Friday, 13 January 2017

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गेहूँ और गुलाब | रामवृक्ष बेनीपुरी | हिंदी लेख | Gehu aur Gulab | Ramvirksh Benipuri | Hindi lekh |

इस लेख में रामवृक्ष बेनीपुरी ही यह विमर्श कर रहे हैं कि गेहूं हमारी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है जबकि गुलाब मानसिक आवश्यकताओं की | यदि हम मानसिक आवश्यताओं की जगह शारीक आवश्यकताओं को पहल देंगे तो हम में मानवता की जगह राक्षसता के गुण आजायेंगे क्योंकि मानव को मानव मन की शरीर पर जीत ने बनाया है |

गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है।

गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस?

जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे !

गेहूँ - उसकी भूख का काफला आज गेहूँ पर टूट पड़ा है? गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ !

मैदान जोते जा रहे हैं, बाग उजाड़े जा रहे हैं - गेहूँ के लिए।

बेचारा गुलाब - भरी जवानी में सि‍सकियाँ ले रहा है। शरीर की आवश्‍यकता ने मानसिक वृत्तियों को कहीं कोने में डाल रक्‍खा है, दबा रक्‍खा है।

किंतु, चाहे कच्‍चा चरे या पकाकर खाए - गेहूँ तक पशु और मानव में क्‍या अंतर? मानव को मानव बनाया गुलाब ने! मानव मानव तब बना जब उसने शरीर की आवश्‍यकताओं पर मानसिक वृत्तियों को तरजीह दी।

यही नहीं, जब उसकी भूख खाँव-खाँव कर रही थी तब भी उसकी आँखें गुलाब पर टँगी थीं।

उसका प्रथम संगीत निकला, जब उसकी कामिनियाँ गेहूँ को ऊखल और चक्‍की में पीस-कूट रही थीं। पशुओं को मारकर, खाकर ही वह तृप्‍त नहीं हुआ, उनकी खाल का बनाया ढोल और उनकी सींग की बनाई तुरही। मछली मारने के लिए जब वह अपनी नाव में पतवार का पंख लगाकर जल पर उड़ा जा रहा था, तब उसके छप-छप में उसने ताल पाया, तराने छोड़े ! बाँस से उसने लाठी ही नहीं बनाई, वंशी भी बनाई।

रात का काला-घुप्‍प परदा दूर हुआ, तब यह उच्छवसित हुआ सिर्फ इसलिए नहीं कि अब पेट-पूजा की समिधा जुटाने में उसे सहूलियत मिलेगी, बल्कि वह आनंद-विभोर हुआ, उषा की लालिमा से, उगते सूरज की शनै: शनै: प्रस्‍फुटित होनेवाली सुनहली किरणों से, पृथ्‍वी पर चम-चम करते लक्ष-लक्ष ओसकणों से! आसमान में जब बादल उमड़े तब उनमें अपनी कृषि का आरोप करके ही वह प्रसन्‍न नहीं हुआ। उनके सौन्‍दर्य-बोध ने उसके मन-मोर को नाच उठने के लिए लाचार किया, इन्‍द्रधनुष ने उसके हृदय को भी इन्‍द्रधनुषी रंगों में रँग दिया!

मानव-शरीर में पेट का स्‍थान नीचे है, हृदय का ऊपर और मस्तिष्‍क का सबसे ऊपर। पशुओं की तरह उसका पेट और मानस समानांतर रेखा में नहीं है। जिस दिन वह सीधे तनकर खड़ा हुआ, मानस ने उसके पेट पर विजय की घोषणा की।

गेहूँ की आवश्‍यकता उसे है, किंतु उसकी चेष्‍टा रही है गेहूँ पर विजय प्राप्‍त करने की। उपवास, व्रत, तपस्‍या आदि उसी चेष्‍टा के भिन्‍न-भिन्‍न रूप रहे हैं।

जब तक मानव के जीवन में गेहूँ और गुलाब का सम-तुलन रहा वह सुखी रहा, आनंदमय रहा !

वह कमाता हुआ गाता था और गाता हुआ कमाता था। उसके श्रम के साथ संगीत बँधा हुआ था और संगीत के साथ श्रम।

उसका साँवला दिन में गायें चराता था, रात में रास रचाता था।

पृथ्‍वी पर चलता हुआ वह आकाश को नहीं भूला था और जब आकाश पर उसकी नजरें गड़ी थीं, उसे याद था कि उसके पैर मिट्टी पर हैं।

किंतु धीरे-धीरे यह सम-तुलन टूटा।

अब गेहूँ प्रतीक बन गया हड्डी तोड़नेवाले, उबानेवाले, थकानेवाले, नारकीय यंत्रणाएँ देनेवाले श्रम का - वह श्रम, जो पेट की क्षुधा भी अच्‍छी तरह शांत न कर सके।

और गुलाब बन गया प्रतीक विलासिता का - भ्रष्‍टाचार का, गंदगी और गलीज का। वह विलासिता - जो शरीर को नष्‍ट करती है और मानस को भी !

अब उसके साँवले ने हाथ में शंख और चक्र लिए। नतीजा - महाभारत और यदुवंशियों का सर्वनाश !

वह परंपरा चली आ रही है। आज चारों ओर महाभारत है, गृहयुद्ध है, सर्वनाश है, महानाश है!

गेहूँ सिर धुन रहा है खेतों में, गुलाब रो रहा है बगीचों में - दोनों अपने-अपने पालन-कर्ताओं के भाग्‍य पर, दुर्भाग्‍य पर !

चलो, पीछे मुड़ो। गेहूँ और गुलाब में हम एक बार फिर सम-तुलन स्‍थापित करें।

किंतु मानव क्‍या पीछे मुड़ा है? मुड़ सकता है?

यह महायात्री चलता रहा है, चलता रहेगा !

और क्या नवीन सम-तुलन चिरस्‍थायी हो सकेगा? क्‍या इतिहास फिर दुहराकर नहीं रहेगा?

नहीं, मानव को पीछे मोड़ने की चेष्‍टा न करो।

अब गुलाब और गेहूँ में फिर सम-तुलन लाने की चेष्‍टा में सिर खपाने की आवश्‍यकता नहीं।

अब गुलाब गेहूँ पर विजय प्राप्‍त करे ! गेहूँ पर गुलाब की विजय - चिर विजय! अब नए मानव की यह नई आकांक्षा हो!

क्‍या यह संभव है?

बिलकुल सोलह आने संभव है !

विज्ञान ने बता दिया है - यह गेहूँ क्‍या है। और उसने यह भी जता दिया है कि मानव में यह चिर-बुभुक्षा क्‍यों है।

गेहूँ का गेहुँत्‍व क्‍या है, हम जान गए हैं। यह गेहुँत्‍व उसमें आता कहां से है, हमसे यह भी छिपा नहीं है।

पृथ्‍वी और आकाश के कुछ तत्‍व एक विशेष प्रतिक्रिया के पौधों की बालियों में संगृहीत होकर गेहूँ बन जाते हैं। उन्‍हीं तत्‍वों की कमी हमारे शरीर में भूख नाम पाती है !

क्‍यों पृथ्‍वी की कुड़ाई, जुताई, गुड़ाई! हम पृथ्‍वी और आकाश के नीचे इन तत्‍वों को क्‍यों न ग्रहण करें?

यह तो अनहोनी बात - युटोपिया, युटोपिया!

हाँ, यह अनहोनी बात, युटोपिया तब तक बनी रहेगी, जब तक मानव संहार-काण्‍ड के लिए ही आकाश-पाताल एक करता रहेगा। ज्‍यों ही उसने जीवन की समस्‍याओं पर ध्‍यान दिया, यह बात हस्‍तामलकवत् सिद्ध होकर रहेगी !

और, विज्ञान को इस ओर आना है; नहीं तो मानव का क्‍या, सर्व ब्रह्माण्‍ड का संहार निश्चित है !

विज्ञान धीरे-धीरे इस ओर भी कदम बढ़ा रहा है !

कम से कम इतना तो अवश्‍य ही कर देगा कि गेहूँ इतना पैदा हो कि जीवन की परमावश्‍यक वस्‍तुएँ हवा, पानी की तरह इफरात हो जायँ। बीज, खाद, सिंचाई, जुताई के ऐसे तरीके और किस्‍म आदि तो निकलते ही जा रहे हैं जो गेहूँ की समस्‍या को हल कर दें !

प्रचुरता - शारीरिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने वाले साधनों की प्रचुरता - की ओर आज का मानव प्रभावित हो रहा है !

प्रचुरता? - एक प्रश्‍न चिह्न!

क्‍या प्रचुरता मानव को सुख और शांति‍ दे सकती है?

'हमारा सोने का हिंदोस्‍तान' - यह गीत गाइए, किंतु यह न भूलिए कि यहाँ एक सोने की नगरी थी, जिसमें राक्षसता निवास करती थी! जिसे दूसरे की बहू-बेटियों को उड़ा ले जाने में तनिक भी झिझक नहीं थी।

राक्षसता - जो रक्‍त पीती थी, जो अभक्ष्‍य खाती थी, जिसके अकाय शरीर था, दस शिर थे, जो छह महीने सोती थी !

गेहूँ बड़ा प्रबल है - वह बहुत दिनों तक हमें शरीर का गुलाम बनाकर रखना चाहेगा! पेट की क्षुधा शांत कीजिए, तो वह वासनाओं की क्षुधा जाग्रत कर बहुत दिनों तक आपको तबाह करना चाहेगा।

तो, प्रचुरता में भी राक्षसता न आवे, इसके लिए क्‍या उपाय?

अपनी मनोवृत्तियों को वश में करने के लिए आज का मनोविज्ञान दो उपाय बताता है - इंद्रियों के संयमन की ओर वृत्तियों को उर्ध्‍वगामी करने की।

संयमन का उपदेश हमारे ऋषि-मुनि देते आए हैं। किंतु, इसके बुरे नतीजे भी हमारे सामने हैं - बड़े-बड़े तपस्वियों की लंबी-लंबी तपस्‍याएँ एक रम्‍भा, एक मेनका, एक उर्वशी की मुस्‍कान पर स्‍खलित हो गईं!

