Wednesday, 26 October 2016

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इन्सान के दुशमन वैज्ञानिक | हिंदी लेख | राजेन्द्र त्यागी | Insaan Ke Dushman | Hindi Essay| Ranjendra Tyagi

   'इन्सान के दुश्मन वैज्ञानिक' राजेंद्र त्यागी जी द्वारा रचित एक व्यंगात्मक लेख है जिसमे लेखक ने वैज्ञानिकों के जीवों के लुप्त होने की चिंता को अधिक महत्व न देकर मनुष्य में लुप्त हो रही मनुष्यता का ज़िक्र किया | लेखक ने अपनी चिंता इस बात पर भी व्यक्त की है की यदि दो इन्सान और जानवर के जींस मिलाकर ने जीव की उत्पत्ति की गई तो इसके क्या संभवित परिणाम क्या होंगे |



       जीव वैज्ञानिक अब मानव व जानवरों के जींस मिलाकर नया जीव उत्पन्न करने की  तैयारी में हैं | इससे पूर्व चूहे को सुपर चूहा बनाया जा चूका है | सुना हैं, गिद्धों की पैदावार बढ़ाने में भी जीव विज्ञानी काफ़ी सफलता प्राप्त कर चुके हैं | लगता है कि जीव विज्ञानी इंसान विरोधी हो गए हैं | कारण स्पष्ट  है, बन्दर-कुत्ते, चूहे-बिल्ली, भेड़-बकरी पता नहीं किस-किस जानवर के भविष्य को लेकर जीव विज्ञानी चिंतित हैं, किन्तु इंसान से गायब इंसानियत उनकी चिंता का विषय नहीं है | इंसान को सुपर इंसान बनाने की बात उनके भेजे में नहीं आ रही है | इंसानों की संख्या निरंतर घट रही है, यह उनके लिए चिंता का विषय नहीं है | इसके विपरीत जनसंख्या-नियंत्रण पर अवश्य जोर दे रहे हैं | वे नहीं जानते हैं की जिनकी बढती पैदावार तुम्हारी चिंता का विषय है, उनमें इंसान हैं, कितने | उन्हें तो इंसान की शक्ल-ओ-सूरत के सभी जीव इंसान नजर आते हैं | चूहे-बिल्ली अथवा गिद्ध हमारे लिए ज्यादा चिंता का विषय नहीं है | हमारी चिंता का विषय तो व नया जीव है, जिसे मानव व जानवर के संयुक्त जीन्स  से बनाने की तयारी चल रही है | इस विषय को लेकर हमारी चिंता द्विआयामी है | वैज्ञानिकों का इरादा यदि जानवर के जींस में मानव जींस आरोपित कर उत्तम किस्म का जानवर बनाना है, तो कल्पना करो कि नये किस्म के उस जीव का चरित्र कैसा होगा ? अभी इस विषय में कल्पना ही की जा सकती है, क्योंकि अभी इस बारे में विज्ञानी भी कसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं |
     हमारा मानना है कि वह नया जानवर इस सृष्टि का सर्वाधिक खतरनाक जानवर होगा | कारण स्पष्ट है, जानवर भले ही किसी भी रूप में हो, इंसान उन्हें खतरनाक ही मानकर चलता है |एक-दो दुधारुवों को छोड़कर, मगर डरता उनसे भी है | पुन: कल्पना कीजिए, जब जानवर के चरित्र में मानवीय सद्गुण व्याप्त हो जाएँगे, तो स्थिति क्या होगी ? जानवर भी बलात्कारी हो जाएँगे | भ्रष्टाचारी हो जाएँगे, असत्य भाषी हो जाएँगे, लैग-पुलर हो जायेंगे | अभी तक कहा जाता है, 'आदमी जानवर से ज्यादा खतरनाक है!' तब क्या स्थिति इसके विपरीत नहीं हो जाएगी | जानवर आदमी से ज़्यादा खतरनाक नहीं हो जाएगा?
     अब जरा दूसरी संभावना पर गौर कीजिये | इस नए शोध से यदि आदमी में जानवर के गुण आ गए, तो वह सुपर मैन होगा या नरपिशाच? नरपिशाच की कल्पना मात्र से ही क्या पसीने नहीं आने लगते हैं? स्पष्ट है कि वैज्ञानिक यदि नरपिशाच निर्मित करने पर विचार कर रहे हैं, तो जो थोड़े बहुत इंसान शेष हैं भी, तब भी वे स्वर्ग की ओर पलायन कर जाएँगे | और इंसान ढूंढे नहीं मिलेगा | जानवर तो जानवर है ही, इंसान के भेष में भी जानवरों  की तादाद बढ़ जाएगी | अब आप ही बताइए, क्या हमारी चिंता जायज़ नहीं है |
     जीव विज्ञानी गिद्धों की घटती पैदावार को लेकर चिंतित हैं | ऊर्जा गिद्धों की पैदावार बढाने में लगा रहे हैं | सुना है, सरकार भी इस विषय को लाकर काफी चिंतित है | सरकार की चिंता को लेकर हमें कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि सजातीय के प्रति चिंतित होना जीवों का स्वभाव है | सरकार नामक गठबंधन में सामिल तत्वों कुछ हों या न हों, किन्तु उनके जीव होने से इंकार नहीं किया जा सकता |
     वैसे, भी सरकारों का सरोकार मुख्य रूप में चिंता और चिंतन से ही है, अत: गिद्धों के प्रति उनका मोह आश्चर्य का विषय नहीं है | आश्चर्य हमें वैज्ञानिकों की सोच को लेकर है, क्योंकि हम उन्हें बुद्धूजीवी नहीं बुद्धिजीवी मानते हैं और गिद्धों का विजातीय मानते हैं | हमारा मानना है कि कम से कम वैज्ञानिकों का मुख्य उद्देश्य तो मानव सेवा ही है | फिर न जाने क्यों, उन्हें अचानक गिद्ध मोह हो गया? क्यों उनकी पैदावार बढ़ाने में अभियान चला रहे हैं? पता नहीं क्यों अपनी ऊर्जा उनका उत्पादन बढ़ाने में ज़ाया करने पर वे उतारू हैं? इसे सोहबत का असर भी कहा जा सकता है और परिस्थतिजन्य अन्य कारण भी |
     अभियान केवल गिद्धों की पैदावार को लेकर ही चलाया जाता तो भी हमारी चिंता का वजन ज्यादा न होता , हमारे लिए चिंता सरकारी स्तर की होती | चिंता का वज़न वजनी होने का कारण इंसानों की अपेक्षा गिद्दों को कहीं अधिक महत्व देना है |
     गिद्धों की पैदावार घट रही है, यह सुनकर भी आश्चर्य होता है और इंसानियत विरोधी ऐसे लोगों  की बुद्धि पर तरस भी आता है | वास्तविकता तो यह है कि पैदावार गिद्धों की नहीं, इंसानों की घट रही है | गिद्ध एक ढूंढो, हज़ार मिलते हैं और इंसानों हज़ार के बीच एक भी मुश्किल से!
     हम इतना अवश्य स्वीकारते हैं कि मरे जानवरों को आहार बनाने वाले गिद्धनुमा विशाल परिंदे आसमान में परिक्रमा करते अब नहीं दिखाई पड़ते, लेकिन उनकी न तो उनकी संख्या में ही कमी आई और न ही उनका पैदवार घटी है, केवल स्वरुप बदला है |
     परिवर्तित स्वरुप को पहचानो और अपनी दृष्टि बदलो, चारों ओर गिद्ध ही गिद्ध नज़र आएँगे | उनके स्वरुप में ही नहीं, स्वभाव में भी परिवर्तन आया है | परिंदे गिद्ध मृत देह का भक्षण करते थे, परिवर्तित गिद्ध जीवित को ही अपना आहार बना रहे हैं |
     परिंदे पर्यावरण के लिए लाभदायक होते होंगे, हम इनकार नहीं करते, मगर विचारणीय प्रश्न यह भी है कि परिवर्तित गिद्ध समाज के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं |
     खैर जो भी है, खोज गिद्धों की नहीं, जटायु की होंनी चाहिए और उन्हीं  की घटती पैदावार चिंता का विषय होना चाहिए | लुप्त होते गिद्धों के लिए, सरकार व वैज्ञानिकों को लुप्त होती इंसानियत की चिंता होनी चाहिए | इंसानियत वाले सुपर इन्सान बनाने के प्रयास करने चाहिए |

