Thursday, 31 March 2016

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चन्दा -I | जयशंकर 'प्रसाद' | कहानी | Chanda-I | Jayshankar 'Prasad' | Hindi Story|


'चन्दा' दो कोल युवक-युवती की प्रेम कथा है | इस कहानी के लेखक श्री जयशंकर 'प्रसाद' हैं | इस कहानी में चन्दा और हीरा एक दुसरे से प्रेम करते हैं पर चन्दा का सम्बन्ध एक अन्य रामू नामक कोल से तय हो चूका था | रामू हीरा को मारने का प्रयास करता है पर हीरा को जंगल का एक वृद्ध जो कोल-पति है, बचा लेता है | वृद्ध कोल हीरा और चन्दा का ब्याह करा देता है तथा हीरा को अपना पद भी सौंप देता है | जंगल में एक दिन राजा शिकार करने आता है | इस दौरान ...

चैत्र-कृष्णाष्टमी का चन्द्रमा अपना उज्जवल प्रकाश 'चंद्रप्रभा' को निर्मल जल पर डाल रहा है | गिरी-श्रेणी के तरुवर अपने रंग को छोड़कर ध्वलित हो रहे हैं; कल-नादिनी समीर के संग धीरे-धीरे बह रही है | एक शिला-ताल पर बैठी हुई कोल-कुमारी सुरीले स्वर से---'दरद-दिल काहि  सुनाऊँ प्यारे! दरद'... गा रही है |
     गीत अधुरा ही है कि अकस्मात एक कोल-युवक धीर-पद-संचालन करता हुआ उस रमणी के सम्मुख आकर खड़ा हो गया | उसे देखते ही रमणी की हृदय-तंत्री बज उठी | रमणी बाह्य-स्वर भूलकर आन्तरिक स्वर से सुमुधर संगीत गाने लगी और उठकर खड़ी हो गई | प्रणय के वेग को सहन न करके वर्षावारिपूरिता स्रोतस्विनी के समान कोल-कुमार के कंध-कूल से रमणी ने आलिंगन किया |
     दोनों उसी शिला पर बैठ गए, और निनिर्मेष सजल नेत्रों से परस्पर अवलोकन करने लगे | युवती ने कहा----तुम कैसे आये ?
     युवक---जैसे तुमने बुलाया |
     युवती---( हंसकर ) हमने तुम्हे कब बुलाया ! और क्यों बुलाया !
     युवक---गाकर बुलाया और दरद सुनाने के लिए |
     युवती---( दीर्घ निश्वास लेकर ) कैसे क्या करूँ ? पिता ने तो उसी से विवाह करना निश्चय किया है |
     युवक---( उत्तेजना से खड़ा होकर ) तो जो कहो, मै करने के लिए प्रस्तुत हूँ |
     युवती---( चंद्रप्रभा  की ओर दिखाकर ) बस, यही शरण है |
     युवक---तो हमारे लिए कौन दूसरा स्थान है ?
     युवती---मै तो प्रस्तुत हूँ |
     युवक---हम तुम्हारे पहले |
     युवती ने कहा---तो चलो |
     युवक ने मेघ-गर्जन-स्वर से कहा---चलो |
उतरकर चंद्रप्रभा के तट पर आए, और एक शिला पर खड़े हो गए | तब युवती ने कहा---अब विदा !
     युवक ने कहा---किससे ? मै तो तुम्हारे साथ---जब तक सृष्टि रहेगी तब तक ---रहूँगा |
     इतने ही में शाल-वृक्ष के नीचे एक छाया दिखाई पड़ी और वह इन्हीं दोनों की ओर आती हुई दिखाई देने लगी | दोनों ने चकित होकर देखा की एक कोल खड़ा है | उसने गंभीर स्वर से युवती से पुछा---चन्दा  ! तू यहाँ क्यों आई ?
     युवती---तुम पूछनेवाले कौन हो !
     आगंतुक युवक---मै तुम्हारा भावी पति 'रामू' हूँ |
     युवती---मै तुमसे ब्याह न करुँगी |