आज भी देखिए। गांधीजी के तीस वर्ष के उपदेशों और आदेशों पर चलनेवाले हम तपस्‍वी किस तरह दिन-दिन नीचे गिरते जा रहे हैं।

इसलिए उपाय एकमात्र है - वृत्तियों को उर्ध्‍वगामी करना !

कामनाओं को स्‍थूल वासनाओं के क्षेत्र से ऊपर उठाकर सूक्ष्‍म भावनाओं की ओर प्रवृत्त कीजिए।

शरीर पर मानस की पूर्ण प्रभुता स्‍थापित हो - गेहूँ पर गुलाब की !

गेहूँ के बाद गुलाब - बीच में कोई दूसरा टिकाव नहीं, ठहराव नहीं !

गेहूँ की दुनिया खत्‍म होने जा रही है। वह दुनिया जो आर्थिक और राजनीतिक रूप में हम सब पर छाई है।

जो आर्थिक रूप से रक्‍त पीती रही, राजनीतिक रूप में रक्‍त बहाती रही !

अब दुनिया आने वाली है जिसे हम गुलाब की दुनिया कहेंगे। गुलाब की दुनिया -मानस का संसार - सांस्‍कृतिक जगत्।

अहा, कैसा वह शुभ दिन होगा हम स्‍थूल शारीरिक आवश्‍यकताओं की जंजीर तोड़कर सूक्ष्‍म मानव-जगत् का नया लोक बनाएँगे?

जब गेहूँ से हमारा पिण्‍ड छूट जायगा और हम गुलाब की दुनिया में स्‍वच्‍छंद विहार करेंगे !

गुलाब की दुनिया - रंगों की दुनिया, सुगंधों की दुनिया!

भौंरे नाच रहे, गूँज रहे; फुल सूँघनी फुदक रही, चहक रही! नृत्‍य, गीत - आनंद, उछाह!

कहीं गंदगी नहीं, कहीं कुरूपता नहीं, आंगन में गुलाब, खेतों में गुलाब, गालों पर गुलाब खिल रहे, आँखों से गुलाब झाँक रहा !

जब सारा मानव-जीवन रंगमय, सुगंधमय, नृत्‍यमय, गीतमय बन जायगा! वह दिन कब आयेगा !

वह आ रहा है - क्‍या आप देख नहीं रहे हैं ! कैसी आँखें हैं आपकी। शायद उन पर गेहूँ का मोटा पर्दा पड़ा हुआ है। पर्दे को हटाइए और देखिए वह अलौकिक स्‍वर्गिक दृश्‍य इसी लोक में, अपनी इस मिट्टी की पृथ्‍वी पर ही!

शौके दीदार अगर है, तो नजर पैदा कर!
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Thursday, 12 January 2017

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पुरुष का भाग्य | अज्ञेय | हिंदी कहानी | Purush ka Bhagya | Hindi Kahani | Agyey



मानव की मानव के प्रति जागरूकता आज के इस ज़माने में एक मशीन की आड़ में प्रकट होती है - या तो वह मोटर के स्टीयरिंग पर बैठा पहियों को बचाकर चलने में चौकन्ना है, या वह स्वयं राही है और मोटर के स्टीयरिंग पर बैठे हुए अनेक मानवों से बचकर चलने में चौकन्ना है। बचने और बचाने का ही रिश्ता जब मानव-मानव में हो, तब इसकी सम्भावना कम है कि उस अकेली चलती हुई औरत की विचित्र क्रिया पर किसी का भी ध्यान गया हो - फिर चाहे कोल्हू के बैल-से आज के मानव के जीवन में वह क्रिया कितना ही गहरा अभिप्राय रखती हो...

मानिकतल्ले की सड़क पर, कॉलेज-स्क्वेयर से कुछ आगे, काली के मन्दिर के पास ही पटरी पर वह चली जा रही थी। मन्दिर में अर्च्चा में बहाये हुए, या प्रार्थिनी विधवाओं के गीले कपड़ों से बहे हुए, पानी से वह पटरी कुछ दूर पर तक पैरों-जूतों के पिच-पिच उपहारों से क्लान्त और बोझल, फिर क्रमशः सूखी होती चली गयी थी।

इसी स्थल पर चलती हुई वह औरत एकाएक अकचका कर रुकी, हड़बड़ाई सी पैर बचाकर एक ओर को हटी और फिर सिमट कर बचती हुई-सी आगे बढ़ी, दो कदम चलकर रुकी और फिर धीरे-धीरे, काँपती-सी आगे चली गयी...

कोई भी इस क्रिया को देखता तो अनुमान लगाता कि बहुत देर से व्रतादि करनेवाली किसी जीवन-विक्षत, धर्मप्राण हिन्दू स्त्री के अनुष्ठान से लौटते समय पैर के नीचे अचानक किसी जीव-जीव भी सख्त त्वचावाला नहीं, पिलपिला और चेंपदार, जिससे छूकर तलवे का संवेदनशील मध्य भाग तड़प जाये, जैसे मेंढक या केंचुआ-के आ जाने से जो प्रतिक्रिया होती, वही प्रतिक्रिया यहाँ भी देखी है।

लेकिन पटरी पर तो कोई जीव नहीं था, किसी भूतपूर्व जीव की लोथ भी नहीं।

केवल सूखी हुई धूल के ऊपर दो गीले पैरों की छाप वहाँ पर थी - पास-पास, छोटे-छोटे। इन्हीं बाल पद चिह्नों पर पैर पड़ने से वह इतनी आकुलता से बची थी - उसका सारा पिंजर काँप गया था और वह जैसे गिरने लगी थी, फिर सँभलकर आगे बढ़ी थी।

वह ऐसे था, जैसे घोर कारागार में एकाएक कोई फाटक खुल गया हो...

१ 

पाँच क़दम लम्बाई की उस कोठरी के भीतर भ्रान्त गीत से आगे-पीछे घूमती हुई प्रतिमा एकाएक रुक गयी। क्या आगे-पीछे ही जीवन-क्रम है? वह बन्दिनी है, लेकिन इस परिपाटी के खिलाफ़ विद्रोह करना चाहती है। क्यों जीवन में आगे ही बढ़ना या पीछे ही हटना? क्यों पाँच क़दम आगे और पाँच क़दम वापस? वह आगे-पीछे का क्रम छोड़कर कोठरी के चारों ओर चक्कर काटने लगी-बीच में चक्की, खड्डी, पतरा कई विघ्न थे, लेकिन सीधी की बजाय मंडलाकार चाल चलने से उसे कुछ सन्तोष हुआ। यह गोल-गोल घूमना भी कोल्हू के बैल की तरह है, पर सन्तोष शायद इसलिए मिलता है कि वह केवल घिरी हुई नहीं है, कुछ है जो उसकी भी मुट्ठी में है; कुछ जो उसकी देन है, जो उसके अन्तरतम से प्रसूत होकर बाहर की ओर, संसार की ओर उन्मुख है, कुछ जो-

प्रतिमा को लगता है, वह बद्ध रहेगी, जेल ही में रहेगी, पर जैसे किसी अव्यक्त, दिव्य निमित्त से कहीं को एक फाटक उसके लिए खुल गया है...

२ 

आत्म-प्रवंचना! कौन-सा, किधर का, कहाँ को है - वह फाटक जो खुला है?

जेल के इन पिछले चार वर्षों में प्रतिमा के जीवन-मन्दिर में कई फाटक खुले और बन्द हुए हैं। कभी कहीं फाटक न होने से सेंध लगाकर ही कालतस्कर घुस आया है और न जाने किधर को निकल गया है। प्रतिमा का पति किसी षड्यन्त्र के मुक़दमे में फाँसी लटक गया है; वह स्वयं एक ऐसे ही अपराध में, स्कूल में अध्यापन करती हुई, क्लास में से पकड़कर जेल में डाल दी गयी है और वहीं सात वर्ष की कारावास की सज़ा की घोषणा होते-होते तक स्त्री से माता हो गयी है। धरे हुए पुरुष का खोना और जने हुए पुरुष का पाना इतना पास-पास हुआ है कि वह उद्भ्रान्त-सी हो गयी है, लेकिन खुलने और बन्द होनेवाले इन फाटकों की भूलभूलैयाँ में उसने अपना अभिमान नहीं खोया है। लोगों ने उसे विश्वास दिलाया था कि माता होने पर वह छूट जाएगी, उसने तिरस्कारपूर्वक इस विश्वास को निकाल फेंका था। छोड़ी वह नहीं गयी, और विश्वास व्यर्थ गया, लेकिन उसने तिरस्कार किया था तो निराश होने के डर से नहीं, एक सहज दर्प से, जो किसी की दया से छूटना नहीं चाहता था।

और न जाने किस दिव्य या दैव क्रिया से, प्रतिमा को अकेलापन नहीं अखरा था, न जाने कैसे वरे हुए पुरुष के अन्तर्धान होने की खलिश इस जने हुए पुरुष ने धीरे-धीरे दूर कर दी थी। वह पुरुष अभी शिशु था, उसकी चाल अटपटी और वाणी तुतली थी, पर प्रतिमा को ऐसा लगता था कि वह भाग्य के फाटक की ओर समर्थ पैरों से बढ़ रहा है, कि उसके स्पर्श से फाटक खुल जाएगा, कि उसके पीछे खड़ी होकर प्रतिमा भी देखेगी कि वह भाग्य शिशु का नहीं, पुरुष का है...

३ 

कब की बात है? कैसे उसे याद आती है? याद नहीं आनी चाहिए, क्योंकि आज उसका सारा जीवन एक ही अनुभूति केन्द्रित है, और वह अनुभूति शिशु-पुरुष की समीपता की नहीं है, ‘वह दूसरी अनुभूति है’ ओफ़ कितनी दूसरी!

