हाथ कुछ बात-चीत करते-करते ढीला पड़ा; वह चीता उछलकर हीरा के कमर के को पकड़कर तोड़ने लगा |
     रामू खड़ा होकर देख रहा है, और पैशाचिक आकृति उस घृणित पशु के मुख पर लक्षित हो रही, और वह हँस रहा है |
     हीरा टूटी हुई साँस से कहने लगा---अब भी मार ले |
     रामू ने कहा---अब तू मर ले, तब वह भी मारा जायेगा | तूने हमारा हृदय निकाल लिया है, तूने हमारा घोर अपमान किया है, उसी का प्रतिफल है | इसे भोग |
     हीरा को चीता खाये डालता है; पर उसने कहा---नीच ! तू जानता है कि 'चंदा' अब मेरी होगी | कभी नहीं ! तू नीच है---इस चीते से भी भयंकर जानवर हो |
     हीरा ने टूटी हुई आवाज से कहा-तुझे इस विश्वासघात का फल शीघ्र मिलेगा और चन्दा फिर हमसे मिलेगी | चन्दा...प्यारी..च...
     इतना उसके मुख से निकला ही था की चीते ने उसका सिर दांतों के तले दाब लिया | रामू देखकर पैशाचिक हँसी हँस रहा था | हीरा के  समाप्त हो जाने पर रामू लौट आया, और झूठी बातें बनाकर राजा से कहा कि उसको हमारे जाने के पहले ही चीता ने मार दिया | राजा बहुत दुःखी हुए, और जंगल की सर्दारी रामू को मिली |
     वसंत की राका चारों ओर अनूठा दृश्य दिखा रही है | चन्द्रमा न मालूम किस लक्ष्य की ओर दौड़ा चला जा रहा है; कुछ पूछने से भी नहीं बताता | कुटज की कली का परिमल लिए पवन भी न मालूम कहाँ दौड़ रहा है, उसका भी कुछ समझ नहीं पड़ता | उसी तरह, चंद्रप्रभा के तीर पर बैठी हुई कोल-कुमारी का कोमल कंठ-स्वर भी किस धुन में है---नही ज्ञात होता |
     अकस्मात गोली की आवाज ने उसे चौंका दिया | गाने के समय जो उसका मुख उद्वेग और करुणा से पूर्ण दिखाई पड़ता था, वह घृणा और क्रोध से रंजित हो गया, और वह उठकर पुच्छमर्दिता  सिंहनी के समान तनकर खड़ी हो गई, और धीरे से कहा---यही समय है | ज्ञात होता है, राजा इस समय शिकार खेलने पुनः आ गये हैं---बस वह अपने वस्त्र को ठीक करके कोल-बालक बन गई, और कमर में से एक चमचमाता हुआ छूरा निकालकर चूमा | वह चांदनी में चमकने लगा | फिर वह कहने लगी---यद्यपि तुमने हीरा का रक्तपान कर लिया है, लेकिन पिता ने रामू से तुम्हे ले लिया था | अब तुम हमारे हाथ में हो, तुम्हें आज रामू का भी खून पीना होगा |
     इतना कहकर वह गोली के शब्द की ओर लक्ष्य करके चली | देखा कि तहखाने में राजासाहब बैठे हैं | शेर को गोली लग चुकी है, और वह भाग गया है, उसका पता नही लग रहा है, रामू सर्दार है, अतएव उसको खोजने के लिए आज्ञा हुई, वह शीघ्र ही सन्नद्ध हुआ | राजा ने कहा---कोई साथी लेते जाओ |  
     पहले तो उसने अस्वीकार किया, पर जब एक कोल-युवक स्वयं साथ चलने को तैयार हुआ, तो वह नही भी न कर सका, और सीधे---जिधर शेर गया था, उसी ओर चला | कोल-बालक भी उसके पीछे है | वहां घाव से व्याकुल शेर चिंघाड़ रहा है, इसने जाते ही ललकारा | उसने तत्काल ही निकलकर वार किया | रामू कम साहसी नहीं था, उसने उसके खुले हुए मुंह में निर्भीक होकर बन्दूक की नाल डाल दी; पर उसके जरा-सा मुहं घुमा लेने से गोली चमड़ा छेदकर पार निकल गई, और शेर ने क्रुद्ध होकर दांत से बन्दूक की नाल दबा ली | अब दोनों एक दुसरे को ढकेलेने लगे; पर कोल-बालक चुपचाप खड़ा है | रामू ने कहा---मार, अब देखता क्या है !
     युवक---तुम इससे बहुत अच्छी तरह लड़ रहे हो |
     रामू---मारता क्यों नहीं ?
     युवक---इसी तरह शायद हीरा से भी लड़ाई हुई थी, क्या तुम नहीं लड़ सकते ?
     रामू---कौन, चन्दा ! तुम हो ? आह, शीघ्र मारो, नहीं तो अब यह सबल हो रहा है |
     चन्दा ने कहा---हाँ, लो, मैं मारती हूँ, इसे छूरे से हमारे सामने तुमने हीरा को मारा था, यह वही छूरा है, यह तुझे दुःख से निश्चय ही छुड़ावेगा---इतना कहकर चन्दा ने रामू की बगल में छूरा उतार दिया | वह छटपटाया | इतने ही में शेर को मौका मिला, वह भी रामू पर टूट पड़ा और उसका इति कर आप भी वहीं गिर पड़ा |
     चन्दा ने अपना छूरा निकाल लिया, और उसको चांदनी में रंगा हुआ देखेने लगी, फिर खिलखिलाकर हंसी और कहा---'दरद दिल काहि सुनाऊं प्यार' ! फिर हंसकर कहा---हीरा ! तुम देखते होगे, अपर अब तो यह छूरा ही दिल की दाह सुनेगा | इतना कहकर अपनी छाती में उसे झोंक लिया और उसी जगह गिर गई, और कहने लगी-हीरा...हम...तुमसे...मिले ही.... ....
     चन्द्रमा अपने चन्द्र प्रकाश में यह सब देख रहा था |