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Monday, 3 October 2016

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राष्ट्रीयता | हिंदी लेख |गणेशशंकर विद्यार्थी | Rashtreeyta | Hindi Essay | Ganesh Shankar Vidyarthi |

राष्ट्रीयता 

भारत में हम राष्ट्रीयता की पुकार सुन चुके हैं | हमें भारत के उच्च और उज्वल भविष्य का विश्वास है | हमें विश्वास है कि हमारी बाढ़ किसी के रोके नहीं रुक सकती |

देश में कहीं-कहीं राष्ट्रीयता के भाव को समझने में गहरी और भद्दी भूल की जा रही है | आये दिन हम इस भूल के अनेकों प्रमाण पाते हैं | यदि इस भाव के अर्थ भली-भाँती समझ लिए गए होते तो इस विषय में बहुत-सी अनर्गल और अस्पष्ट बातें सुनने में न आतीं | राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है | राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है | राष्ट्रीयता सामजिक बन्धनों का घेरा नहीं है | राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है | इसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं | प्राकृतिक विशेषता और भिन्नता देश को संसार से अलग और स्पष्ट करती है और उसके निवासियों को एक विशेष बंधन-किसी सादृश्य के बंधन-से बंधती है | राष्ट्र पराधीनता के पालने में नहीं पलता | स्वाधीन देश ही राष्ट्रों की भूमि है, क्योंकि पुच्छ-विहीन पशु हों तो हों, परन्तु अपना शासन अपने हाथों में न रखने वाले राष्ट्र नहीं होते | राष्ट्रीयता का भाव मानव-उन्नति की एक सीढ़ी है | उसका उदय नितांत स्वाभाविक रीति से हुआ | यूरोप के देशों में यह सबसे पहले जन्मा |
     मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊँचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्राण तक दे सके | समय की गति के साथ आदर्शों में परिवर्तन हुए | धर्म के आदर्श के लिए लोगों ने जान दी और तन कटाया | परन्तु संसार के भिन्न-भिन्न धर्मों के संघर्षण, एक-एक देश में अनेक धर्मों के होने तथा धार्मिक भावों की प्रधानता से देश के व्यापार, कला-कौशल और सभ्यता की उन्नति में रूकावट पड़ने से, अंत में धीरे-धीरे धर्म का पक्षपात कम हो चला और लोगों के सामने  देश-प्रेम का स्वाभाविक आदर्श सामने आ गया | जो प्राचीन काल में धर्म के नाम पर कटते-मरते थे, आज उनकी संतति देश के नाम पर मरती है | पुराने अच्छे थे या ये नये, इस पर बहस करना फिजूल ही है, पर उनमें भी जीवन था और इनमें भी जीवन है | वे भी त्याग करना जानते थे और ये भी और उन अभागों से लाख दर्जे अच्छे और सौभाग्यवान हैं जिनके सामने कोई आदर्श नहीं और जो हर बात में मौत से डरते हैं | ये पिछले आदमी अपने देश के बोझ और अपनी माता की कोख के कलंक हैं | देश-प्रेम का भाव इंग्लैंड में उस समय उदय हो चूका था, जब स्पेन के कैथोलिक राजा फिलिप ने इंग्लैंड पर अजेय जहाजी बेड़े आरमेड़ा द्वारा चढ़ाई की थी, क्योंकि इंग्लैंड के कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, दोनों प्रकार के ईसाइयों ने देश के शत्रु का एक-सा स्वागत किया | फ़्रांस की राज्यक्रांति ने राष्ट्रीयता को पूरे वैभव से खिला दिया | इस प्रकाशमान रूप को देखकर गिरे हुए देशों को आशा का मधुर सन्देश मिला | १९वीं  शताब्दी थी | वर्तमान जर्मनी का उदय इसी शताब्दी में हुआ | पराधीन इटली ने स्वेच्छाचारी आस्ट्रिया के बन्धनों से मुक्ति पाई | यूनान को स्वाधीनता मिली और बालकन के यूनान को स्वाधीनता मिली और बालकन के अन्य राष्ट्र भी कब्रों से सर निकाल कर उठ पड़े | गिरे हुए पूर्व ने भी अपने विभूति दिखाई | बाहर वाले उसे दोनों हाथों से लूट रहे थे | उसे चैतन्यता प्राप्त हुई | उसने अँगड़ाई ली और चोरों के कान खड़े हो गये | उसने संसार की गति की ओर दृष्टि फेरी | देखा, संसार को एक नया प्रकाश मिल गया है और जाना कि स्वार्थपरायणता के इस अंधकर को बिना उस प्रकाश के पार करना असम्भव है |
     उसके मन में हिलोरें उठीं और अब हम उन हिलोरों के रत्न देख रहे हैं | जापान एक रत्न है-ऐसा चमकता हुआ कि  राष्ट्रीयता उसे कहीं भी पेश कर सकती है | लहर रुकी नहीं | बढ़ी और खूब बढ़ी | अफीमची चीन को उसने जगाया और पराधीन भारत को उसने चेताया | फारस में उसने जागृति फैलाई और एशिया के जंगलों और खोहों तक में राष्ट्रीयता की प्रतिध्वनि इस समय किसी न किसी रूप में उसने पहुँचाई | यह संसार की लहर है | इसे रोका नहीं जा सकता | वे स्वेच्छाचारी अपनी हाथ तोड़ लेंगे-जो उसे रोकेंगे और उन मुर्दों की खाक का भी पता नहीं लगेगा - जो इसके सन्देश को नहीं सुनेगे | भारत में हम राष्ट्रीयता की पुकार सुन चुके हैं | हमें भारत के उच्च और उज्वल भविष्य का विश्वास है | हमें विश्वास है कि हमारी बाढ़ किसी के रोके नहीं रुक सकती | रास्ते में रोकने वाली चट्टानें आ सकती हैं | बिना चट्टानें पानी की किसी बाढ़ को  नहीं टोक सकतीं, परन्तु एक बात है, हमें जान-बूझकर मूर्ख नहीं बनना चाहिए | ऊटपटांग रास्ते नहीं नापने चाहिए |
     कुछ लोग 'हिन्दू राष्ट्र' -'हिन्दू राष्ट्र' चिल्लाते हैं | हमें क्षमा किया जाय, यदि हम कहें-नहीं, हम इस बात पर जोर दें- कि वे एक बड़ी भारी भूल कर रहे हैं और उन्होंने अभी तक 'राष्ट्र शब्द के अर्थ ही नहीं समझे | हम भविष्यवक्ता नहीं, पर अवस्था हमसे कहती है कि अब संसार में 'हिन्दू राष्ट्र' नहीं हो सकता, क्योंकि राष्ट्र का होना उसी समय संभव है, जब देश का शासन देशवालों के हाथ में हो और यदि मान लिया जाय कि आज भारत स्वाधीन हो जाये, या इंग्लैंड उसे औपनिवेशिक स्वराज्य दे दे, तो भी हिन्दू ही भारतीय राष्ट्र के सब कुछ न होंगे और जो ऐसा समझते हैं- हृदय से या केवल लोगों को प्रसन्न करने के लिए-वे भूल कर रहे हैं और देश को हानि पहुँचा रहे हैं | वे लोग भी इसी प्रकार की भूलकर रहे हैं जो टर्की या काबुल, मक्का या जेद्दा का स्वप्न देखते हैं, क्योंकि वे उनकी जन्मभूमि नहीं और इसमें कुछ भी कटुता न समझे जानी चाहिए, यदि हम यह कहें कि उनकी कब्रें इसी देश में बनेंगी और उनके मरिसेये- यदि वे इस योग्य होंगे तो - इसी देश में गाये जायेंगे, परन्तु हमारा प्रतिपक्षी, नहीं, राष्ट्रीयता का विपक्षी मुँह बिचका कर कह सकता है कि राष्ट्रीयता स्वार्थों की खान है | देख लो इस महायुद्ध को और इंकार करने का साहस करो की संसार के राष्ट्र पक्के स्वार्थी नहीं है ? लोहे से डॉक्टर का घाव चीरने वाला चाकू और रेल की पटरियाँ बनती हैं और इसी लोहे से हत्यारे का छूरा और लड़ाई की तोपें भी बनती हैं | सूर्य की प्रकाश फूलों को रंग-बिरंगा बनाता है पर वह बेचारा मुर्दा लाश का क्या करें, जो उसके लगते ही सड़कर बदबू देने लगती है | हम राष्ट्रीयता के अनुयायी हैं, पर वही हमारी सब कुछ नहीं, वक केवल हमारे देश की उन्नति का उपाय-भर है |
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Sunday, 18 September 2016