क्योंकि वह शिशु-पुरुष आज उसके साथ नहीं है। एक दिन जेलवालों ने कहा था, बालक अब बड़ा हो गया है अब तुम्हारे साथ नहीं रहा सकता। तुम्हारे सम्बन्धी हैं? तब उसने अभिमान से कह दिया था, मेरा कोई नहीं है। यह मेरे पास रहेगा। और एक बार जगाकर इस अभिमान को छोड़ना कठिन हो गया था - फाटक कई हैं, लेकिन आलोक अभिमान का है। उस दिन वे चले गये थे, पर पीछे प्रतिमा को पता लग गया था कि उसका भाग्य उसके साथ नहीं है, कि जिस शिशु को जेलवालों ने पुरुष मान लिया है, उसका मार्ग अलग होगा ही। और एक दिन वे आकर उसे ले गये थे-कह गये थे कि वे उसे अनाथाश्रम में रखने का प्रबन्ध कर रहे हैं... जेल के फाटक के बाहर - पर अनाथाश्रम का फाटक...

४ 

एक दिन ले गये थे? आज है वह दिन - अभी वे उसे ले गये हैं। अभी, जब मैं यह चक्कर काटने लगी हूँ। अभी! पुरुष को पाना, पुरुष को खो देना-क्या वह आगे-पीछे की गति ही जीवन की गति है? मैं इसे अस्वीकार करती हूँ। मैं कोठरी का चक्कर काटती हूँ; मैं पृथ्वी का एक अंश घेरती हूँ, जीवन का एक अंश है, जो मेरी मुट्ठी में है; जो मुझसे प्रस्तुत होकर संसारोन्मुख है, जो-

इस समय वह जेल के दफ्तर में होगा। कुछ लिखा-पढ़ी हो रही होगी, कुछ काग़जी कार्रवाई, उसके बाद वह वहाँ से भी आगे चलेगा, वह फाटक उसके लिए खुलेगा और वह उतनी सब सीढ़ियाँ उतरकर आगे बढ़ेगा - कि फाटक अब तक खुल ही चुका है?

मैं अपनी कोठरी में आगे-पीछे नहीं, चक्कर काटती हुई चल रही हूँ; यह भी कोल्हू के बैल की तरह है, पर उसकी मार्फत मुझे लगता है, जैसे कहीं को एक फाटक मेरे लिए खुल गया है; मेरे लिए किसी अव्यक्त, दिव्य निमित्त से, पर उसी की मार्फत, उसी पुरुष की मार्फत, जिसका भाग्य मैंने गढ़ा है...

दफ्तर में।

क्या बच्चे को पता है कि वह अब पुरुष है, कि वह माँ से छिन नहीं रहा, पुरुषत्व को प्राप्त कर रहा है, पुरुष के भाग्य की ओर जा रहा है? क्योंकि वह रो नहीं रहा है, एक अपरिचित, अस्पष्ट-सा अभिमान उसके भीतर भर रहा है कि इन अनेक छोटे-बड़े अफ़सरों के बीच वह एक बच्चे की तरह नहीं, उनके परामर्शों का केन्द्र बनकर खड़ा है... तभी तो, जब जेल का सुपरिंटेंडेंट उसे बाहर भेजने की कार्रवाई समाप्त करके चलने को हुआ, ड्योढ़ी से निकलकर फाटक तक आया, कई सांकलों और कुंडों की खड़खड़ झनझन के साथ फाटक खुला, तब सुपरिंटेंडेंट को पहुँचाने आये हुए छोटे अफ़सरों के साथ वह भी आगे बढ़ता आया। उस समय कोई विशेष आह्लाद उसके मन में नहीं था, केवल वह कुछ-कुछ चेतता हुआ अभिमान-बढ़कर साहब के बराबर को हो लिया, किसी ने उसे रोका नहीं (क्या इसलिए नहीं कि वह बच्चा है? नहीं, उससे नये अभिमान ने कहा, नहीं इसलिए कि वह पुरुष है!), वह और आगे बढ़ा-

चौदह सीढ़ियाँ और फिर रास्ता और उसके ऊपर आकाश - आकाश को चीरता हुआ एक आरक्त-कंठ तोता - आह, यहाँ नहीं हैं सींखचे, नहीं हैं फाटक - है एक आकुल निमन्त्रण-

स्वातन्त्र्य-पुरुष का भाग्य...

उसका पैर फिसल गया। जैसे अनन्त का फाटक खुला और बन्द हो गया। दृश्य को घेरनेवाली आँखें फिर अपनी ज्योति में घिर गयी।

५ 

चक्कर काटती हुई प्रतिमा क्षण-भर रुक गयी, न जाने क्यों। फिर वह घेरा छोड़कर पहले की तरह चलने लगी क्या आगे और पीछे ही जीवन-क्रम है वह विद्रोह करना चाहती है। पुरुष को पाना और पुरुष को खोना, आगे और पीछे, पीछे और आगे-काले सींखचों से अन्धी दीवार तक, अँधी दीवार से काले सींखचों तक, जिसके आगे दूसरी दीवार के सींखचे, जिसके आगे - क्या है, क्या है, मेरे पुत्र का भवितव्य, मेरे वरे हुए नहीं, जने हुए पुरुष का भाग्य!

क्रमशः वह जान जाएगी।

काली के मन्दिर के पास की पटरी पर वह औरत लड़खड़ा कर फिर सँभल गयी है और आगे चल पड़ी है। कोई फाटक खुला नहीं है, आगे सींखचे हैं।

(कलकत्ता, जनवरी 1940)
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Tuesday, 10 January 2017

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छाया | कहानी | अज्ञेय | Chhaya | Hindi Story | Agyey |



मैंने बहुत फाँसियाँ देखी हैं उन्हें देखने का आदी-सा हो गया हूँ। जब मेरी ड्यूटी फाँसी पर लगती है, तब मुझे घबराहट नहीं होती, मेरा जी नहीं मिचलता। अपना काम पूरा करता हूँ। और खुशी-खुशी चला आता हूँ, दूसरी बार मुझे उसका ख़याल भी नहीं होता। जैसा कहानियों में होता है, चलते-चलते ठिठक जाऊँ, खाना खाते-खाते चौंककर देखने लगूँ कि हाथों में खून तो नहीं लगा है, सोते-सोते स्वप्न में चिल्ला उठूँ, यह सब मुझे न होता है न कभी हुआ है। हाँ, उस एक फाँसी की याद मेरा भी दिल हिला देती है। इसलिए नहीं कि उसमें कोई खास बात थी। नहीं, वह भी और फाँसियों की तरह एकदम मामूली फाँसी थी... पर उसके पहले और बाद की एक-दो घटनाएँ ऐसी थीं, और वह क़ैदी जो उस दिन फाँसी देखने के लिए भेजा गया था, उसके मुँह के भाव शायद और फाँसियों की तरह मैं उस फाँसी को भूल जाता, लेकिन उस कैदी की याद एकदम फाँसी की याद दिला देती है... कैदी की फाँसी की और उन एक-दो घटनाओं की कहानी एक-दूसरे से ऐसी जुड़ी हुई है कि एक का ध्यान आते ही सारी कहानियाँ आँखों के सामने फिर जाती हैं -और उस लड़की के पत्र की, उस बेंत लगने के नज़ारे की, और उस क़ैदी के गाने की याद मेरे आगे नाच उठती हैः

आसन तलेर माटिर परै लूटिए र’ब।

तोमार चरण धूलाय धूलाय धूसर ह’ब!

बाईस साल से जेल में वार्डरी करता हूँ, लेकिन ऐसी बात कभी नहीं देखी थी। और बार्डरों की तरह मैंने भी सब बदमाशियाँ की हैं, कैदियों को सिगरेट, तम्बाकू, सुलफा, गुड़, सब कुछ लाकर देता हूँ, चिट्ठी भी अन्दर-बाहर पहुँचा देता हूँ, मशक्कत में भी गड़बड़कर देता हूँ। नब्ज देखकर कैदियों की हर तरह से मदद करता हूँ, लेकिन पैसा लेकर। बिना पैस गाँठे कभी किसी को एक बीड़ी तक नहीं दी। लेकिन उसकी आँखों में, आवाज़ में कुछ जादू था-मैं उसका सब काम बिना कुछ लिए कर देता था-और काम भी छोटा-मोटा नहीं, दफ़्तर से चिट्ठियाँ तक चुरा लाता था...

मेरी औरत जेल की मेट्रन है, औरत होने की वजह से वह मुझसे ज्यादा गड़बड़ करती रहती है। लेकिन वह जब मेरी करतूतें सुनती तब घर में रार मच जाती... “इतने बड़े काम, और एक पैसा भी नहीं! किसी दिन फँस जाओगे, तो दोनों को सड़कों पर भूखे भटकना पड़ेगा।” कभी-कभी दस-दस दिनों तक एक-दूसरे से बोलने की नौबत न आती... मैं वायदे करता आगे से कभी ऐसा न करूँगा। लेकिन फिर, जब वह मुझसे कुछ काम कहता, मैं भेड़-बकरी की तरह दुबककर चुपचाप कर देता। जब वह खुश होकर कहता, “मँगतू, तुम्हारा कर्जा कैसे चुकाऊँगा?” तो में निहाल हो जाता, मेरी बाछें खिल जातीं...

उस दिन फिर मेरी और मेरी घरवाली की लड़ाई हो रही थी। उसी वक़्त हेड वार्डर ने आकर बुलाया, “मेट्रन!” हम दोनों बाहर चले आये। मैंने पूछा, “क्या है?”

वह बोला, “एक औरत हवालात में आयी, ख़ून के मामले में। उसे बन्द करना है।”

मेट्रन जेल के भीतर चली गयी। मैंने हेड वार्डर से पूछा “कैसी औरत है?”

“मैंने देखी नहीं। कहते हैं, इन्हीं बमबाज़ों में से है। पिस्तौल से तीन आदमी मार दिये, और चार जख्मी किए, फिर पकड़ी गयी।”

“नाम क्या है?”