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Thursday, 31 March 2016

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चन्दा -I | जयशंकर 'प्रसाद' | कहानी | Chanda-I | Jayshankar 'Prasad' | Hindi Story|


'चन्दा' दो कोल युवक-युवती की प्रेम कथा है | इस कहानी के लेखक श्री जयशंकर 'प्रसाद' हैं | इस कहानी में चन्दा और हीरा एक दुसरे से प्रेम करते हैं पर चन्दा का सम्बन्ध एक अन्य रामू नामक कोल से तय हो चूका था | रामू हीरा को मारने का प्रयास करता है पर हीरा को जंगल का एक वृद्ध जो कोल-पति है, बचा लेता है | वृद्ध कोल हीरा और चन्दा का ब्याह करा देता है तथा हीरा को अपना पद भी सौंप देता है | जंगल में एक दिन राजा शिकार करने आता है | इस दौरान ...

चैत्र-कृष्णाष्टमी का चन्द्रमा अपना उज्जवल प्रकाश 'चंद्रप्रभा' को निर्मल जल पर डाल रहा है | गिरी-श्रेणी के तरुवर अपने रंग को छोड़कर ध्वलित हो रहे हैं; कल-नादिनी समीर के संग धीरे-धीरे बह रही है | एक शिला-ताल पर बैठी हुई कोल-कुमारी सुरीले स्वर से---'दरद-दिल काहि  सुनाऊँ प्यारे! दरद'... गा रही है |
     गीत अधुरा ही है कि अकस्मात एक कोल-युवक धीर-पद-संचालन करता हुआ उस रमणी के सम्मुख आकर खड़ा हो गया | उसे देखते ही रमणी की हृदय-तंत्री बज उठी | रमणी बाह्य-स्वर भूलकर आन्तरिक स्वर से सुमुधर संगीत गाने लगी और उठकर खड़ी हो गई | प्रणय के वेग को सहन न करके वर्षावारिपूरिता स्रोतस्विनी के समान कोल-कुमार के कंध-कूल से रमणी ने आलिंगन किया |
     दोनों उसी शिला पर बैठ गए, और निनिर्मेष सजल नेत्रों से परस्पर अवलोकन करने लगे | युवती ने कहा----तुम कैसे आये ?
     युवक---जैसे तुमने बुलाया |
     युवती---( हंसकर ) हमने तुम्हे कब बुलाया ! और क्यों बुलाया !
     युवक---गाकर बुलाया और दरद सुनाने के लिए |
     युवती---( दीर्घ निश्वास लेकर ) कैसे क्या करूँ ? पिता ने तो उसी से विवाह करना निश्चय किया है |
     युवक---( उत्तेजना से खड़ा होकर ) तो जो कहो, मै करने के लिए प्रस्तुत हूँ |
     युवती---( चंद्रप्रभा  की ओर दिखाकर ) बस, यही शरण है |
     युवक---तो हमारे लिए कौन दूसरा स्थान है ?
     युवती---मै तो प्रस्तुत हूँ |
     युवक---हम तुम्हारे पहले |
     युवती ने कहा---तो चलो |
     युवक ने मेघ-गर्जन-स्वर से कहा---चलो |
उतरकर चंद्रप्रभा के तट पर आए, और एक शिला पर खड़े हो गए | तब युवती ने कहा---अब विदा !
     युवक ने कहा---किससे ? मै तो तुम्हारे साथ---जब तक सृष्टि रहेगी तब तक ---रहूँगा |
     इतने ही में शाल-वृक्ष के नीचे एक छाया दिखाई पड़ी और वह इन्हीं दोनों की ओर आती हुई दिखाई देने लगी | दोनों ने चकित होकर देखा की एक कोल खड़ा है | उसने गंभीर स्वर से युवती से पुछा---चन्दा  ! तू यहाँ क्यों आई ?
     युवती---तुम पूछनेवाले कौन हो !
     आगंतुक युवक---मै तुम्हारा भावी पति 'रामू' हूँ |