     आ० यु०---फिर किससे तुम्हारा ब्याह होगा ?
     युवती ने पहले के आये युवक की ओर इंगित करके कहा---इन्हीं से |
     आगन्तक युवक से अब न सहा गया | घूमकर पूछा---क्यों हीरा ! तुम ब्याह करोगे ?
     हीरा---तो इसमें तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?
     रामू---तुम्हे इससे अलग हो जाना चाहिए |
     हीरा--- क्यों, तुम कौन होते हो ?
     रामू---हमारा इससे सम्बन्ध पक्का हो चूका है |
     हीरा---पर जिससे सम्बन्ध होनेवाला है, वह सहमत हो तब न !
     रामू---क्यों चन्दा ! क्या कहती हो ?
     चन्दा---मै तुमसे ब्याह न करुँगी |
     रामू---तो हीरा से भी तुम ब्याह नहीं कर सकती !
     चन्दा---क्यों ?
     रामू---( हीरा से  ) अब हमारा-तुम्हारा फैसला हो जाना चाहिए, क्योंकि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं |
     इतना कहकर हीरे के ऊपर झपटकर उसने अचानक छूरे का वार किया |
     हीरा यद्यपि सचेत हो रहा था; पर उसको सम्हलने में विलम्ब हुआ, इससे घाव लग गया और वह वृक्ष थामकर बैठ गया |इतने में चन्दा जोर से क्रंदन कर उठी---साथ ही के वृद्ध भील आता हुआ दिखाई पड़ा |
     युवती मुंह ढांपकर रो रही है, और युवक रक्ताक्त छूरा लिए, घृणा की दृष्टि से खड़े हुए, हीरा की ओर देख रहा है | विमल चन्द्रिका में चित्र की तरह वे दिखाई दे रहे हैं | वृद्ध को जब चन्दा ने देखा, तो और वेग से रोने लगी | उस दृश्य को देखते ही वृद्ध कोल-पति सब बात समझ गया, और रामू के समीप जाकर छूरा उसके हाथ से ले लिया, और आज्ञा के स्वर में कहा---तुम दोनों हीरा को उठाकर नदी के समीप ले चलो  |
     इतना कहकर वृद्ध उन सबों के साथ आकर नदी-तट  पर जल के समीप खड़ा हो गया | रामू और चन्दा दोनों ने मिलकर उसके घाव को धोया और हीरा के मुंह पर छींटा दिया, जिससे उसकी मूर्छा दूर हुई | तब वृद्ध ने सब बातें हीरा से पूछीं; पूछ लेने पर रामू ने कहा---क्यों, यह सब ठीक है ?
     रामू ने कहा---सब सत्य है |
    वृद्ध---तो तुम अब चन्दा के योग्य नहीं हो, और यह छूरा भी---जिसे हमने तुम्हे दिया था---तुम्हारे योग्य नहीं है | तुम शीघ्र ही हमारे जंगल से चले जाओ, नहीं तो हम तुम्हारा हाल महाराज से कह देंगे, और उसका क्या परिणाम होगा सो तुम स्वयं समझ सकते हो | (हीरा की ओर देखकर) बेटा ! तुम्हारा घाव शीघ्र अच्छा हो जायेगा, घबड़ाना नही, चन्दा तुम्हारी ही होगी |
     यह सुनकर चन्दा और हीरा का मुख प्रसन्नता से चमकने लगा, पर हीरा ने लेटे-ही-लेटे हाथ जोड़कर कहा---पिता ! एक बात कहनी है, यदि आपकी आज्ञा हो |
     वृद्ध---हम समझ गए, बेटा ! रामू विश्वासघाती है |
     हीरा---नहीं पिता ! अब वह ऐसा कार्य नहीं करेगा | आप क्षमा करेंगे, मै ऐसी आशा करता हूँ |
     वृद्ध---जैसी तुम्हारी इच्छा |