“सुसमा या सुषमा, ऐसा ही कुछ है। लेकिन पुलिसवाले कहते हैं कि उसका असली नाम कुछ और है।”

मुझे दिलचस्पी बहुत हुई, लेकिन ज़नाने वार्ड में तो जा नहीं सकता। मैंने सोचा, ‘वह’ वापस आएगी तो उससे पूछूँगा।

पर आठ बज गये, ‘वह’ नहीं आयी। मैं अन्दर अपनी ड्यूटी पर चला गया। मेरी ड्यूटी चक्कियों पर थी। सबसे पहली जो कोठरी थी, उसमें वह क़ैदी रहता था। सारे जेल में वही एक ‘पोलिटिकल’ कैदी था। वैसे तो और भी ‘पोलिटिकल’ बहुत थे, लेकिन वे पिकेटिंग में तीन-तीन, छःछः महीने की सज़ा लेकर आये थे, और दूसरी तरफ बैरकों में रहते थे। वही अकेला था जिसे दस साल की सजा हुई थी। मैंने सुना था, उसने कई ख़ून किये हैं मगर सुल्तानी गवाह के पलट जाने से सबूत नहीं मिला, इसलिए सजा दस ही साल रह गयी। कुछ हो, वह बड़ा शान्त आदमी था, और अपनी धुन में मस्त रहता था। एक बार मैंने उससे पूछा, “अरुण बाबू, ये सब चिट्ठियाँ-विट्ठियाँ जो तुम मँगवाते हो, सो किसलिए?” तो वह हँसकर बोला, “मेरे दस से पन्द्रह साल हो जाएँगे लेकिन एक बार सरकार की नाक में दम कर दूँगा।” मैंने बहुत पूछा, समझाकर कहो, पर वह हँसता ही रहा, और कोई जवाब नहीं दिया...

उसी की कोठरी के बाहर मैं बैठ गया,-वहीं मेरी ड्यूटी थी।

जेल की ड्योढ़ी में नौ बजे तो मैंने सोचा, अभी दो घंटे और बैठना पड़ेगा... इसी सोच से बढ़ता न जाने कहाँ-कहाँ के चक्कर लगा आया, यह नौकरी कैसी बुरी है, अठारह रुपये के लिए सोना तक हराम हो गया है! इससे अच्छा होता, कहीं स्टेशन पर कुलीगीरी करता - पर उसमें भी तो रात की गाड़ियाँ देखनी पड़तीं। कहीं ताँगा चलाया करता - दिन-भर की सैर होती और रात को मज़े से घर आकर सोता... इस नौकरी में ऊपर के आठ-दस मिलते हैं, उसमें भी मिल ही जाते, और इतनी चोरी, ऐसी लुक-छिप न करनी पड़ती। और न जाने ऐसी कितनी अनाप-शनाप बातें सोचता रहा...

एकाएक मैं चौंका। दूर पर कोई औरत गा रही थी-गा क्या रही थी एक बड़ी लम्बी तान लगा रही थी... उस आवाज़ में कितनी मिठास, कितनी कसक थी! मैंने ध्यान से सुना-आवाज़ जनाने वार्ड से आ रही थी-पर पहले तो वहाँ कोई गानेवाली नहीं थी... यह वही सुसमा या सुषमा है... पर उस गाने से मानो आकाश भर गया था-मैं कुछ सोच नहीं सका, चुपचाप सुनने लगा...

वेदी तेरी पर मा, हम क्या शीश नवाएँ!

तेरे चरणों पर मा, हम क्या फूल चढ़ाएँ?

लोह मुकुट है सिर पर

पूजा को ठहरें मा, या समर-क्षेत्र में जाएँ?

लय टूट गयी। मुझे ऐसा मालूम हुआ, मानो धरती एक बार बड़े ज़ोर से काँप कर रुक गयी हो। मैं चुप बैठा रहा, शायद इसी आशा में कि वह फिर गायेगी। और मुझे निराश भी नहीं होना पड़ा। गाना फिर शुरू हुआ, पर पहले और इसमें कितना फ़र्क था! पहला था मानो खुशी से भरा हुआ, उछलता हुआ चला जा रहा हो, और यह-दबे हुए दर्द से, जलन से भरा हुआ... मानो एक गरीब की आह लम्बी-हो-होकर एक तान हो गयी हो...

तन में मेरे चरणों की मैं धूमिल धूलि रमाये,

मन में तेरे सुख की आभा की मैं याद बसाये,

तुझे खोजती कहाँ-कहाँ पर भटकी मारी-मारी,

पर निष्ठुर तू पास न आया मैं रो-रोकर हारी!

मेरी जान तड़प गयी... मैं और सुन नहीं सका, कुछ बोलने को जी चाहा। मैंने पुकारकर कहा, “अरुण बाबू, सुनते हो?” लेकिन कोई जवाब न आया। मैंने समझा, अरुण बाबू सो गये होंगे, चुप होकर बैठा रहा... वह तान फिर आयी, पहले से भी अधिक ऊँची - उफ़्!

आज लगा जब मेरा पिंजरा उसी व्यथा से जलने,

तब तू आया उसी राख को पैरों तले कुचलने!

भूला-भूला रहता, मैं भी समझा लेती मन को-

क्यों बिखराया फिर तूने आ गरीबिनी के धन को?

आह ठंडी हो गयी। मैंने कहा, “अरुण बाबू!” कोई जवाब नहीं आया-आयी कहीं से धीरे-धीरे रोने की आवाज़! मैंने कोठरी के पास जाकर देखा, वह क़ैदी दोनों हाथों से सीखचे पकड़े, उन पर सिर रखे, सिसक-सिसक कर रो रहा था। अचम्भे में आकर कहा, “क्या बात है, अरुण बाबू?”

उसने मुँह फेर लिया। मैंने फिर कहा, “छिः, अरुण बाबू, इतने बड़े होकर रोते हो?”

वह चुप हो गया। पाँच-सात मिनट चुप बैठा रहा। फिर बोला, “मँगतू यह कौन गा रहा था?”

मैंने जवाब दिया, एक नयी औरत आयी है, हवालात में। सुना है उसने तीन पुलिसवालों को गोली से उड़ा दिया है। फिर मैंने जो कुछ उसके बारे में सुना था, सब बता दिया। दो-एक मिनट चुप रहकर वह बोला, “उसका नाम क्या है जानते हो?”

“सुसमा या सुषमा, कुछ ऐसा ही है।”

उसने धीरे से कहा “सुषमा!” और चुप हो गया।

मैंने पूछा, “अरुण बाबू, उसे जानते हो क्या?”

उसने तो कुछ देर जवाब नहीं दिया। फिर बोला, “वह मेरी बहिन है।”

मैंने कहा, “जभी तो!”

जभी तो क्या, इसका जवाब मुझे खुद भी नहीं मालूम था। इतना कह चुकने के बाद मेरी और कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ी। उसी ने फिर पूछा, “मँगतू, तुम मेट्रन को जानते हो?”

मैंने कुछ हँसकर कहा, “हाँ, क्यों?”

“हँसते क्यों हो?”

“कुछ नहीं, वह मेरी घरवाली ही है।”

“अच्छा! तो मेरा एक काम करोगे?”

“क्या?”

“एक चिट्ठी उसे पहुँचानी होगी।”

मैंने चौंककर कहा, “मेट्रन को?”

“नहीं, उस-सुषमा को।”

इसका जवाब देने के पहले मैं कुछ देर सोचता रहा। उससे जब कहूँगा, चिट्ठी पहुँचा दो, तो वह क्या कहेगी? आगे ही लड़ाई होते-होते बची थी। पर मैं इनकार भी नहीं कर सकता था। मैंने कहा, “काम तो जोख़िम का है।”

“मँगतू, यह काम तुम्हें जरूर करना पड़ेगा। मैं जन्म-भर तुम्हारा उपकार मानूँगा।”

“अच्छा, तुम लिखकर दे दो।”

उसने अँधेरे में ही चक्की के नीचे से एक काग़ज़ का टुकड़ा और एक पेंसिल निकाली और कुछ लिखकर मुझे दे दिया। मैंने चुपके से उससे काग़ज़ लेकर जेब में रखा और अपनी जगह जाकर बैठ गया। सोचता रहा कि कैसे काम करना होगा...

आखिर ग्यारह भी बज गये। दूसरा वार्डर आ गया, मैं उठकर घर पहुँचा। वह चटाई बिछाये बैठी थी, मुझे देखकर बोली, “खाना रखा है, जल्दी से खा लो।” मैंने चुपचाप खाना खाया। फिर जाकर बिस्तर पर बैठ गया और हुक्का पीने लगा। मेरी ओर देखती हुई बोली, “अब सोओगे भी या सारी रात गुड़गुड़ी बजाओगे?”

मैंने कुछ एक ओर सरककर कहा, “यहाँ आओ, तुमसे कुछ बात करनी है।”

वह चारपायी पर मेरे पास आकर बैठ गयी और बोली, “क्या?”

“वह जो नयी हवालातिन आयी है – सुषमा - वह गज़ब का गाती है।”

उसने भवें तानकर कहा, “तुमसे मतलब?”

मैंने देखा, बिस्मिल्ला ही गलत हुआ। बात बदलकर बोला, “यों ही। आज दो रुपये गाँठें हैं।” यह कहकर मैंने धीरे से जेब में रुपये खनका दिये।

देवी कुछ शान्त हुई। बोली, “कैसे?”

“उसी पोलिटिकल ने दिये हैं-एक चिट्ठी पहुँचाने के लिए। पर वह काम तुम्हें करना होगा।”

“क्या?”

“इसी सुषमा को एक चिट्ठी पहुँचानी है।” कहते हुए मैंने चिट्ठी जेब से निकाल ली।

उसने एक बार तीखी नज़र से मेरी ओर देखा, फिर चिट्ठी मेरे हाथ से लेकर पढ़ने लगी।

मैंने कहा, “यह क्या करती हो?” किन्तु टोकते-टोकते मुझे खुद भी पढ़ने की चाह हुई। मैंने झुककर पढ़ा, सिर्फ दो-तीन सतरें लिखी हुई थीं।

“बहिन सुषमा - तुम्हारा गायन सुनकर मुझे कुछ याद हो आया। तुम शारदा को जानती हो - और उस नाव की दुर्घटना को? - अरुण।”

बायीं ओर कोने में लिखा था, “वाहक विश्वस्त है।”

पत्र पढ़कर देवी का कोप कम हो गया। “पहुँचा दूँगी। पर समझ में तो कुछ आया नहीं!”