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ग्राम | हिंदी कहानी | जय शंकर प्रासाद | Gram | Hindi story | Jayashankar Prasad

'ग्राम' कहानी जय शंकर प्रसाद जी द्वारा लिखी गई है | जमींदार मोहनदास नए इलाके के इंस्पेक्शन के लिए जाते हैं परन्तु अपना रास्ता भटकने के कारण उन्हें एक अन्य ग्राम में ठहरना पड़ता जहाँ उस इलाके से सम्बंधित एक दुखियारी स्त्री की कथा सुनकर उन्हें बहुत ही लज्जा अनुभव होती है | 
     टन ! टन ! टन ! स्टेशन पर घंटी बोली |
     श्रावण-मास की संध्या भी कैसी मनोहारिणी होती है ! मेघ-माला-विभूषित गगन की छाया सघन रसाल-कानन में पड़ रही है ! अंधियारी धीरे-धीरे अपना अधिकार पूर्व-गगन में जमाती हुई, सुशासन-कारिणी महाराणी से समान, विहंगप्रजागण को सुखनिकेतन में शयन करने की आज्ञा दे रही है | आकाशरूपी शासन-पत्र पर प्रकृति के हस्ताक्षर के समान बिजली की रेखा दिखाई पड़ती है.....ग्राम्य स्टेशन पर कहीं एक-दो दीपलोक दिखाई पड़ता है | पवन हरे-हरे निकुजों में से भ्रमण करता हुआ झिल्ली के झनकार के साथ भरी हुई झीलों में लहरों के साथ खेल रहा है | बूंदियाँ  धीरे-धीरे गिर रही है, जो कि जूही के कलियों को आर्द्र करके पवन को भी शीतल कर रही है |
      थोड़े समय में वर्षा बंद हो गई | अंधकार-रुपी अंजन के अग्रभागस्थित आलोक के समान चतुर्दशी की लालिमा को लिए हुए चंद्रदेव प्राची में हरे-हरे तरुवरों की आड़ में से अपनी किरण-प्रभा दिखाने लगे | पवन की सनसनाहट के साथ रेलगाड़ी का शब्द सुनाई पड़ने लगे | सिग्नेलर ने अपना कार्य किया | घंटा का शब्द उस हरे-भरे मैदान में गूंजने लगा | यात्री लोग अपनी गठरी बांधते हुए  स्टेशन पर पहुँचे | महादैत्य के लाल-लाल नेत्रों के समान अन्जन-गिरिनिभ इन्जिन का अग्रस्थित रक्त-आलोक दिखाई देने लगा | पागलों के सामान बड़बड़ाती हुई अपने धुन की पक्की रेलगाड़ी स्टेशन पर पहुंच गई | धड़ाधड़ यात्री लोग उतरने-चढ़ने लगे | एक स्त्री की ओर देखकर फाटक के बहर खड़ी हुई दो औरतें---जो उसकी सहेली मालूम देती है---रो रही है,और वह स्त्री एक मनुष्य के साथ रेल में बैठने को उद्यत है | उनकी क्रंदन-ध्वनि से वह स्त्री दीन भाव से उनकी ओर देखती हुई, बिना समझे हुए, सेकण्ड क्लास की गाड़ी में चढ़ने लगी; पर उसमें बैठें हुए बाबू साहब---'यह दूसरा दर्जा है, इसमें मत चढ़ो' कहते हुए उतर पड़े, और अपना हंटर घुमाते हुए स्टेशन से बाहर होने का उद्योग करने लगे |
     विलायती पिक का वृचिस पहने, बूट चढ़ाये, हंटिंग कोट धानी रंग का साफा, अंग्रजी हिन्दुस्तानी का महासम्मेलन बाबू साहब के अंग पर दिखाई पड़ रहा है | गौर वर्ण, उन्नत ललाट उसकी आभा को बढ़ा रहे हैं | स्टेशन मास्टर से सामना होते ही शेकहैण्ड करने के उपरांत बाबू साहब से बातचीत होने लगी |
     स्टे० मा०---आप इस वक्त कहाँ के आ रहे हैं ?
     मोहन०--कारिन्दों ने इलाके में बड़ा गड़बड़ मचा रक्खा है, इसलिए मैं कुसुमपुर---जो कि हमारा इलाका है---इंस्पेक्शन के लिए जा रहा हूँ |
     स्टे० मा०---फिर कब पलटियेगा ?
     मोहन०---दो रोज में | अच्छा, गुड इवनिंग !
     स्टेशन मास्टर, जो लाइन-क्लियर दे चुके थे, गुड इवनिंग करते हुए अपने आफिस में घुस गए |
     बाबू मोहनदास अंग्रेजी काठी से सजे हुए घोड़े पर, जो कि पूर्व ही से स्टेशन पर खड़ा था, सवार होकर चलते हुए |
    सरलस्वभावा ग्रामवासिनी कुलकामिनीगण  का सुमधुर संगीत धीरे-धीरे आम्र-कानन में से निकलकर चारों ओर गूँज रहा है | अन्धकार-गगन में जुगनू-तारे चमक-चमककर चित्त को चंचल कर रहे हैं | ग्रामीण लोग अपना हल कंधे पर रक्खे, बिरहा गाते हुए, बैलों की जोड़ी के साथ, घर की ओर प्रत्यावर्तन कर रहे हैं | 
     एक विशाल तरुवर की शाखा में झूला पड़ा हुआ है, उसपर चार महिलाएं बैठी है, और पचासों उसको घेरकर गाती हुई घूम रही हैं | झूले के पेंग के साथ 'अबकी सावन सइयां घर रहुरे' की सुरीली पचासों कोकिल-कंठ से निकली हुई तान पशुगणों  को भी मोहित कर रही है | बालिकाएं स्वछन्द भाव से क्रीड़ा कर रही हैं | अकस्मात् अश्व के पद-शब्द ने उन सरला कामिनियों को चौंका दिया | वे सब देखती हैं तो हमारे पूर्व-परिचित बाबू मोहनलाल घोड़े को रोककर उसपर से उतर रहे हैं | वे सब उनका भेष देखकर घबड़ा गयीं और आपस में कुछ इंगित करके चुप रह गयीं | 
    बाबू मोहनलाल ने निस्तब्धता को भंग किया, और बोले ! भद्रे---यहाँ से कुसुमपुर कितनी दूर है ? और किधर से जाना होगा ? 
     एक प्रौढ़ा ने सोचा कि 'भद्रे' कोई परिहास-शब्द तो नहीं है, पर वह कुछ कह न सकी, केवल एक ओर दिखाकर बोली---इहाँ से डेढ़ऐ  कोस तो बाय, इहै पैड़वा जाई |
     बाबू मोहनलाल उसी पगडण्डी से चले | चलते-चलते उन्हें भ्रम हो गया और वह अपनी छावनी का पथ छोड़कर दुसरे मार्ग से जाने लगे | मेघ घिर आये, जल वेग से बरसने लगा, अन्धकार और घना हो गया | भटकते-भटकते वह एक खेत के समीप पहुंचे; वहां उस हरे-भरे खेत में एक ऊंचा और बड़ा मचान था जो कि फूस से छाया हुआ था, और समीप ही में एक छोटा-सा कच्चा मकान था |
     उस मचान पर बालक और बालिकाएं बैठी हुई कोलाहल मचा रही थीं | जल में भीगते हुए भी मोहनलाल खेत के समीप खड़े होकर उनके आनन्द-कलरव को श्रवण करने लगे |
          भ्रांत होने से उनका बहुत समय व्यतीत हो गया | रात्रि अधिक बीत गयी | कहाँ ठहरें ? इसी विचार में वह खड़े रहे, बूँदें कम हो गयीं | इतने में एक बालिका अपने मलिन वसन के अंचल की आड़ में दीप लिए हुए उसी मचान की ओर जाती हुई दिखाई पड़ी |
३ 
     बालिका की अवस्था १५ वर्ष की है | आलोक से उसका अंग अंधकार-घन में विद्युलेखा की तरह की तरह चमक रहा था | यद्यपि दरिद्रता ने उसे मलिन कर रक्खा है, पर ईस्वरीय सुषमा उसके कोमल अंग पर अपना निवास किये हुए है | मोहनलाल ने थोड़ा बढ़कर उससे पूछना चाहा, पर संकुचित होकर ठिठक गए | परन्तु पूछने के अतिरिक्त दूसरा उपाय ही नहीं था | अस्तु, रूखेपन के साथ पुछा---कुसुमपुर का रास्ता किधर है ?
     बालिका इस भव्य मूर्ति को देखकर डरी, पर साहस के साथ बोली---मैं नहीं जानती | ऐसे सरल नेत्र-संचालन से इंगित करके उसने यह शब्द कहा कि युवक को क्रोध के स्थान में हंसी आ गई और कहने लगा---तो जो जानता हो,मुझे बतलाओ, मैं उससे पूछ लूँगा |
     बालिका---हमारी माता जानती होंगी |
     मोहन०---इस समय तुम कहां जाती हो ?
     बालिका---(मचान की ओर दिखाकर) वहां जो कई लड़के है, उनमें से एक हमारा भाई है, उसी को खिलाने जाती हूँ |
     मोहन०---बालक इतनी रात को खेत में क्यों बैठा है |
     बालिका---वह रात-भात और लड़कों के साथ खेत ही में रहता है |