     युवती---मै तुमसे ब्याह न करुँगी |
     आ० यु०---फिर किससे तुम्हारा ब्याह होगा ?
     युवती ने पहले के आये युवक की ओर इंगित करके कहा---इन्हीं से |
     आगन्तक युवक से अब न सहा गया | घूमकर पूछा---क्यों हीरा ! तुम ब्याह करोगे ?
     हीरा---तो इसमें तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?
     रामू---तुम्हे इससे अलग हो जाना चाहिए |
     हीरा--- क्यों, तुम कौन होते हो ?
     रामू---हमारा इससे सम्बन्ध पक्का हो चूका है |
     हीरा---पर जिससे सम्बन्ध होनेवाला है, वह सहमत हो तब न !
     रामू---क्यों चन्दा ! क्या कहती हो ?
     चन्दा---मै तुमसे ब्याह न करुँगी |
     रामू---तो हीरा से भी तुम ब्याह नहीं कर सकती !
     चन्दा---क्यों ?
     रामू---( हीरा से  ) अब हमारा-तुम्हारा फैसला हो जाना चाहिए, क्योंकि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं |
     इतना कहकर हीरे के ऊपर झपटकर उसने अचानक छूरे का वार किया |
     हीरा यद्यपि सचेत हो रहा था; पर उसको सम्हलने में विलम्ब हुआ, इससे घाव लग गया और वह वृक्ष थामकर बैठ गया |इतने में चन्दा जोर से क्रंदन कर उठी---साथ ही के वृद्ध भील आता हुआ दिखाई पड़ा |
     युवती मुंह ढांपकर रो रही है, और युवक रक्ताक्त छूरा लिए, घृणा की दृष्टि से खड़े हुए, हीरा की ओर देख रहा है | विमल चन्द्रिका में चित्र की तरह वे दिखाई दे रहे हैं | वृद्ध को जब चन्दा ने देखा, तो और वेग से रोने लगी | उस दृश्य को देखते ही वृद्ध कोल-पति सब बात समझ गया, और रामू के समीप जाकर छूरा उसके हाथ से ले लिया, और आज्ञा के स्वर में कहा---तुम दोनों हीरा को उठाकर नदी के समीप ले चलो  |
     इतना कहकर वृद्ध उन सबों के साथ आकर नदी-तट  पर जल के समीप खड़ा हो गया | रामू और चन्दा दोनों ने मिलकर उसके घाव को धोया और हीरा के मुंह पर छींटा दिया, जिससे उसकी मूर्छा दूर हुई | तब वृद्ध ने सब बातें हीरा से पूछीं; पूछ लेने पर रामू ने कहा---क्यों, यह सब ठीक है ?
     रामू ने कहा---सब सत्य है |
    वृद्ध---तो तुम अब चन्दा के योग्य नहीं हो, और यह छूरा भी---जिसे हमने तुम्हे दिया था---तुम्हारे योग्य नहीं है | तुम शीघ्र ही हमारे जंगल से चले जाओ, नहीं तो हम तुम्हारा हाल महाराज से कह देंगे, और उसका क्या परिणाम होगा सो तुम स्वयं समझ सकते हो | (हीरा की ओर देखकर) बेटा ! तुम्हारा घाव शीघ्र अच्छा हो जायेगा, घबड़ाना नही, चन्दा तुम्हारी ही होगी |
     यह सुनकर चन्दा और हीरा का मुख प्रसन्नता से चमकने लगा, पर हीरा ने लेटे-ही-लेटे हाथ जोड़कर कहा---पिता ! एक बात कहनी है, यदि आपकी आज्ञा हो |
     वृद्ध---हम समझ गए, बेटा ! रामू विश्वासघाती है |
     हीरा---नहीं पिता ! अब वह ऐसा कार्य नहीं करेगा | आप क्षमा करेंगे, मै ऐसी आशा करता हूँ |
     वृद्ध---जैसी तुम्हारी इच्छा |