     कुछ दिन के बाद जब हीरा अच्छी प्रकार से आरोग्य हो गया, तब उसका ब्याह चन्दा से हो गया | रामू भी उस उत्सव में सम्मिलित हुआ, पर उसका बदन मलीन और चिंतापूर्ण था | वृद्ध कुछ ही काल में अपना पद हीरा को सौंप स्वर्ग को सिधारा | हीरा और चन्दा सुख से विमल चांदनी में बैठकर पहाड़ी झरनों का कल-नाद-मय आनंद-संगीत सुनते थे |
३ 
     अंशुमाली अपनी तीक्ष्ण किरणों से वन्य-देश को परितापित कर रहे हैं | मृग-सिंह एक स्थान पर बैठकर, छाया-सुख में अपने बैर-भाव को भूलकर, ऊंघ रहे हैं | चंद्रप्रभा के तट पर पहाड़ी की एक गुहा में जहाँ कि छतनार पेड़ों की छाया उष्ण वायु को भी शीतल कर देती है, हीरा और चन्दा बैठे हैं | हृदय के अनन्त विकास से उनका मुख प्रफुल्लित दिखाई पड़ता है | उन्हें वस्त्र के लिए वृक्षगण वल्कल देते हैं; भोजन के लिये  प्याज-मेवा इत्यादि जंगली सुस्वादु फल, शीतल-स्वच्छंद पवन; निवास के लिये गिरी-गुहा; प्राकृतिक झरनों का शीतल जल उनके सब  अभावों को दूर करता है, और सबल तथा स्वच्छंद बनाने में ये सब सहायता देते हैं | उन्हें किसी की अपेक्षा नहीं करनी पड़ती | अस्तु, उन्हें सब सुखों से आनंदित व्यक्तिद्वय 'चंद्रप्रभा' के जल का कल-नाद सुनकर अपनी हृदय-वीणा को बजाते हैं |
     चन्दा---प्रिय ! आज उदासीन क्यों हो !
     हीरा---नहीं तो, मैं यह सोच रहा हूँ कि इस वन में राजा आनेवाले हैं | हमलोग यद्यपि अधीन नहीं हैं, तो भी उन्हें शिकार खेलाया जाता है, और इसमें हमलोगों की कुछ हानि भी नही है | उसके प्रतिकार में हमलोगों को कुछ मिलता है, पर आजकल इस वन में जानवर दिखाई नहीं पड़ते | इसलिये सोचता हूँ कि कोई शेर या छोटा चीता ही मिल जाता, तो कार्य हो जाता |
     चन्दा---खोज किया था ?
     हीरा---हाँ, आदमी तो गया है |
     इतने में एक कोल दौड़ता हुआ आया, और कहा---राजा आ गये हैं और तहखाने में बैठे हैं | एक तेंदुआ भी दिखाई दिया है |
     हीरा का मुख प्रसन्नता से चमकने लगा, और वह अपना कुल्हाड़ा सम्हालकर उस आगंतुक के साथ वहां पहुंचा, जहाँ शिकार का आयोजन हो चूका था |
     राजा साहब झंझरी में बन्दूक की नाल रखे हुए ताक रहे हैं | एक ओर से बाजा बज उठा | एक चीता भागता हुआ सामने से निकला | राजा साहब ने उस पर वार किया | गोली लगी, पर चमड़े को छेदती हुई पार हो गई; इससे वह जानवर भागकर निकल गया | अब तो राजा साहब बहुत ही दुःखित  हुए | हीरा को बुलाकर कहा---क्यों जी, यह जानवर नही मिलेगा ?
     उस वीर कोल ने कहा---क्यों नही ?
     इतना कहकर वह उसी ओर चला | झाड़ी में जहाँ वह चीता घाव से व्याकुल बैठा हुआ था, वहां पहुंचकर उसने देखना आरम्भ किया |क्रोध से भरा हुआ चीता उस कोल-युवक को देखते ही झपटा | युवक असावधानी के कारण वार न कर सका, पर दोनों हाथों से उस भयानक जंतु की गर्दन को पकड़ लिया, और उसने भी इसके कंधे पर अपने दोनों पंजों को जमा दिया |
     दोनों में बल-प्रयोग होने लगा | थोड़ी देर में दोनों जमीन पर लेट गये |