मैंने कहा, “समझकर क्या करोगी? जिनका काम है वे जानें। पर सवेरे ही पहुँचा देना। शायद जवाब भी-”

सबेरे उठते ही वह भीतर चली गयी, और थोड़ी देर बाद वापस आ गयी। मैंने पूछा, “क्यों?” उसने बिना जवाब दिये वही चिट्ठी लौटा दी। उसके एक कोने में लिखा था - “सुषमा शारदा को जानती है-और उस दुर्घटना को भी। विस्तार फिर।” मैंने काग़ज़ जेब में रख लिया। वह बोली, “दाम के हिसाब से काम तो कुछ भी नहीं था।” मैंने मन-ही-मन हँसकर कहा, “इससे हमें क्या मतलब? हम अपना काम पूरा करते हैं।” कहकर मैं फिर अपनी ड्यूटी पर चला। कोठरियाँ खोलकर कैदियों को बाहर कारखानों में पहुँचाना था।

सब कोठरियाँ खोलकर मैं उसकी कोठरी पर पहुँचा। दरवाज़ा खोलकर मैंने कहा, “अरुण बाबू, चलो कारखाने में।” कहते-कहते मैंने वह चिट्ठी उसके हाथ में दे दी। उसने कहा, “आज तबीयत ठीक नहीं, मैं काम पर नहीं जाऊँगा।”

“तो फिर डॉक्टर को रिपोर्ट करनी होगी।”

“कर दो।”

“वे अभी यहाँ आएँगे।” कहकर मैंने आँख से इशारा किया।

वह बोला, “हाँ-हाँ, आने दो।” और मुस्कराया। मुझे तसल्ली हो गयी कि उसने इशारा समझ लिया है। मैं कोठरी बन्द कर डॉक्टर को बुलाने चला गया।

जब मैं डॉक्टर के साथ वापस आया तब वह कुछ चबा रहा था। हमें देखकर जल्दी से निगल गया। मैंने मन-ही-मन कहा, “ठीक है, चिट्ठी तो गयी।”

डॉक्टर ने कैदी से कहा, “जबान दिखाओ।”

कैदी ने जबान निकाल दी। डॉक्टर उसे देखने को झुका और बहुत धीरे-धीरे बोला, “अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।”

कैदी ने मुस्कराकर उसी तरह धीरे-धीरे उत्तर दिया, “मेरे पास कुछ नहीं है। और होता भी तो...।”

मैं मुँह फेरकर हँसा। डॉक्टर बोला, ‘क़ैदी बीमार नहीं है, बहाना करता है। साहब को रिपोर्ट करो।” कहकर वह चला गया।

मैंने कहा, “अरुण बाबू, तुमने अच्छा नहीं किया।”

उसने हँसकर जवाब दिया, “मुझे अब किसी की परवाह नहीं है।”

आधे घंटे के बाद हेड-वार्डर और डिप्टी के साथ साहब आये। उन्हें देखकर कैदी उठा नहीं, वहीं बैठा रहा। साहब ने पूछा, “काम पर क्यों नहीं जाता?”

उसने शान्त भाव से उत्तर दिया, “तबीयत ठीक नहीं है।”

साहब ने कहा, “ट्वेंटी स्ट्राइप्स!” और चले गये। जाने पर मालूम हुआ कि बीस बेंत का हुक्म दे गये हैं।

हेड-वार्डर उसे उसी वक्त ले गये। मैं सुन्न हुआ अपनी ड्यूटी पर बैठा रहा...

आधे घंटे बाद वह वापस आ गया। शरीर पर सिर्फ एक लंगोट-वह भी लहू से भीग रहा था... हाथ में अपने कपड़े लिये, अकड़ता हुआ आया, और कोठरी में चला गया । हेड-वार्डर ने कहा, “बन्द कर दो।” वह हँसकर बोला, “काम पर तो नहीं गया।” हेड-वार्डर चला गया। मैं अपनी जगह जाकर बैठ गया, आज उससे बात करने की हिम्मत नहीं थी...

ग्यारह बजे ड्यूटी खत्म करके पहुँचा, तो देवी मुँह लटकाए बैठी थीं। मैंने पूछा, “आज उदास क्यों हो?” उसने मानो सुना ही नहीं। बोली, “आज जिसको बेंत लगे हैं, वही हैं अरुण बाबू?”

“हाँ।”

“बड़ा बाँका जवान है।”

मैंने डरते-डरते कहा, “मैं तो सदा से कहता हूँ।”

“लेकिन तुम मर्दों की अक्ल का क्या इतबार?”

मैं चुप रहा। थोड़ी देर बाद मैंने पूछा, ‘तुमने कहाँ देखा?”

“जब बेंत लगाने लाए थे, तब।”

“फिर?”

“साहब आये थे, इसलिए मैं सब औरतों के लिए परेड कराने को अपने वार्ड के बाहर जंगले में खड़ी थी। सामने ही टिकटी खड़ी थी, उसी ओर हम देख रहे थे। इसी वक्त वह लंगोट बाँधे आया और अकड़कर टिकटी पर खड़ा हो गया, वह लड़की सुषमा उसको देखकर काँप गयी, फिर मेरे पास आकर बोली, “यह क्या हो रहा है?”

मैंने कहा, “बेंत लगेंगे।” वह बोली, ‘बेंत!” फिर सींखचों को पकड़कर खड़ी हो गयी। उसका मुँह लाल हो आया, पर वह कुछ बोली नहीं।

“फिर?”

“उसने भी सुषमा को देखा। देखकर चौंका, मुस्कराया, फिर एकटक देखता ही रहा। जितनी देर बेंत लगते रहे, दोनों हिले तक नहीं-वैसे ही एक-दूसरे की ओर देखते रहे। फिर जब वे उसे उतारकर ले गये, तब वह घूमी, और “भइया!”

कहकर धरती पर बैठ गयी...”

“फिर?”

“फिर मैंने उसे हिलाया, तब मानो स्वप्न से जागकर उठी, चुपचाप मेरे साथ अन्दर चली आयी। मैंने ढाढ़स देने को कहा, “बहिन, ऐसा होता ही रहता है।”

उसने सिर झुकाए ही कहा, “इस वक़्त जाओ!” मैं चली आयी।”

मैं चुपचाप बैठ गया।

इसके बाद चार-पाँच दिन कुछ भी नहीं हुआ। मैं रोज रात को अपनी ड्यूटी पर जाता और पूरी करके चला आता... सुषमा का गाना रोज़ वहाँ सुनाई पड़ता था-

भूला-भूला रहता, मैं भी समझा लेती मन को-

क्यों बिखराया, फिर तूने आ गरीबिनी के धन को?

मैं चुपचाप सुनता रहता था औैर वह क़ैदी भी। उसके बाद वह कभी रोया नहीं। न मेरी ही हिम्मत पड़ी कि उससे बात करने जाऊँ...

पर पाँचवें दिन वह आयी और बोली - “दीखता है, दो रुपये में बहुत चिट्ठियाँ पहुँचानी पड़ेंगी; पर उस लड़की में कुछ अज़ब गुण हैं, ना करते नहीं बनता।”

मैंने मन-ही-मन कहा, “मुझ ही पर ऐंठती थी। प्रकट बोला, “क्यों-कोई ओर चिट्ठी है क्या?”

“हाँ, यह लो,” कहकर उसने पाँच-छः लिखे हुए काग़ज़ मेरे हाथ पर रख दिए।

मैंने कहा, “यह चिट्ठी नहीं, यह तो चिट्ठा है।”

वह कुछ नहीं बोली, “मैंने चिट्ठी जेब में रख ली।

कौतूहल बड़ी बुरी चीज़ है। जब से चिट्ठी मेरे हाथ में आयी, मैं यही सोचता रहा, कब वह जाए और मैं इसे पढ़ूँ। उसके सामने पढ़ते डर लगता था - अपनी मर्दानी शान भी तो रखनी थी! उस दिन मैंने उसे अरुण की चिट्ठी पढ़ने से टोका था - बाद में खुद पढ़ ली, सो दूसरी बात है, मना तो कर दिया था न...

आखिर वह अपनी ड्यूटी पर गयी। मैं चिट्ठी लेकर पढ़ने बैठा। पढ़ते वक़्त मुझे यह ख़याल न था कि मैं अरुण बाबू से धोखा कर रहा हूँ। उनका काम तो इतना ही था कि चिट्ठी पहुँचा दूँ, किसी ग़ैर के हाथ में न पड़े। मैं कोई ग़ैर थोड़े ही था? और फिर जब पढ़कर मैं उसे अपने मन में ही रखता था, किसी से कहता नहीं था, पढ़ने में क्या हर्ज़ था?

ख़ैर, मैंने बैठकर चिट्ठी तो पढ़ डाली। कुछ समझ आयी, कुछ नहीं, पर मैंने एक अक्षर भी न छोड़ा...

सोमवार

‘भइया,

‘उस दिन तुम्हारा पत्र पाकर मुझे कितना विस्मय हुआ, सो मैं ही जानती हूँ शायद तुम्हें मेरे गाने की आवाज़ सुनकर भी इतना विस्मय न हुआ हो। मैं नहीं जानती थी कि तुम इसी जेल में हो-पर तुम तो शायद यह भी नहीं जानते थे कि मैं जीवित हूँ या नहीं...