     कुछ दिन के बाद जब हीरा अच्छी प्रकार से आरोग्य हो गया, तब उसका ब्याह चन्दा से हो गया | रामू भी उस उत्सव में सम्मिलित हुआ, पर उसका बदन मलीन और चिंतापूर्ण था | वृद्ध कुछ ही काल में अपना पद हीरा को सौंप स्वर्ग को सिधारा | हीरा और चन्दा सुख से विमल चांदनी में बैठकर पहाड़ी झरनों का कल-नाद-मय आनंद-संगीत सुनते थे |
३ 
     अंशुमाली अपनी तीक्ष्ण किरणों से वन्य-देश को परितापित कर रहे हैं | मृग-सिंह एक स्थान पर बैठकर, छाया-सुख में अपने बैर-भाव को भूलकर, ऊंघ रहे हैं | चंद्रप्रभा के तट पर पहाड़ी की एक गुहा में जहाँ कि छतनार पेड़ों की छाया उष्ण वायु को भी शीतल कर देती है, हीरा और चन्दा बैठे हैं | हृदय के अनन्त विकास से उनका मुख प्रफुल्लित दिखाई पड़ता है | उन्हें वस्त्र के लिए वृक्षगण वल्कल देते हैं; भोजन के लिये  प्याज-मेवा इत्यादि जंगली सुस्वादु फल, शीतल-स्वच्छंद पवन; निवास के लिये गिरी-गुहा; प्राकृतिक झरनों का शीतल जल उनके सब  अभावों को दूर करता है, और सबल तथा स्वच्छंद बनाने में ये सब सहायता देते हैं | उन्हें किसी की अपेक्षा नहीं करनी पड़ती | अस्तु, उन्हें सब सुखों से आनंदित व्यक्तिद्वय 'चंद्रप्रभा' के जल का कल-नाद सुनकर अपनी हृदय-वीणा को बजाते हैं |
     चन्दा---प्रिय ! आज उदासीन क्यों हो !
     हीरा---नहीं तो, मैं यह सोच रहा हूँ कि इस वन में राजा आनेवाले हैं | हमलोग यद्यपि अधीन नहीं हैं, तो भी उन्हें शिकार खेलाया जाता है, और इसमें हमलोगों की कुछ हानि भी नही है | उसके प्रतिकार में हमलोगों को कुछ मिलता है, पर आजकल इस वन में जानवर दिखाई नहीं पड़ते | इसलिये सोचता हूँ कि कोई शेर या छोटा चीता ही मिल जाता, तो कार्य हो जाता |
     चन्दा---खोज किया था ?
     हीरा---हाँ, आदमी तो गया है |
     इतने में एक कोल दौड़ता हुआ आया, और कहा---राजा आ गये हैं और तहखाने में बैठे हैं | एक तेंदुआ भी दिखाई दिया है |
     हीरा का मुख प्रसन्नता से चमकने लगा, और वह अपना कुल्हाड़ा सम्हालकर उस आगंतुक के साथ वहां पहुंचा, जहाँ शिकार का आयोजन हो चूका था |
     राजा साहब झंझरी में बन्दूक की नाल रखे हुए ताक रहे हैं | एक ओर से बाजा बज उठा | एक चीता भागता हुआ सामने से निकला | राजा साहब ने उस पर वार किया | गोली लगी, पर चमड़े को छेदती हुई पार हो गई; इससे वह जानवर भागकर निकल गया | अब तो राजा साहब बहुत ही दुःखित  हुए | हीरा को बुलाकर कहा---क्यों जी, यह जानवर नही मिलेगा ?
     उस वीर कोल ने कहा---क्यों नही ?
     इतना कहकर वह उसी ओर चला | झाड़ी में जहाँ वह चीता घाव से व्याकुल बैठा हुआ था, वहां पहुंचकर उसने देखना आरम्भ किया |क्रोध से भरा हुआ चीता उस कोल-युवक को देखते ही झपटा | युवक असावधानी के कारण वार न कर सका, पर दोनों हाथों से उस भयानक जंतु की गर्दन को पकड़ लिया, और उसने भी इसके कंधे पर अपने दोनों पंजों को जमा दिया |
     दोनों में बल-प्रयोग होने लगा | थोड़ी देर में दोनों जमीन पर लेट गये |