     मोहन०---तुम्हारी माँ कहाँ हैं ?
     बालिका---चलिए, मैं लिवा चलती हूँ |
     इतना कहकर बालिका अपने भाई के पास गई, और उसको खिलाकर तथा उसके पास बैठे हुए लड़कों को भी कुछ देकर उसी क्षुद्र-कुटीराभिमुख गमन करने लगी | मोहनलाल उस सरला बालिका के पीछे चले |
४ 
     उस क्षुद्र कुटीर में पहुँचने पर एक स्त्री मोहनलाल को दिखाई पड़ी जिसकी अंगप्रभा स्वर्ण-तुल्य थी, तेजोमय मुख-मंडल, तथा ईषत उन्नत अधर अभिमान से भरे हुए थे, अवस्था उसकी ५० वर्ष से अधिक थी | मोहनलाल की आंतरिक अवस्था, जो ग्राम्यजीवन देखेने से कुछ बदल चुकी थी, उस सरल गंभीर तेजोमय मूर्ति को देख और भी सरल विनययुक्त हो गई | उसने झुककर प्रणाम किया | स्त्री ने आशीर्वाद दिया और पुछा---बेटा! कहाँ के आते हो ?
     मोहन०---मैं कुसुमपुर जाता था, किन्तु, रास्ता भूल गया.....
     'कुसुमपुर' का नाम सुनते ही स्त्री का मुख-मंडल आरक्तिम हो गया और उसके नेत्र से दो बूँद आंसू निकल आये | वे अश्रु करुणा के नहीं, किन्तु अभिमान के थे |
     मोहनलाल आश्चर्यान्वित होकर देख रहे थे | उन्होंने पुछा----आपको कुसुमपुर के नाम से क्षोभ क्यों हुआ?
     स्त्री---बेटा ! उसकी बड़ी कथा है, तुम सुनकर क्या करोगे ! 
     मोहन०---नहीं मई सुनना चाहता हूँ, यदि आप कृपा करके सुनावें |
     स्त्री---अच्छा, कुछ जलपान कर लो, तब सुनाउंगी |
     पुन: बालिका की और देखकर स्त्री ने कहा---कुछ जल पीने को ले आओ |
     आज्ञा पाते ही बालिका उस क्षुद्र गृह के एक मिट्टी के बर्तन में  से कुछ वस्तु निकाल, उसे एक पात्र में घोलकर ले आयी, और मोहनलाल के सामने रख दिया | मोहनलाल उस शर्बत को पान करके फूस की चटाई पर बैठकर स्त्री की कथा सुनने लगे |
     स्त्री कहने लगी---हमारे पति उस प्रांत के गण्य भूस्वामी थे, और वंश भी हमलोगों का बहुत उच्च था | जिस गाँव का अभी आपने नाम लिया है, वही हमारे पति की प्रधान ज़मीदारी थी | कार्य-वश एक कुंदनलाल नामक महाजन से कुछ ऋण लिया गया | कुछ भी विचार न करने से उनका बहुत रुपया बढ़ गया, और जब ऐसी अवस्था पहुंची तो अनेक उपाय करके हमारे पति धन जुटाकर उनके पास ले गए, तब उसे धूर्त ने कहा,"क्या हर्ज़ है बाबू साहब !आप आठ रोज़ में आना, हम रूपया ले लेंगे, और जो घाटा होगा, उसे छोड़ देंगे, आपका इलाका भी जायगा, इस  समय रेहननाम भी नहीं मिल रहा है |" उसका विश्वास करके हमारे पति फिर बैठे रहे, और उसने कुछ भी न पुछा | उनकी उदारता के कारण वह संचित धन भी थोड़ा हो गया, और उधर दावा करके इलाका---जो की वह ले लेना चाहता था---बहुत थोड़े रूपये में नीलाम करा लिया | फिर हमारे पति के हृदय में, उस इलाका के इस भांति निकल जाने के कारण, बहुत चोट पहुंची और इसी से उनकी मृत्यु हो गयी | इस दशा के होने के उपरांत हम लोग इस दुसरे गाँव में आकर रहने लगे | यहाँ के ज़मीदार बहुत धर्मात्मा हैं, उन्होंने कुछ सामान्य 'कर' पर यह भूमि दी है, इसी से अब हमारी जीविका है |.....
     इतना कहते-कहते स्त्री का गला अभिमान से भर आया, और कुछ कह न सकी |
     स्त्री की कथा को सुनकर मोहनलाल को बड़ा दू:ख  हुआ | रात विशेष बीत चुकी थी, अत: रात्रि-यापन करके, प्रभात में मलिन तथा पश्चिमगामी चन्द्र का अनुसरण करके, बताये हुए पथ से वह चले गए |
     पर उनके मुख पर विवाद तथा लज्जा ने अधिकार कर लिया था | कारण यह था कि स्त्री की ज़मींदारी हरण करनेवाले, तथा उसके प्राणप्रिय पति से उसे विच्छेद कराकर इस भांति दुःख देनेवाले कुंदनलाल, मोहनलाल के ही पिता थे |