‘तुम्हें बहुत कौतूहल होगा, इसलिए पहले शारदा की ही कहानी कहूँगी। अपनी कहानी के लिए फिर भी बहुत समय मिलेगा। उस दिन, जब तुम और शारदा नाव में बैठकर झील के किनारे की गुफ़ा में सामान इत्यादि छिपाने के लिए घुसे थे, समुद्र में ज्वार आने से झील का पानी चढ़ गया था - गुफ़ा भर गयी थी... उसके बाद नाव उलट गयी और तुम बाहर आये तो देखा शारदा का कोई पता नहीं है... वह सब मैं यहाँ बैठ स्मृति-पटल पर देख सकती हूँ, उसे दुहारने में कोई लाभ नहीं... पर शारदा डूबी नहीं थी। उसी टूटी नाव के एक तख़्ते पर बहती हुई वहाँ से दस-बारह मील दूर किनारे लगी। दो दिन एक मछुए के झोंपड़े में रही, तीसरे दिन वहाँ से चलकर रात को अपने घर पहुँची। अभी घर के बाहर ही थी कि उसने घर से बहुत-से व्यक्तियों के रोने की आवाज़ सुनी। एका-एक किसी भयंकर आशंका से काँप गयी, कहीं अरुण का भी स्वर सुना, और शान्त होकर सोचने लगी - क्या यह रोना मेरे ही लिए तो नहीं है? कैसी विचित्र दशा थी वह! शारदा जीती-जागती बाहर खड़ी, और अन्दर लोग उसकी मृत्यु पर रो रहे थे!

‘तुम जानते ही हो, शारदा कैसी विचित्र लड़की थी। इस दशा में उसने जो निर्णय किया, उसमें शारदा का व्यक्तित्व साफ झलकता है। उसने सोचा, जो काम आज कर रही हूँ, उसमें किसी-न-किसी दिन घर छोड़ना पड़ेगा-शायद जेल जाना पड़े, शायद मृत्यु का भी सामना करना पड़े। इन सबके लिए वह कितना दुखमय दिन होगा! इससे तो कहीं अच्छा है, आज ही मैं गुम हो जाऊँ। ये तो मुझे मृत समझते ही हैं... अब मेरा व्यक्तित्व कुछ नहीं रहेगा। शारदा का भूत ही सब काम करेगा... लोग पकड़ेंगे तो किसे? वारंट निकालेंगे तो किसके नाम?

“वहाँ खड़ी शारदा ऐसी-ऐसी बहुत-सी बातें सोचती रही। एक बार उसकी इच्छा, हुई भीतर जाकर अरुण से मिलूँ, उसे सारी कथा समझा दूँ। पर फिर और लोग भी देख लेते... और शायद अरुण भी उसकी बात न मानता...

‘फिर, जैसा कि उसकी आदत है, उसने एका-एक निर्णय कर लिया। मुख मोड़कर वहीं से लौट गयी। शायद उसकी आँख में आँसू भी थे - मुझे याद नहीं है।

‘अब उसे एक और चिन्ता हुई। वह जिस क्षेत्र में काम करती थी, उसमें तो सब अरुण के परिचित थे! वहाँ काम करना और अरुण से छिपना असम्भव था! क्षण-भर के लिए शारदा असमंजस में पड़ गयी। फिर उसने कहा, ‘काम में हाथ डालकर छोड़ना शारदा का नियम नहीं है। अब जैसे हो, निभाना पड़ेगा।

‘इसी दृढ़ निश्चय से वह कलकत्ते गयी। वहाँ उसने एक छोटी-सी समिति स्थापित की और काम करने लगी... वह जो मोटर में से एक स्त्री और दो युवकों ने गोली चलाकर तीन-चार पुलिसवालों को घायल किया था, उसकी नेत्री शारदा ही थी। उसके बाद जो कलकत्ते के पास ही एक बम-दुर्घटना हुई थी, उसमें भी शारदा बाल-बाल बच निकली थी। फिर पटने में जो रात में बम गिरा था, वह भी उसी का काम था। पर उसके बाद न जाने कैसे, पुलिस को उसका पता लग गया, उसके वारण्ट निकल गये-दो-तीन विभिन्न नामों से। तब उसको मालूम हुआ कि उससे निर्णय करने के समय एक छोटी-सी भूल हो गयी थी। नाम का भूत होने पर भी उसका शरीर स्थूल था, और उसके काम भूत के नहीं, मानवों के थे। उसके बाद वह एकदम लापता हो गयी। किसी ने उसका नाम नहीं सुना, न उसका काम ही। बस यहीं तक है शारदा की कहानी।

‘अब अपनी कहानी कहूँ। तुम्हारे क्षेत्र में मैं बहुत देर तक काम करती रही। तुम्हारे पकड़े जाने से काम अस्त-व्यस्त हो गया था, इसलिए हमारा काम प्रायः संगठन का ही था। गाँव में छोटी-छोटी समितियाँ बनाकर उनके मुखियाओं को दीक्षा देना, स्कूलों में छोटे-छोटे क्लब और यूनियन बनाकर उन्हें किताबें पढ़ाना, बाहर सैन करने ले जाकर संगठन इत्यादि के सिद्धान्त समझाने, शहर के मुहल्लों में वालंटियर-दल स्थापित करके उन्हें चुपचाप फौजी शिक्षा देना, मोटर और टैक्सी ड्राइवरों की यूनियनें बनाकर उन्हें उनका महत्त्व समझाना, यही हमारा विशेष काम था। मैं स्वयं तो खुल्लम-खुल्ला कर नहीं सकती थी, लेकिन देवदत्त, जयन्त, विश्वनाथ, और उनके साथी बड़े उत्साह से मेरी सहायता करते रहे। (मैंने जो नाम लिखे हैं उनसे किनका आशय है, तुम समझ ही जाओगे।) जो मैं उन्हें बताती, वे उससे भी बढ़कर ही काम करते थे...

‘जब हमारा संगठन पर्याप्त हो गया, तब हमने कुछ और अस्त्र मँगाने का विचार किया। इसके लिए धन की आवश्यकता थी, और वही प्राप्त करने के लिए मैं यहाँ आयी थी। पर यहाँ दुर्भाग्य से तुम्हारे ‘चचा’ (किनसे अभिप्राय है समझ लेना) ने मुझे देखा, और न जाने उन्हें क्या सन्देह हो गया... मैं बहुत भागी, पर जाती कहाँ? स्टेशन के पास ही पुलिस से सामना हो गया। मेरे पास दो रिवाल्वर थे और 36 गोलियाँ। मैंने सोचा, आज पुराने अरमान निकाल लूँ। दो-दो बार मैंने रिवाल्वर खाली किए, तीसरी बार भरने का समय ही नहीं मिला... पर मुझे दुख नहीं है, मेरे वार खाली नहीं गये!

“मेरा क्या निर्णय होगा, यह मैं जानती हूँ। झूठी आशाओं से मैं अपने को बेवकूफ़ बनाना नहीं चाहती। तुम भी मेरे विषय में कोई आशा मत बनाए रखना - इससे कोई लाभ नहीं होता। उलके निराश होने पर व्यथा अधिक होती है।

‘बुधवार।’

‘यहाँ तक पत्र लिखकर मैं बहुत देर सोचती रही। कैसे-कैसे विचित्र विचार मन में आते हैं।

‘भइया, क्या यही अच्छा होता अगर मैं किसी और स्थान में पकड़ी जाती और वहीं मेरा निर्णय हो जाता! कोई जान भी न पाता कौन थी, कहाँ से आयी थी... और शारदा-वह भी वहीं झील में डूबी रहती उसे निकलकर फिर लुप्त होना पड़ता। हम दोनों ही इस वर्तमान अतीत में छिपी रहतीं। इस प्रकार दुबारा जीकर तुम्हारे आगे न मरना पड़ता! कैसी सुखद, कैसी शान्तिप्रद मृत्यु होती वह!

‘यहाँ आकर भी सम्भव था कि मैं चुपचाप अपना दण्ड भुगत लेती। किन्तु इस प्रकार, इसी जेल में तुम्हारे होते हुए बिना परिचय दिए मैं मर जाऊँ, इतनी शक्ति मुझमें नहीं है। परिचय के बाद दण्ड पाने पर तुम्हें कितना दुख होगा, इसका कुछ अनुमान कर सकती हूँ। और शायद हम अब फिर मिल भी नहीं सकेंगे। उस दिन भी एक विचित्र संयोग से ही, जिस अवस्था में मैंने तुम्हें देखा था, उसे सौभाग्य कहना सौभाग्य का उपहास करना है। मैं तुम्हें देख पायी थी। अब सुषमा अन्धकार में लुप्त जो जाएगी, और अरुण देख भी न पाएगा।

‘यह सब होते हुए भी मेरा मन कहता है कि तुम्हें मेरे परिचय देने के बाद मरने में जो दुख होगा, वह इनकी अपेक्षा कहीं शान्तिकर होगा कि मेरी मृत्यु के बाद तुम यह जान पाओ कि मैं इसी जेल में रहकर, दण्ड पाकर, मरकर भी अपने को तुमसे छिपाती रही...

‘भइया, मेरे सामने ही तुमने ममता और भावुकता को पीस डाला था और उनकी राख पर खड़े होकर एक महान व्रत धारण किया था... अब तुममें दृढ़ता है, धैर्य है, शान्ति है। तुम इस कहानी को सुनकर दुखित होओगे, पर विचलित नहीं, इसी विश्वास में मैंने पत्र लिखा है। अगर मुझे यह विश्वास न होता तो शायद मैं तुम्हारे पत्र का पहला उत्तर भी न देती...

‘पर माता-पिता में यह धैर्य कहाँ, यह दृढ़ता कहाँ? हमारे दुखों को देखकर उनकी ममता तो बढ़ती ही रहती है। उनके लिए शारदा को डूबी ही रहने देना, उसे जिलाकर फिर उनकी आँखों के आगे बुझाना मत! और सुषमा-सुषमा तो छाया थी, उसके लिए माता-पिता कहाँ, उसके लिए महत्त्व का भाव किसके हृदय में होगा? वह छाया थी-छाया की तरह किसी दिन छिप जाएगी... उसे के लिए कौन रोयेगा, अरुण?”