शेष अगले भाग में...



     
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Saturday, 26 March 2016

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महानाश की भट्ठी-बाल कृष्ण शर्मा 'नवीन'|Mahanash ki bhatthi|Hindi poem|Poet-Bal Krishna Sharma 'Naveen'|

महानाश की भट्ठी 

अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी |
बढ़ आने दे अपनी लपटें लप-लप  करती हत्यारी |
धुआँधार अम्बर हो जाये, क्षितिज लालिमा में रंजित हो,
वसुधा की विभूतियाँ आज चिता की गोदी में संचित हों,
एक-एक क्षण में सहस्त्र युग के जलने की हो तयारी|
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी |

रँगे खून से हाथ, लोचनों में प्रपंच का कज्जल छाया,
मस्तिष्क में मोह-मदिरा ने अपना चिर नवरंग जमाया|
हिय में घृणा आन घुश बैठी, स्नेह-भावनाएं रोती हैं,
अंतर में कायरता की कुत्सित लीलाएँ होती हैं |
अरे अग्नि के पुंज, कहाँ हैं तेरी दहन-शक्तियाँ सारी ?
बढ़ आने दे अपनी लपटें लप-लप  करती हत्यारी |

जड़ता बनी धर्म-भूषण, शठता आचार्य बन बैठी,
भूत-दया का रूप धरे इस ओर नपुंसकता ऐंठी,
सामाजिक औदास्य-भाव बन गया भाग्य का फेर निराला,
निरुत्साह, दौर्बल्य, भीति-भय का पड़ गया हृदय पर पाला;
कर दे नष्ट आज सदियों का संचित यह कुभाव अविचारी |
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी !
Photo by pakorn
















शत-शत सुख की अभिलाषाएँ छिन में छार हो जाएँ,
कई सहस्त्र हृदय की दुर्बलताएँ पल-भर में खो जाये,
लक्ष-लक्ष लोचनों में चमके प्राण-दान की निर्मल ज्वाला,
कोटि-कोटि कंठों से सर्वनाश का हो उदघोष निराला,
झमक झूम झकझोर भस्म कर दे निसर्ग की तुंग अटारी!
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी!

मान और मर्यादा छूटी, बिखर गयी गरिमा छन-भर में.
रण-हुँकारकारिणी शक्ति लुप्त हो गयी आह! अम्बर में;
गिरि-गह्वर में, वन-उपवन में अथवा किसी शून्य प्रान्तर में,
डोल रहे हैं कुछ दीवाने ले आशा-प्रदीप निज कर में,
कब से खोज रहे हैं तुमको सर्वनाश की ओ चिनगारी!
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू सर्वनाश की भट्ठी प्यारी!

आज सव्यसाची को खाण्डव विपिन-दहन फिर से दिखला दे,
अग्नि-कुमारों को आग से खेलना तू फिर से सिखला दे,
दिखला दे कि मरण ही जीवन है, रण-प्रांगण ही गीता है,
सिखला दे, ओ आग ! कि महाशांति तुझसे ही परिणीता है,
तेरी अनुगामिनी बनी नव प्रातः की ऊषा सुकुमारी,
क्यों झिझके री, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी !

चट-चट करती धू-धू करती हा-हा-हू हूकार मचा दे,
अपने शोलों के फूलों से मेरा आँगन आज रचा दे,
अरी, नचा दे अपनी लपटें इधर-उधर सब ओर निराली,
काली की जिह्वा-सी रक्तशोषिका लौ लपके मतवाली,
धुआँ उठे, पाखण्ड जले, हिमखण्ड सुने, देखें त्रिपुरारी,
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्टी प्यारी!

अम्बर में अंगारें बरसें, जलद धुआँ बनकर मंडराएँ 
वज्र्घोश से सुप्त रोष की भौहें विकराली चढ़ जाएँ,
अंगड़ाई लेकर विद्रोह फट पड़े अब ज्वलंत मुधर-सा,
अरी, धधक उठ, धक्-धक् कर तू महानाश की भट्ठी प्यारी!





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Saturday, 6 February 2016

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हिम्मत और ज़िन्दगी

प्रिय पाठकों आज मै आपके साथ एक ऐसा लेख साँझा करने जा रहा हूँ जो रामधारी सिंह दिनकर जी द्वारा रचित है | इस लेख का नाम है 'हिम्मत और ज़िन्दगी' | यह लेख जीवन के उस सत्य को साथ लेकर चलता है, जिसके अनुसार हिम्मत, परिश्रम, साहस और कर्मठता आदि तत्व हमारी सफलता के आधार बिंदु हैं |
तो आईये पढ़ते है इस ओजस्वी लेख को |

 