  
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Sunday, 7 August 2016

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वाणी | सुमित्रानंद पन्त | कविता | Vani | Sumitranand Pant | Hindi Poem

"Poet wants to dress his speech with the ornaments of words in such a way that it can transform the world."
"कवि अपनी वाणी को शब्दों के आभूषण से अलंकृत कर संसार का रूपांतरण करना चाहता है| मनुष्य के उर के नि:शब्द द्वार को खोलना चाहता है |"            
||वाणी||

            तुम वहन कर सको जन-मन में मेरे विचार,
            वाणी मेरी, चाहिए   तुम्हें   क्या   अलंकार !

भव-कर्म आज युग की स्थितियों से है पीड़ित,
जग का रूपान्तर भी जनैक्य    पर अवलंबित,

         तुम रूप कर्म से मुक्त, शब्द के पंख मार,
         कर सको सुदूर मनोनभ में जन के विहार,
            वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या   अलंकार !

चित शून्य---आज जग, नव निनाद से हो गुंजित 
मत जड़---उसमें नव स्थितियों के गुण हो जागृत

            तुम जड़ चेतन की    सीमओं   के   आर  पार 
            झंकृत भविष्य का सत्य कर सको स्वराकार,
            वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या अलंकार !

युग कर्म शब्द, युग रूप शब्द, युग सत्य शब्द,
शब्दित कर  भावी  के सहस्त्र  शत  मूक शब्द,

            ज्योतित कर जन मन के जीवन का अंधकार,
            तुम खोल सको मानव   उर के निःशब्द द्वार,
            वाणी मेरी,   चाहिए   तुम्हें    क्या   अलंकार !


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Sunday, 29 May 2016

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इक्केवाला-२ | विश्वम्भर नाथ शर्मा 'कौशिक' | कहानी | Ikkewala-2 | Vishwambhar Nath Sharma 'Kaushik | Hindi Story

     कहानी के इस भाग में श्यामलाल अपनी आत्म-कथा सुनाता है जिसमें लेखक ने उसके शीलवान  चरित्र का चित्रण किया है | 