बस, सितार की टूटी हुई तार की तरह चिट्ठी यहाँ एकदम खत्म हो गयी। चिट्ठी पढ़ने से पहले मुझे जितना कौतूहल था, पढ़कर उससे कहीं बढ़ गया... यह शारदा कौन है, और सुषमा कौन? सुषमा छाया है - इसका क्या मतलब? मैं बैठा-बैठा इसी उलझन को सुलझाने में लगा था इसी बीच में मुझे ख्याल आया, इस चिट्ठी में तो बड़ी-बड़ी बातें लिखी है... बड़े पते की! अगर...

मेरे मन में जो ख्याल आया, उससे मेरे तन में बिजली ही दौड़ गयी। अगर मैं यह चिट्ठी पुलिस को दे दूँ... कितना इनाम...

फिर एका-एक उस क़ैदी का मुँह मेरे सामने आ गया - और उस लड़की का गाना मेरे कानों में गूँजने लगा-

आज लगा जब मेरा अन्तर उसी व्यथा से जलने

जब तू आया उसी राख को पैरों-तले कुचलने!

मैं बैठा हुआ था, खड़ा हो गया। खड़े होकर मैंने ज़ोर से कहा, “कमीने! पर जो शर्म का समुद्र एका-एक उमड़ आया था, वह उतरा नहीं। मैंने फिर कहा, “कमीने! दगाबाज़!” तब मन को कुछ शान्ति हुई।

मैं ड्यूटी पर तो चला गया, पर उस क़ैदी के सामने नहीं हुआ। मुझे अभी तक शर्म आ रही थी कि मैंने कमीनी बात सोची थी... वह चिट्ठी मेरी जेब में ही पड़ी रही। पर जब रात को ड्यूटी पर गया, तब मैंने देखा, वह रोज़ की तरह दरवाज़े पर सीखचे पकड़े बैठा है। मैंने धीरे से कहा, “अरुण बाबू, यह लो!” उसने चुपचाप चिट्ठी लेकर दूर की बिजली की धीमी रोशनी में धीरे-धीरे पढ़ी। फिर बिस्तर में रख ली।

थोड़ी देर में चुपचाप खड़ा रहा। फिर न जाने कैसे एका-एक पूछ बैठा, “बाबू, शारदा कौन है?”

पूछकर मैं सहम-सा गया। उसने मेरी ओर देखा और फिर धीरे से कहा मानो अपने-आपसे बातें कर रहा हो, “तुमने मेरी चिट्ठी पढ़ ली?”

मैंने कुछ नहीं कहा, कहता क्या?

उसने आप ही फिर कहा, “ख़ैर, अब छिपाने में क्या रखा है? शारदा मेरी बहिन है!”

मैंने डरते-डरते पूछा, “तो यह-सुषमा?”

उसने बड़ी अजीब निगाह से मेरी ओर देखा। मुझे मालूम हुआ मानो मेरा अन्दर बाहर सब एक ही नज़र में देख गया। फिर उसने बहुत ही धीरे से कहा, “शारदा और सुषमा-एक ही के दो नाम हैं...”

पहले मैं इस बात का पूरा मतलब ही नहीं समझा। फिर धीरे-धीरे जब समझ में आने लगा तब मैंने कहा, “अंय!” और उठकर बाहर चला गया। आते-आते जो आवाज़ आयी उससे मैंने जान लिया कि वह चिट्ठी फाड़-फाड़कर खा रहा है...

बाहर वह गा रही थी-

तुझे खोज़ती कहाँ-कहाँ पर भटकी मारी-मारी-

पर निष्ठुर, तू पास न आया, मैं रो-रोकर हारी!

मेरी ड्यूटी वहाँ से बदलकर एक महीने के लिए ड्योढ़ी में लग गयी। यहाँ से ज़नाना वार्ड बिलकुल पास था। सुषमा का गाना कितना साफ़ सुन पड़ता था! कभी-कभी जेल के क्लर्क भी शाम को आकर बैठ जाते, और वह गाना सुनकर चुपके से चले जाते थे।...

एक दिन मैंने उसको देखा भी... और अब भूलूँगा नहीं-ऐसा सूरत थी वह!

शाम हो रही थी। मैं बैठा सोच रहा था, कब शाम हो और मुझे छुट्टी मिले... इसी वक्त किसी ने कहा, “फाटक खोलो!” मैंने खोल दिया। आठ-दस पुलिस के सिपाही एक लड़की को लेकर अन्दर चले आये... मुझे किसी ने कहा नहीं, पर मैं देखते ही जान गया कि यही सुषमा है...

उसके दोनों हाथों में हथकड़ी लगी थी, पर कितनी शान से चलती थी वह! बाल खुले हुए थे, तन पर चौड़ी लाल किनारी वाली सफ़ेद धोती थी। बड़ी-बड़ी आँखें थीं-एक बार उसने मेरी ओर देखा - ऐसे देखा मानो मैं उसके आगे होऊँ ही न, सिर्फ खाली हवा ही हो! फिर भी मुझे मालूम हुआ कैसे उसने मेरी सब करतूतों - नयी-पुराना, अच्छी-बुरी, सभी-को खुली किताब की तरह पढ़ लिया हो। मुँह पर उसके हल्की-सी हँसी थी, ऐसी मानो कई सालों से वहाँ उसी तरह जमी हुई हो...

वे उसे अन्दर डिप्टी के दफ्तर में ले गये। मैं भी दबकर पीछे खड़ा हो गया। डिप्टी ने वारंट देखकर कहा, “हैं?” फिर कुछ रुककर पूछा, “अपील करोगी?”

उसने हँसकर कहा, “नहीं।”

डिप्टी ने दया से उसकी ओर देखा, फिर कहा, “ले जाओ!”

सिपाही चले गये। थोड़ी दूर बाद मेट्रन के आने पर मैंने मुँह फेर लिया।

मेट्रन ने उससे पूछा, “क्यों सुषमा, क्या हुआ?’

“कुछ नहीं, फाँसी की सजा दी गयी है।”

“हैं!”

मैंने चुपचाप अन्दर का दरवाज़ा खोल दिया... वे दोनों अन्दर चली गयीं... मैंने देखा, मेट्रन की आँखों में भी आँसू हैं...

उस दिन सुषमा का गाना नहीं सुन पड़ा। उसके दूसरे दिन भी नहीं। तो तीसरे दिन... तीसरे दिन उसने नया गाना गाया... गाना क्या था, एक चिनगारी थी...

एक जलता हुआ सन्देश था। न जाने किसको...

दीप बुझेगा पर दीपन की स्मृति को कहाँ बुझाओगे?

तारें वीणा की टूटेंगी-लय को कहाँ दबाओगे?

फूल कुचल दोगे तो भी सौरभ को कहाँ छिपाओगे?

मैं तो चली चली अब, तुम पर क्यों कर मुझे भुलाओगे?

तारागण के कम्पन में तुम मेरे आँसू देखोगे,

सलिला की कलकल-ध्वनि में तुम मेरा रोना लेखोगे।

पुष्पों में, परिमल समीर में, व्याप्त मुझी को पाओगे-

मैं तो चली चली पर प्रियवर! क्यों कर मुझे भुलाओगे?

इसके बाद वह रोज़ यही गाना गाने लगी... अपील की मियाद के सात दिन पूरे हो गये, उसने अपील नहीं की... फिर एक दिन सुना, मजिस्ट्रेट आकर तारीख दे गये हैं - चौदह दिन बाद फाँसी हो जाएगी...

मेरी ड्यूटी ड्योढ़ी पर थी - मैं अन्दर नहीं जा पाता था। मेट्रन जाती थी, पर सुषमा ‘कोठीबन्द’ थी, वहाँ वह भी नहीं जा पाती थी ...कई बार जी में होता था, जा कर अरुण को या उसे देख आऊँ, पर ड्योढ़ी की ड्यूटी का एक हफ़्ता-भर बाकी था। मैं जलता, छटपटाता, मन मसोसकर रह जाता...

आखिर मेरी बदली हो ही गयी। मैं धीरे-धीरे टहलने लगा। उसने मुझे देख लिया और पुकारा “मंगतू!”

मैं चुपचाप उसके पास चला आया। उसने पूछा, “कहो, कैसा हाल है?”

उसने फिर पूछा - “उदास क्यों हो?”

मैंने जवाब नहीं दिया।

“उस सुषमा की भी कोई खबर है?”

मैंने फिर कुछ नहीं कहा। “नहीं” कहता तो कैसे और बताता तो क्या? सिर्फ एक बार उसकी ओर देख दिया।

वह मेरे मन की बात समझ गया। बोला, “उसे जो सज़ा हो गयी है, सो मुझे पता है। मैं उसके गाने से समझ गया था। कोई और खबर है?”

मैंने धीरे-धीरे कहा, “हाँ। उसने अपील नहीं की, तारीख लग गयी है।”

“कब?”

“अगले मंगल को।”

“बस छः दिन?”

“हाँ।”

इसके बाद वह बहुत देर चुपचाप रहा। कुछ सोचता रहा। फिर एक लम्बी साँस लेकर बोला, “साहब कब आयेगा?”

सवाल पर मुझे कुछ अचरज-सा हुआ। मैंने कहा, “सोमवार को। क्यों?”

“यों ही। हाँ, एक चिट्ठी पहुँचाओगे?”

“वह कोठीबन्द है, काम मुश्किल है। पर देखो, शायद दाँव लग जाए।”

उसने एक छोटी-सी चिट्ठी दे दी। मैंने उसे जेब में डालते-डालते मन में कहा, “इसको नहीं पढ़ूँगा।”

मैं यह सोचता-सोचता घर पहुँचा कि कैसे कोठरी तक पहुँच पाऊँगा। वहाँ जाकर देखा, चूल्हा नहीं जला है-देवी गुस्से में भरी बैठी हैं। मैंने वर्दी उतारकर टाँगते हुए पूछा,”क्या बात है?”

मैंने डरते-डरते कहा, “अभी उस दिन तो दो रुपये दिये थे, वे क्या हुए?”