शेष अगले भाग में...



     
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Saturday, 26 March 2016

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महानाश की भट्ठी-बाल कृष्ण शर्मा 'नवीन'|Mahanash ki bhatthi|Hindi poem|Poet-Bal Krishna Sharma 'Naveen'|

महानाश की भट्ठी 

अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी |
बढ़ आने दे अपनी लपटें लप-लप  करती हत्यारी |
धुआँधार अम्बर हो जाये, क्षितिज लालिमा में रंजित हो,
वसुधा की विभूतियाँ आज चिता की गोदी में संचित हों,
एक-एक क्षण में सहस्त्र युग के जलने की हो तयारी|
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी |

रँगे खून से हाथ, लोचनों में प्रपंच का कज्जल छाया,
मस्तिष्क में मोह-मदिरा ने अपना चिर नवरंग जमाया|
हिय में घृणा आन घुश बैठी, स्नेह-भावनाएं रोती हैं,
अंतर में कायरता की कुत्सित लीलाएँ होती हैं |
अरे अग्नि के पुंज, कहाँ हैं तेरी दहन-शक्तियाँ सारी ?
बढ़ आने दे अपनी लपटें लप-लप  करती हत्यारी |

जड़ता बनी धर्म-भूषण, शठता आचार्य बन बैठी,
भूत-दया का रूप धरे इस ओर नपुंसकता ऐंठी,
सामाजिक औदास्य-भाव बन गया भाग्य का फेर निराला,
निरुत्साह, दौर्बल्य, भीति-भय का पड़ गया हृदय पर पाला;
कर दे नष्ट आज सदियों का संचित यह कुभाव अविचारी |
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी !
Photo by pakorn
















शत-शत सुख की अभिलाषाएँ छिन में छार हो जाएँ,
कई सहस्त्र हृदय की दुर्बलताएँ पल-भर में खो जाये,
लक्ष-लक्ष लोचनों में चमके प्राण-दान की निर्मल ज्वाला,
कोटि-कोटि कंठों से सर्वनाश का हो उदघोष निराला,
झमक झूम झकझोर भस्म कर दे निसर्ग की तुंग अटारी!
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी!

मान और मर्यादा छूटी, बिखर गयी गरिमा छन-भर में.
रण-हुँकारकारिणी शक्ति लुप्त हो गयी आह! अम्बर में;
गिरि-गह्वर में, वन-उपवन में अथवा किसी शून्य प्रान्तर में,
डोल रहे हैं कुछ दीवाने ले आशा-प्रदीप निज कर में,
कब से खोज रहे हैं तुमको सर्वनाश की ओ चिनगारी!
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू सर्वनाश की भट्ठी प्यारी!

आज सव्यसाची को खाण्डव विपिन-दहन फिर से दिखला दे,
अग्नि-कुमारों को आग से खेलना तू फिर से सिखला दे,
दिखला दे कि मरण ही जीवन है, रण-प्रांगण ही गीता है,
सिखला दे, ओ आग ! कि महाशांति तुझसे ही परिणीता है,
तेरी अनुगामिनी बनी नव प्रातः की ऊषा सुकुमारी,
क्यों झिझके री, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी !

चट-चट करती धू-धू करती हा-हा-हू हूकार मचा दे,
अपने शोलों के फूलों से मेरा आँगन आज रचा दे,
अरी, नचा दे अपनी लपटें इधर-उधर सब ओर निराली,
काली की जिह्वा-सी रक्तशोषिका लौ लपके मतवाली,
धुआँ उठे, पाखण्ड जले, हिमखण्ड सुने, देखें त्रिपुरारी,
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्टी प्यारी!

अम्बर में अंगारें बरसें, जलद धुआँ बनकर मंडराएँ 
वज्र्घोश से सुप्त रोष की भौहें विकराली चढ़ जाएँ,
अंगड़ाई लेकर विद्रोह फट पड़े अब ज्वलंत मुधर-सा,
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी!





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