 'मैं अगरवाला बनिया हूँ । मेरा नाम श्यामलाल है । मेरा जन्म-स्थान मैनपूरी है । मेरे पिता व्यापार करते थे । जिस समय मेरे पिता की मृत्यु हुई, उस समय मेरी उम्र पंद्रह साल की थी । पिता के मरने पर घर-गृहस्थी का सारा भार मेरे ऊपर पड़ा । मैंने एक वर्ष तक काम-काज चलाया, पर मुझे व्यापार का अनुभव न था, उस कारण घाटा हुआ और मेरा सब काम  बिगड़ गया | अंत को और कोई उपाय न देखे मैंने वहीं एक धनी आदमी के यहाँ नौकरी कर ली | उस समय मेरे परिवार में मेरी माता और एक छोटी बहन थी | जिसके यहाँ मैंने नौकरी की थी, वह तो थे मालदार, परन्तु बड़े कंजूस थे | ऊपर से देखने में वह एक मामूली हैसियत के आदमी दिखाई पड़ते थे; परन्तु लोग कहते थे कि उनके पास एक लाख के लगभग नकद रुपया है | उस समय मैंने लोगों की बात पर विश्वास नही किया था; क्योंकि घर की हालत देखने से किसी को यह विश्वास नहीं हो सकता कि उनके पास इतना रुपया होगा | उनकी उम्र चालीस से ऊपर थी | उन्होंने दूसरी शादी की थी और उनकी पत्नी की उम्र बीस वर्ष के लगभग थी | पहली स्त्री से उनके एक लड़का था | वह जवान था और उसका विवाह इत्यादि सब हो चूका था | उसका नाम शिवचरणलाल था | पहले तो वह अपने पिता के पास ही रहता था; परन्तु जब पिता  ने दूसरा विवाह किया, तो वह नाराज़ होकर अपनी स्त्री सहित फरुर्खाबाद चला गया | वहां उसने एक दूकान कर ली और वहीं रहने लगा |'
     'उन दिनों मुझे कसरत करने का बड़ा शौक था, इसलिए मेरा बदन बहुत अच्छा बना हुआ था | कुछ दिनों पश्चात् मेरी मालकिन मेरी बहुत खातिर करने लगी | खूब मेवा-मिठाई खिलाती थीं और महीने में दस-बीस रूपये नकद दे देती थी | इस कारण दिन बड़ी अच्छी तरह कटने लगे | मैं मालकिन के खातिर करने का असली मतलब उस समय नहीं समझा | मैंने जो समझा, वह यह था कि मेरी सेवा से प्रसन्न होकर तथा मुझे गरीब समझकर वह ऐसा करती हैं | आखिर जब एक दिन उन्होंने मुझे एकांत में बुलाकर छेड़-छाड़ की, तब मेरी आंखे खुली | मुझे आरम्भ से ही इन कामों से नफ़रत थी | मैं इन बातों को जानता भी नहीं था | न कभी ऐसी संगति ही में रहा था जिसमे इन बातो का ज्ञान प्राप्त होता | मैं उस समय जो जानता था वह यह था कि आदमी को खूब कसरत करना चाहिए और स्त्रियों से बचना चाहिए | जब मालकिन ने छेड़-छाड़ की , तो मेरा कलेजा धड़कने लगा | मुझे ऐसा मालूम हुआ, कि वह एक चुड़ैल है और मुझे भक्षण करना चाहती है |'
     इक्केवाले की इस बात पर मेरे साथी मनोहरलाल बहुत हँसे | बोले---तुम तो बिलकुल बुद्धू थे जी !
     श्यामलाल बोला---'अब जो समझिये, परुन्तु बात ऐसी ही थी | खैर, मैं अपना हाथ छुड़ाकर उनके सामने से भाग आया | अब मुझे उनके सामने जाते डर मालूम होने लगा | यही खटका लगा रहता था, कि कही किसी दिन फिर न -पकड़ ले | तीन-चार दिन के बाद वही हुआ | उन्होंने अवसर पाकर फिर मुझे घेरा | उस दिन मैंने उनसे साफ़-साफ़ कह दिया, कि यदि वह ऐसी हरकत करेंगी, तो मैं मालिक से कह दूंगा | बस, उसी दिन से मेरी खातिर बंद हो गई | केवल खातिर बंद रह जाती, वहां तक गनीमत थी; परन्तु अब उन्होंने मुझे तंग करना आरम्भ कर दिया | बात-बात पर डांटती थी | कभी मालिक से शिकायत कर देती थी | आखिर जब एक दिन मालिक ने मुझे मालकिन के कहने से बहुत डांटा, तो मैंने उन्हें अलग ले जाकर कहा---लालाजी, मेरा हिसाब कर दीजिये, मैं अब आपके यहाँ नौकरी नहीं करूँगा | लालाजी लाल-पीली आँखे करके बोले---एक तो कसूर करता है और उसपर हिसाब मांगता है ? मुझे भी तैश आ गया | मैंने कहा---कसूर किस ससुरे ने किया है ? लालाजी बोले---तो क्या मालकिन झूठ कहती है ? मैंने कहा---बिल्कुल झूट ! लालाजी ने कहा---तेरे से उनकी शत्रुता है क्या ? मैंने कहा---हाँ शत्रुता है | उन्होंने पुछा---क्यों ? मैंने कहा---अब आपसे क्या बताऊं | आप उसे भी झूठ मानेंगे | इसलिए सबसे अच्छी बात यही है कि मेरा हिसाब कर दीजिये | मेरी बात सुनकर लाला के पेट में खलबली मची | उन्होंने कहा---पहले यह बता कि बात क्या है ? मैंने कहा---उसके कहने से  कोई फायदा नहीं, आप मेरा हिसाब दे दीजिए | परन्तु लाला मेरे पीछे पड़ गए | मैंने विवश होकर सब हाल बता दिया | मुझे भय था, कि लाला को मेरी बात पर विश्वाश न होगा, पर ऐसा नहीं हुआ |  लाला ने मेरी पीठ पर हाथ फेरकर कहा---शाबास श्यामलाल, मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ | अब तुम आनंद से रहो, तुम्हारी तरफ कोई आँख नहीं देख सकेगा | बस उस दिन से मैं निर्द्वन्द्व हो गया | अब अधिकतर मैं मालिक के पास बाहर ही रहने लगा, भीतर कम जाता था | उसके पश्चात् भी मालकिन ने मेरे निकलवाने के लिए चेष्टा की, पर लाला ने उनकी एक न सुनी | आखिर वह भी हारकर बैठ गयी |'
     इस प्रकार एक वर्ष और बीता | इस बीच में लाला के एक रिश्तेदार- जो उनके चचेरे भाई होते थे---बहुत आने-जाने लगे | उनकी उम्र पच्चीस-छब्बीस वर्ष के लगभग होगी | शरीर के मोटे-ताजे और तंदरुस्त आदमी थे | पहले तो मुझे उनका आना-जाना कुछ नही खटका, पर जब उनका आना-जाना हद से अधिक बढ़ गया और मैंने देखा कि वह मालकिन के पास घंटों बठे रहते हैं तो मुझे संदेह हुआ, कि हो न हो दाल में कुछ कला अवश्य है | लालाजी अधिकत दुकान में रहने के कारण यह बात न जानते थे | घर का कहार भी मालकिन से मिला हुआ मालूम होता था, इसलिए वह भी चुप्पी साधे था | एक मै ही ऐसा था, जिसके द्वारा लाला को यह खबर मिल सकती थी | अंत में मैंने इस रहस्य का पता लगाने पर कमर बाँधी और एक दिन अपनी आँखों उनकी पापमयी लीला देखी | बस उसी दिन मैंने लाला को खबर कर दी | लाला उस बात को चुपचाप पी गए | आठ-दस रोज बाद लाला ने मुझे बुलाकर कहा---श्यामलाल, तेरीबात ठीक निकली, आज मैंने भी देखा | जिस दिन तूने कहा था, उसी दिन से मैं इसकी टोह में था---आज तेरी बात की सत्यता प्रमाणित हो गई | अब बता क्या करना चाहिए ? मैंने कहा---मै क्या बताऊँ, आप जो उचित समझे, करें |'
     'लाला ने पूछा---तेरी क्या राय है ? मैंने इस उम्र में विवाह करके बड़ी भूल की; पर अब इसका उपाय क्या है ? मैंने कहा---अपने भाई साहब का आना-जाना बंद कर दीजिये, यही उपाय है और हो ही क्या सकता हा ? लाला ने सोचकर कहा---हाँ, यही ठीक है | जी में तो आता है कि इस औरत को निकाल बाहर करूँ, पर इसमें बड़ी बदनामी होगी | लोग हँसेंगे कि पहले तो विवाह किया, फिर निकाल दिया |'