हिम्मत और जिंदगी


             ज़िन्दगी के असली मज़े उनके लिए नहीं हैं जो फूलों की छाँह के नीचे खेलते और सोते है | बल्कि फूलों की छाँह के नीचे अगर जीवन का कोई स्वाद छिपा है तो वह भी उन्ही के लिए है जो दूर रेगिस्तान से आ रहे हैं, जिनका कंठ सूखा है, ओंठ फटे हुए और सारा बदन पसीने से तर है | पानी में जो अमृत वाला तत्त्व है, उसे वह जानता है जो धूप में खूब सूख चूका है, वह नहीं जो रेगिस्तान में कभी पड़ा ही नहीं है |
             सुख देनेवाली चीज़ें पहले भी थीं और अब भी हैं | फ़र्क यह है कि जो सुखों का मूल्य पहले चुकाते हैं  और उनके मज़े बाद में लेते हैं उन्हें स्वाद अधिक मिलता है | जिन्हें आराम आसानी से मिल जाता है, उनके लिए आराम ही मौत है |
             जो लोग पाँव भीगने के खौफ़ से पानी से बचते रहते हैं, समुद्र में डूब जाने का खतरा उन्ही के लिए है | लहरों में तैरने का जिन्हें अभ्यास है वे मोती लेकर बहर आएँगे |
             चांदनी की ताजगी और शीतलता का आनन्द वह मनुष्य लेता है जो दिनभर धूप में थककर लौटा है, जिसके शरीर को अब तरलाई की ज़रुरत महसूस होती है औरे जिसका मन यह जानकर संतुष्ट है की दिन भर का समय उसने किसी अच्छे काम में लगाया है |
             इसके विपरीत वह आदमी भी है जो दिन भर खिड़कियाँ बंद करके पंखों के नीचे छिपा हुआ था और अब रात में जिसकी सेज बाहर चांदनी में लगाई गई है | भ्रम तो शायद उसे भी होता होगा कि वह चांदनी के मज़े ले रहा है, लेकिन सच पूछिए तो वह खुशबूदार फूलों के रस में दिन-रत सड़ रहा है |
             उपवास और संयम ये आत्महत्या के साधन नहीं है | भोजन का असली स्वाद उसी को मिलता है जो कुछ दिन बिना खाए भी रह सकता है | 'त्यक्तेन भुंजीथा:', जीवन का  भोग त्याग के साथ करो, यह केवल परमार्थ का ही उपदेश नहीं है, क्योंकि संयम से भोग करने पर जीवन से जो आनन्द प्राप्त होता है, वह निरा भोगी बनकर भोगने से नहीं मिल पता |
             बड़ी चीज़ें बड़े संकटों में विकास पाती हैं, बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्ज़ा करती हैं | अकबर ने तेरह साल की उम्र में अपने बाप के दुश्मन को परास्त कर  दिया था जिसका एक मात्र कारण यह था कि अकबर का जन्म रेगिस्तान में हुआ था, और वह भी उस समय, जब उसके बाप के पास एक कस्तूरी को छोड़कर और कोई दौलत नहीं थी |
             महाभारत में देश के प्राय: अधिकांस वीर कौरवों के पक्ष में थे | मगर फिर भी जीत पांडवों की हुई; क्योंकि उन्होंने लाक्षागृह की मुसीबत झेली थी, क्योंकि उन्होंने वनवास के जोखिम को पार किया था |
             श्री विंस्टन चर्चिल ने कहा है की जिंदगी की सबसे बड़ी सिफ़त हिम्मत है | आदमी के और सारे गुण उसके हिम्मती होने से ही पैदा होते हैं |
             ज़िन्दगी की दो सूरते हैं | एक तो यह की आदमी बड़े-से-बड़े मकसद के लिए कोशिश करे, जगमगाती हुई जीत पर पंजा डालने के लिए हाथ बढ़ाए, और अगर असफलताएँ कदम-कदम पर जोश की रोशनी के साथ अंधियाली का जाल बुन रही हों, तब भी वह पीछे को पाँव न हटाये |
             दूसरी सूरत यह है की उन ग़रीब आत्माओं का हमजोली बन जाये जो न तो बहुत अधिक सुख पाती हैं और न जिन्हें बहुत अधिक दुःख पाने का ही संयोग है, क्योंकि वे आत्माएँ ऐसी गोधुलि में बस्ती हैं जहाँ न तो जीत हंसती है और न कभी हार के रोने की आवाज़ सुनाई पड़ती है | इस गोधुलि वाली दुनिया के लोग बंधे हुए घाट का पानी पीते हैं, वे ज़िन्दगी के साथ जुआ नहीं खेल सकते | और कौन कहता है की पूरी ज़िन्दगी को दाव पर लगा देने में कोई आनन्द नहीं है?
             अगर रास्ता आगे ही आगे निकल रहा हो तो फिर असली मज़ा तो पाँव बढ़ाते जाने में ही है |
             साहस की ज़िन्दगी सबसे बड़ी ज़िन्दगी होती है | ऐसी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी पहचान यह है की वह बिल्कुल निडर, बिल्कुल बेखौफ़ होती है | साहसी मनुष्य की पहली पहचान यह है कि वह इस बात की चिंता नहीं करता कि तमाशा देखनेवाले लोग उसके बारे में क्या सोच रहे हैं | जनमत की उपेक्षा करके  जीनेवाला आदमी दुनिया की असली ताकत होते है और मनुष्यता को प्रकाश भी उसी आदमी से मिलता है | क्रांति करनेवाले लोग अपने उद्देश्य की तुलना न तो पड़ोसी के उद्देश्य से करते हैं न अपनी चाल को ही पड़ोसी की चाल देखकर मद्धिम बनाते हैं |
             साहसी मनुष्य उन सपनों में भी रस लेता है जिन सपनों का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं है |
             साहसी मनुष्य सपने उधार नहीं लेता है, वह अपने विचारों में रमा हुआ अपनी ही किताब पढ़ता है |
             झुण्ड में चलना और झुण्ड में चरना, यह भैंस और भेड़ का काम है | सिंह तो बिल्कुल अकेला होने पर भी मगन रहता है |
             अर्नाल्ड बेनेट ने एक जगह लिखा है कि जो आदमी यह महसूस करता है कि किसी महान निश्चय के समय वह साहस से काम नहीं ले सका, जिंदगी की चुनौती को कुबूल नहीं कर सका, वह सुखी नहीं हो सकता | बड़े मौक़े पर साहस नहीं दिखानेवाला आदमी बार-बार अपनी आत्मा के भीतर एक आवाज सुनता रहता है, एक ऐसी आवाज़ जिसे वही सुन सकता है और जिसे वह रोक भी नहीं सकता | यह आवाज़ उसे बराबर कहती है, "तुम साहस नहीं दिखा सके, तुम कायर की तरह भाग खड़े हुए |" संसारिक अर्थ में जिसे हम सुख कहते हैं उसका न मिलना, फिर भी, इससे कहीं श्रेष्ठ है कि मरने के समय हम अपनी आत्मा से यह धिक्कार सुनें कि तुममें हिम्मत की कमी थी, तुममें साहस का आभाव था, कि तुम ठीक वक्त पर जिंदगी से भाग खड़े हुए |
             जिंदगी को ठीक से जीना हमेशा ही जोखिम झेलना है और जो आदमी सकुशल जीने के लिए जोखिम का हर जगह पर एक घेरा डालता है, वह अन्तत: अपने ही घेरों के बीच कैद हो जाता है और ज़िन्दगी का कोई मज़ा उसे नहीं मिल पाता, क्योंकि जोखिम से बचने की कोशिश में , असल में, उसने जिंदगी को ही आने में रोक रखा है |
             जिंदगी से, अंत में, हम उतना ही पाते हैं जितनी कि उसमें पूँजी लगाते हैं | यह पूँजी लगाना जिंदगी के संकटों का सामना करना है, उसके उस पन्ने को उलट कर पढ़ना है जिसके सभी अक्षर फूलों से ही नहीं, कुछ अंगारों से भी लिखे गए हैं | ज़िन्दगी का भेद कुछ उसे ही मालूम है जो यह जानकर चलता है कि जिंदगी कभी भी खत्म न होने वाली चीज़ है |
              अरे! ओ जीवन के साधको! अगर किनारे की मरी हुई सीपियों से ही तुम्हें संतोष हो जाये तो समुद्र के अन्तराल में छिपे हुए  मौक्तित-कोष की कौन बहर लायेगा?
              दुनिया में जितने भी मज़े बिखरे गए हैं उनमें तुम्हारा भी हिस्सा है | वह चीज़ भी तुम्हारी हो सकती है जिसे तुम अपनी पहुँच के परे मानकर लौट जा रहे हो |
             कामना का अंचल छोटा मत करो, जिंदगी के फल को दोनों हाथों से दबाकर निचोड़ो, रस के निर्झरी तुम्हारे बहाए भी बह सकती है |
          यह अरण्य , झुरमुट जो काटे अपनी राह बना ले,
          क्रीतदास यह नहीं किसी का जो चाहे अपना ले |
          जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर! जो उससे डरते हैं |
          वह उनका जो चरण रोप निर्भय होकर लड़ते हैं |
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