     'मैंने कहा---हाँ, यह तो आपका कहना ठीक है | बस, उनका आना जाना बंद कर दीजिये, अतएव उसी दिन से यह हुकुम लग गया, कि लाला की अनुपस्थिति में बाहर का कोई आदमी---चाहे रिश्तेदार हो, चाहे कोई हो---अंदर न जाने पाए | और यह काम मेरे सुपुर्द किया गया | उस दिन से मैंने उन्हें नहीं धंसने दिया | इसपर उन्होंने मुझे प्रलोभन भी दिए, धमकी भी दी, पर मैंने एक न सुनी | मालकिन ने भी बहुत कुछ कहा-सुनाया, खुशामद की, पर मै जरा भी न पसीजा | कहरवा भी बोला---तुमसे क्या मतलब है, जो होता है, होने दो | मैंने उससे कहा---सुनता है बे, तू तो पक्का नमकहराम है, जिसका नामक खाता हिया, उसी के साथ दगा करता है | खैरियत इसी में है कि चुप रह, नही तो तुझे भी निकाल बाहर करूँगा |'
     ' यह सुनकर कहारराम चुप हो गए |'
      'थोड़े दिन बाद लाला के उन रिश्तेदार ने आना-जाना बिल्कुल बंद कर दिया | अब वह लाला के पास भी नहीं आते थे | मैंने भी सोचा, चलो अच्छा हुआ, आँख फूटी पीर गई |'
     'इसके छ: महीने बाद एक दिन लाला को हैजा हो गया मैंने बहुत दौड़-धूप की, इलाज इत्यादि कराया; पर कोई फायदा न हुआ | लाला जी समझे गए कि अंत समय निकट है; अतएव उन्होंने मुझे बुलाकर कहा---श्यामलाल, मै तुझे अपना नौकर नहीं, पुत्र समझता हूँ; इसलिए मैं अपनी कोठरी की ताली तुझे देता हूँ | मेरे मरने पर ताली मेरे लड़के को दे देना और जब तक वह न आ जाय, तब तक किसी को कोठरी न खोलने देना | बस, तुझेसे मै इतनी अंतिम सेवा चाहता हूँ |'
     'मैंने कहा---ऐसा ही होगा, चाहे मेरे प्राण ही क्यों न चले जायँ, पर मै इसमें अंतर न पड़ने दूंगा | इसके पश्चात् उन्होंने मुझे पाच हजार रूपये नकद दिए और बोले---यह लो, मैं तुम्हे देता हूँ | मैं लेता न था | पर उन्होंने कहा---तू यदि न लेगा, तो मुझे दुःख होगा, अतएव मैंने ले लिए | इसके चार घंटे बाद उनका देहांत हो गया | उनके लड़के को उनके मरने के तीन घंटे पहले तार दे दिया गया था | उनके मरने के पांच घंटे बाद वह मैनपुरी पंहुचा था | उनका देहांत रात को आठ बजे हुआ और वह रात के दो बजे के निकट पहुंचा था | लाला के मरने के बाद उनकी स्त्री ने मुझेसे कहा---कोठरी की ताली लाओ | मैंने कहा---ताली तो लाला शिवचरणपाल के हाथ में देने को कह गए हैं, मै उन्ही को दूंगा | उन्होंने कहा---अरे मूर्ख, इससे तुझे क्या मिलेगा | कोठरी खोलकर रूपया निकल ले---मुझे मत दे, तू ले ले, मैं भी तेरे साथ रहूंगी, जहाँ तू चलेगा, तेरे साथ चलूंगी | मैंने कहा---मुझसे न होगा | मैं तुम्हे ले जाकर रखूँगा कहाँ ? दुसरे तुम मेरे उस मालिक की स्त्री हो, जो मुझे अपने पुत्र के समान मानता था | मुझसे यह न होगा, कि तुम्हे अपनी स्त्री बनाकर रखूं |'
     'बाबूजी, एक घंटे तक उसने मुझे समझाया, रोई भी, हाथ भी जोड़े; परन्तु मैंने एक न मानी | आखिर उसने अन्य उपाय न देख अपने देवर अर्थात् उन्ही को बुलाया, जिनका आना-जाना मैंने बंद कराया था | उन्होंने आते ही बड़ा रुआब झाड़ा | मुझे पुलिस में देने की धमकी दी, पर मैं इससे भयभीत न हुआ | तब वह ताला तोड़ने पर आमादा हुए | मैं कोठरी के द्वार पर एक मोटा डंडा लेकर बैठ गया और मैंने उनसे कह दिया कि जो कोई ताला तोड़ने आएगा, पहले मैं उसका सिर तोडूंगा, इसके बाद जो होगा देखा जायगा | बस फिर उनका साहस न हुआ | इस रगड़े-झगड़े में रात के दो बज गए और शिवचरणलाल आ गए | मैंने उनको ताली दे दी और सब हाल बता दिया |
     'बाबूजी, जब कोठरी खोली गई, तो उसमे साठ हजार रूपये नकद निकले | इन रुपयों का हाल लाला के अतिरिक्त और किसी को भी मालूम न था | यदि मैं मालकिन की बात मानकर बीस-पच्चीस हजार रूपये भी निकाल लेता, तो किसी को भी संदेह न होता, पर मेरे मन में इसी बात का विचार एक क्षण के लिए भी पैदा न हुआ | मेरी माँ रोज रामायण पढ़कर मुझे सुनाया करती थीं, और मुझे यही समझाया करती थी कि---बेटा, पाप और बेईमानी से सदा बचना, इससे तुझे कभी दुःख न होगा | उनकी यह बातें मेरे जी में बसी हुई थीं और इसीलिए मैं बच गया | उसके बाद शिवचरणपाल ने भी मुझे एक हजार रुपया दिया | साथ ही उन्होंने यह कहा कि तुम मेरे पास रहो; पर लाला के मरने से और जो अनुभव मुझे हुए थे, उनके कारण मैंने उनके यहाँ रहना उचित न समझा | लाला की तेरही होने के बाद मैंने उनकी नौकरी छोड़ दी | छ: हजार अपने ब्याह में खर्च किये | एक हज़ार लगाकर एक दुकान की और हजार बचाकर रखा; पर दूकान में फिर घाटा हुआ | तब मैंने मैनपुरी छोड़ दी और इधर चला आया | नौकरी करने की इच्छा नही थी, इसलिए मैंने इक्का-घोड़ा खरीद लिया और किराये पर चलाने लगा---तबसे बराबर यही काम कर रहा हूँ | इसमें मुझे खाने-भर को मिल जाता है | अपने आनन्द से रहता हूँ, न किसी के लेने में हूँ, न देने में | अब बताइए, वह बाबू कहते थे कि चार आने पैसे के लिए मै बेईमानी करता हूँ | अब मैं उनसे क्या कहता | यह तो दुनिया है, जो जिसकी समझ में आता है, कहता है | मैं भी सब सुन लेता हूँ | इक्केवाले बदनाम हैं, इसलिए मुझे भी ये बाते सुननी पड़ती हैं |'
     शायमलाल की आत्मकहानी सुनकर मैं कुछ देर तक स्तब्ध रह बैठा रहा | इसके पश्चात् मैंने कहा---'भाई, तुम तो दर्शनीय आदमी हो, तुम्हारे तो चरण छूने को जी चाहता है |'
     शायमलाल हंसकर बोला---'अजी बाबूजी, क्यों काँटों में घसीटते हो ? मेरे चरण और आप छुए---राम ! राम ! मैं कोई साधू थोड़ा ही हूँ |'
     मैंने कहा---'और साधु कैसे होते हैं; उनके कोई सुर्खाव का पर तो लगा होता नही | सच्चे साधू तो तुम्ही हो |' यह सुनकर श्यामलाल हँसने लगा | इसी समय गंगापुर आ गया और हमलोग इक्के से उतरकर अपने निर्दिष्ट स्थान की ओर चल दिए |
     रास्ते में मैंने मनोहरलाल से कहा---'इस संसार में अनेकों लाल गुदड़ी में छिपे पड़े हैं | उन्हें कोई जानता तक नही |'
     मनोहरलाल----'जी हाँ ! और नामधारी ढोंगी महात्मा ईश्वर  की तरह पूजे जाते हैं |'
     बात बहुत पुरानी हो गई है, पता नही, महात्मा शायमलाल अब भी जीवित हों या नहीं, परन्तु अब भी जब कभी मुझे उनका स्मरण हो आता है तो ये उनकी काल्पनिक मूर्ति के चरणों में अपना मस्तक नत कर देता हूँ |

     
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Friday, 6 May 2016

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इक्केवाला-१| विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक' | कहानी | Ikkewala-1 | Vishwambharnath Sharma 'Kaushik' | Hindi Story

     स्टेशन के बाहर मैंने अपने साथी मनोहरलाल से कहा---कोई इक्का मिल जाय तो अच्छा है---'दस मील का रास्ता है |'
     मनोहरलाल बोले---'आइये, इक्के बहुत हैं | उस तरफ खड़े होते हैं |'
     हम दोनों चले | लगभग दो सौ गज चलने के पश्चात देखा, तो सामने एक बड़े वृक्ष के नीचे तीन-चार इक्के खड़े दिखाई दिये | एक इक्का अभी आया था और उस पर से दो आदमी अपना असबाब उतर रहे थे | मनोहरलाल ने पुकारा---'कोई इक्का गंगापुर चलेगा ?'
     एक इक्केवाला बोला---'आइये सरकार, मैं ले चलूँ | कै सवारी है ?'
     'दो सवारी---गंगापुर का क्या लोगे ?'
     जो सब देते हैं, वही आप भी दे दीजियेगा |'
     आखिर कुछ मालूम तो हो ?'
     'दो रुपये का निरख (निर्ख) है |'
     'दो रुपये ?---इतना अधेर |'
     इसी समय जो लोग अभी आये थे, उनमे और उनके इक्केवाले में झगड़ा होने लगा | इक्केवाला बोला---'यह अच्छी रही, वहाँ से डेढ़ रुपया तय हुआ, अब यहाँ बीस ही आने दिखाते हैं !'
     यात्रियों में से एक बोला---'हमने पहले ही ख दिया था कि हम बीस आने से एक पैसा अधिक न देंगे |'
     'मैंने भी तो कहा था, कि डेढ़ रुपये ससे एक पैसा कम न लूँगा |'
     'कहा होगा, हमने सुना ही नहीं |'
     'हाँ, सुना नहीं---ऐसी बात आप काहे को सुनेंगे |'
     'अच्छा तुम्हे बीस आने मिलेंगे---लेना हो तो लो, नहीं अपना रास्ता देखो |'
     इक्केवाला, जो हृष्ट-पुष्ट तथा गौरवर्ण था, अकड़ गया | बोला---'रास्ता देखे, कोई अधेर है ! ऐसे रास्ता देखले लगे, तो बस कमाई कर चुके | बाये हाथ से इधर डेढ़ रुपया रख दीजिये, तब आगे बढ़िएगा | वहाँ तो बोले, अच्छा जो तुम्हारा रेट होगा, वह देंगे, अब यहाँ कहते हैं, रास्ता देखो---अच्छे मिलें !'
     हम लोग यह कथोपकथन सुनकर इक्का करना भूल गए और उनकी बाते सुनने लगे | एक यात्री बड़ी गंभीरतापूर्वक बोला---'देखो जे, यदि तुम भलमनसी से बाते करो, तो दो-चार पैसे हम अधिक दे सकते हैं, तुम गरीब आदमी हो; लेकिन जो झगड़ा करोगे तो एक पैसा न मिलेगा |'
     इक्केवाला किंचित मुस्कराकर बोला---'दो-चार पैसे ! ओफ! ओफ ! आप तो बड़े दाता मालूम होते हैं | जब चार पैसे देते हो, तो चार आने ही क्यों नहीं दे देते ?'
     'चार आने हमारे पासे नहीं हैं |'
     'नहीं है---अच्छी बात है, तो हो आपके पास हो वही दे दीजिये---न हो न दीजिये और ज़रूरत हो तो एकाध रुपया मैं आपको दे सकता हूँ |'
     'तुम बेचारे क्या डोज, चार-चार पैसे के लिए तो तुम झूट बोलते हो और  बेईमानी करते हो |'
     अरे बाबूजी, लाखों रुपये के लिए तो मैंने बेईमानी की नहीं---चार पैसे के लिए बेईमानी करूँगा ? बेईमानी करता तो इस समय इक्का न हाकता होता | खैर, आपको जो देना हो दे दीजिये---नहीं जाइए---मैंने किराया भर पाया |'
     उन्होंने बेश आने निकालकर दिए, इक्केवाले ने चुपचाप ले लिए |
     उस इक्केवाले कका आकर-प्रकार, उसकी बातचीत से मुखे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि अंध इक्केवालों की तरह यह साधारण आदमी नही है | इसमें कुछ विशेषता अवश्य है; अतेव मैंने सोचा कि यदि हो सके, तो गंगापुर इसी इक्के पर चलना चाहिए | यह सोचकर मैंने उससे पुछा---'क्यों भाई गंगापुर चलोगे ?'
     वह बोला---'हाँ ! हाँ ! आइए !'
     'क्या लोगे ?'
     'वही डेढ़ रुपया !'
     मैंने सोचा, अन्य इक्केवाले टी ओ दो रुपये मांगते थे, वह डेढ़ रुपया कहता है, आदमी सच्चा मालूम होता है | वह सोचकर मैंने कहा---'अच्छी बात है, चलो डेढ़ रुपया देंगे |'
     हम दोनों सवार होकर चले | थोड़ी दूर चलने पर मैं पुछा---'वे दोनों कौन थे ?' इक्केवाले ने कहा---'नारायण जाने कौन थे ? परदेशी मालूम होते हैं, लेकिन परले-सिरे के झूठे और बेईमान ! चार आने के लिए प्राण तज दे रहे थे |'
     मैंने पुछा---तो'तो सचमुच तुमसे डेढ़ रुपया ही तय हुआ था ?'
     'और नही क्या आप झूठ समझते हैं ? बाबूजी, यह पेशा ही बदनाम है, आपका कोई कसूर नही | इक्के, तांगेवाले सदा झूठे और बेईमान समझे जाते हैं | और होते भी हैं---अधिकतर तो ऐसे ही होते हैं | इन्हें चाहें आप रूपये की जगह सवा रुपया दीजिये, तब भी संतुष्ट नहीं होते |'
     मैंने पुछा---'तुम कौन जाति हो ?'
     'मैं ? वैश्य सरकार वैश्य हूँ |'
     'अच्छा ! वैश्य होकर इक्का हांकते हो ?'
     'क्यों सरकार, इक्का हाँकना कोई बुरा काम तो है नहीं ?'
     'नही, मेरा मतलब यह नहीं है कि इक्का हाँकना कोई बुरा काम है | मैंने इसलिए कहा कि वैश्य तो बहुधा व्यापार करते हैं |'
     'यह भी तो व्यापार ही है |'
     'हाँ, है तो व्यापार ही |'
     मैंने मन-ही-मन अपनी इस बेतुकी बात पर लज्जित हुआ; अतएव मैंने प्रसग बदलने के लिए पुछा---कितने दिनों से यह काम करते हो ?
     'दो बरस हो गये |'
     'इसके पहले क्या करते थे ?'
     यह सुनकर इक्केवाला गंभीर होकर बोला---'क्या बताऊँ, क्या करता था ?
     उसकी इस बात से तथा यात्रियों से उसने जो बातें कहीं थीं, उनका तारतम्य मिलाकर मैंने सोचा---इस व्यक्ति का जीवन रहस्यमय मालूम होता है | यह सोचकर मैंने उससे पुछा---'कोई हर्ज न समझो तो बताओ |'
     'हर्ज तो कोई नही हिं बाबूजी | पर मेरी बात पर लोगों को विश्वास नहीं होता | इक्केवाले बहुधा परले-सिरे के गप्पी समझे जाते हैं; इसलिए मैं किसी को अपना हाल सुनाता नही |'
     'खैर, मैं उन आदमियों में नही हूँ, यह तुम विश्वास रखो |'
     'अच्छी बात है सुनिए----'
   
   शेष अगले भाग में ....
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Thursday, 28 April 2016

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फूल और कांटे | कविता | कवि: अयोध्या सिंह 'उपाध्याय' | Phool Aur Kante | Hindi Poem | Poet:- Ayodhyaya Singh 'Upadhyaya' |

फूल और कांटे
     'फूल और कांटे' अयोध्या सिंह 'उपाध्याय' जी द्वारा रचित कविता है | इस कविता में कवि ने यह सन्देश देना चाहा है कि किसी का कर्म ही होता है जो उसे महानता के शिखर पर ले जाते हैं | इसमें उसका जन्म या कुल का कोई हाथ नहीं होता | इस बात को स्पष्ट करने के लिए कवि ने फूल और कांटे का चयन किया |
                                               (१) 
हैं जनम लेते जगह में एक ही,
                                        एक ही पौधा उन्हें है पालता |
रात में उनपर चमकता चाँद भी,
                                        एक ही सी चाँदनी है डालता ||
                                             

                                            (२) 
मेघ उनपर है बरसता एक-सा,
                                        एक-सी उनपर हवाएँ हैं बहीं |
पर सदा ही यह दिखाता है समय,
                                        ढंग उनके एक से होते नहीं ||
                                              (३)
छेदकर काँटा किसीकी उँगलियाँ,
                                        फाड़ देता है किसीका वर वसन |
और प्यारी तितलियों का पर कतर,
                                        भौंर का है बेध देता श्याम तन ||
                                               (४)
फूल लेकर तितलियों को गोद में,
                                        भौंर को अपना अनूठा रस पिला |
निज सुगन्धि औ' निराले रंग में,
                                        है सदा देती कली दिल की खिला ||
                                               (५) 
खटकता है एक सबकी आंख में,
                                         दूसरा है सोहता सुर-सीस पर
किस तरह कुल के बड़ाई काम दे,
                                         जो किसीमें हो बड़प्पन की कसर ||
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