ऐसी जगह सीधी बात का सीधा जवाब नहीं मिलता। वह और भी तेज होकर बोली, ‘तुम तो चाहते हो, मैं डायन बनकर रहूँ, हाथ में एक-एक चूड़ी भी न हो! उस दिन आठ आने की चूड़ियाँ ले लीं, - उसका भी हिसाब देना होगा कि क्या हुई! वैसे ही क्यों नहीं कहते डूब मरूँ?”

जी में आया, कह दूँ, जा डूब मर, पर जी की बात जी में रख लेना मर्दों का काम ही है। मैं कुछ नहीं बोला। पर इससे वह शान्त नहीं हुई। बोली, “टुकुर-टुकुर देखते क्या हो? कुछ खाने की सलाह है कि नहीं?”

मैंने कहा, “मेरी जेब में शायद डेढ़ पैसा है - चाहो तो ले लो।”

वह आँखें छोटी करके मेरी ओर देखने लगी। फिर बोली, “अरुण बाबू ने जो दो रुपये दिये थे, वे क्या हुए?”

अब मैं समझा, मामला क्या है। पर एका-एक कोई बहाना न सूझा। फिर मैंने हिचकिचाकर कहा, “हेड वार्डर ने उधार माँगे थे, मैं इनकार नहीं कर सका।

उसने कुछ जवाब नहीं दिया, पर साफ़ मालूम होता था कि उसे विश्वास नहीं हुआ।

ख़ैर, मैं पानी का लोटा लेकर बाहर मुँह-हाथ धोने लगा। वापस आकर देखा, मेरे कोट की तलाशी हो चुकी है, और वह हाथ में एक काग़ज़ का टुकड़ा लिये खड़ी है।

मैं उस पर कम ही ग़ुस्सा करता हूँ, पर इतनी बेइतबारी मैं नहीं सह सका। मैंने पूछा, “यह क्या कर रही हो तुम?”

औरत की जात अजीब होती है, गलती अपनी और गुस्सा दूसरों पर! बोली, “क्यों जी, यह क्या है?”

मैंने काग़ज़ उसके हाथ से छीनकर पढ़ा - वह चिट्ठी थी।

‘सुषमा!

‘दो दिन के मौन के बाद जब मैंने तुम्हें गाते सुना, तभी मैंने जान लिया था कि निर्णय हो गया है... आज पक्का पता मिल गया...

‘जिस अवस्था में तुम हो, उसमें मैं तुम्हें क्या लिखूँ? क्या सान्त्वना दूँ? हाँ, एक बार, तुम्हें देखने का प्रयत्न करूँगा - शायद सफल होऊँ।

‘याद आता है, बहुत दिन हुए, एक बार तुमसे होड़ की थी कि किसका काम पहले समाप्त होगा। उस समय मुझे पूरी आशा थी कि मेरी जीत होगी। आज मैं सोच रहा हूँ, कौन जीतेगा?

-अरुण।’

पढ़ तो मैं गया, फिर मुझे शर्म आयी और उस पर गुस्सा। पर मैं चिट्ठी लेकर बाहर चला गया - वह न जाने क्या बड़बड़ाती रही।

शाम को मैं भूखा ही ड्यूटी से कुछ पहले अन्दर चला गया। अभी लैम्प नहीं जले थे, पर सूरज डूब गया था। मैंने कोठियों के दो चक्कर लगाये, फिर जल्दी से उसकी कोठरी पर जाकर काग़ज़ दे दिया। उसने लेटे ही कहा, “जवाब ले जाना।” मैंने कहा, “लिखो।” और हट गया। कोठियों के फिर तीन-चार चक्कर लगाये और आ गया। उसने एक काग़ज़ मेरे हाथ में दिया और बोली, “जबानी भी कह देना, होड़ के दो दिन बाकी हैं।” मैंने कहा, “अच्छा, नमस्कार!” उसने कुछ अचरज से, पर हँसकर, जवाब दिया, “नमस्कार!” मैं लपककर अपनी ड्यूटी पर चला।

पर काम नहीं बना। कोठियों के वार्डर ने पूछा, “कौन है?” मैं घबरा गया। वह चिट्ठी मेरे हाथ में थी - मैंने जल्दी से मुँह में डाल ली। उसने फिर पूछा, “कौन है?” मैंने कहा, “मैं हूँ मंगतराम बार्डर। यों हीं ज़रा घूमने आ गया था - अब ड्यूटी पर जा रहा हूँ।”

“अच्छा! मैं समझा, कोई क़ैदी है।”

मैंने ड्यूटी पर पहुँचकर ही साँस लिया। मैं वहीं बैठा रहा। जब खूब रात हो गयी, तब अरुण बाबू ने बुलाया, “मंगतू!” मैं अन्दर चला गया। उसने पूछा, “कहो, क्या हुआ?” मैंने कहा, “पहुँचा तो आया।” उसने खुश होकर कहा, “अच्छा।”

मैं वहीं खड़ा रहा, गया नहीं। उसने पूछा, “कुछ और बात है क्या?”

“मैंने कहा, “हाँ।”

“क्या?”

“जो जवाब लाया था-”

“जवाब भी ले आये क्या?”

“सुनो तो। जो जवाब लाया था, वह-”

“उसका क्या हुआ?”

“जब मैं आने लगा तब वार्डन ने देखकर शोर मचा दिया।”

“फिर?”

“फिर मैं वहा काग़ज़ खा गया।”

वह एक फीकी-सी हँसी हँसा। फिर बोली, “मैं तुम्हें कितनी बार खतरे में डाल चुका हूँ। मंगतू!”

मैंने कहा, “वह कोई बात नहीं है, अरुण बाबू। हाँ, एक ज़बानी सन्देशा है।”

“क्या?”

“कहने को कहा था कि अभी होड़ के दो दिन बाकी हैं।”

“अच्छा, जाओ।”

सोमवार को साहब आये, तो उनकी और अरुण बाबू की बहुत देर तक अंग्रेजी में बातें हुई। मैं समझा तो कुछ नहीं, हाँ मालूम होता था कि अरुण बाबू कुछ समझा रहा है और साहब पहले तो आनाकानी करता रहा, फिर अचम्भे में आया, फिर बोला, “आलराइट!” और डिप्टी को अंग्रेजी में कुछ समझाकर चला गया।

जब वे चले गये तो मैंने पूछा, “क्या बात हुई?”

वह बोला, “फाँसी देखने की इज़ाजत मिल गयी।”

रात को कुछ बादल घिर आये। बरसाती नहीं, वैसे ही छोटे-छोटे सफेद टुकड़े... मैं घर में गया और चुपचाप चारपायी पर लेट गया। देवी का कोप अभी खत्म नहीं हुआ था। मुझे इस तरह मुख लेटा देख शायद वह कुछ पिघली। पर रुखाई से बोली, “क्या है?” मैंने जवाब दिया, “कल सुषमा को-” आगे नहीं बोल सका। वह चौंककर बोली, “हैं?” फिर मेरे पास आकर बैठ गयी। बहुत देर तक हम चुप बैठ रहे। मैंने देखा, वह चुपचाप रो रही थी! शायद मेरे भी आँसू आ गये थे।...

मुझे रात-भर नींद नहीं आयी। सुबह पाँच बजे, तो मैं वर्दी पहनकर अन्दर चला गया। थोड़ी देर में साहब, मजिस्ट्रेट, डिप्टी, चीफ़ वार्डर वग़ैरह आ गये और चुपचाप कोठियों की ओर चले। मैं भी पीछे-पीछे चला। उसकी कोठी पर पहुँचे तो वह उठकर बैठी हुई धीरे-धीरे कुछ गा रही थी। साहब ने पूछा, “कुछ वसीयतनामा लिखाओगी?” वह जोर से हँसी और बोली, “मेरे पास दो रिवाल्वर ही थे, वे सरकार ने ज़ब्त कर लिए। अब वसीयत के लिए कुछ नहीं है।”

कोठी खुली, वह बाहर चली आयी। चीफ़ वार्डन ने उसके हाथ पीठ के पीछे बाँध दिये। वह बराबर हँसती जा रही थी!

डिप्टी ने इशारे से मुझे बुलाया। बोला, “उस पोलिटिकल को ले आओ - हथकड़ी लगा करके लाना। समझे?”

मैंने सलाम किया ओर चाबी और हथकड़ी लेकर उधर चल पड़ा।

दूर से मुझे फिर उसके गाने की आवाज़ आयी-

‘दीप बुझेगा पर दीपन की स्मृति को कहाँ बुझाओगे?’

मैंने अपनी जगह पहुँचकर कहा - “अरुण बाबू! जल्दी चलो!”

वह दरवाज़े के आगे खड़ा आकाश की ओर देख रहा था। मैंने दरवाज़ा खोला तो बाहर आ गया। मैंने कहा, “बाबू, हथकड़ी लगाने का हुक्म हुआ है।” उसने चुपचाप दोनों हाथ बढ़ा दिये।

हम जल्दी-जल्दी फाँसी-घर की ओर चले। वहाँ पहुँचकर देखा, सब लोग एक कोने में खड़े हैं और सुषमा तख्ते पर खड़ी है। हम भी एक कोने में खड़े हो गये। सुषमा ने अरुण को देखा, उसके मुँह पर से ज़रा-सी देर के लिए मुस्कराहट चली गयी-बिजली की तरह दोनों की आँखों ने कुछ कहा, “फिर सुषमा पहले की तरह मुस्कराहट धीरे-धीरे गुनगुनाने लगी-

‘दीप बुझेगा पर दीपन की स्मृति को कहाँ बुझाओगे?”

अरुण का शरीर तन गया, उसने मुट्ठियाँ बड़ी जोर से बन्द कर लीं। फिर न बोला, न हिला-पत्थर की तरह खड़ा रहा...

जल्लाद सुषमा के मुँह पर टोपा पहनाने लगा। वह बोली, “यह क्या है? मैं मुँह छिपाकर मरने नहीं आयी हूँ।”

जल्लाद साहब की ओर देखने लगा। साहब ने इशारे से कहा, “मत लगाओ।”

जल्लाद ने रस्सी उठाकर गले में लगा दी और अलग हट कर खड़ा हो गया। सुषमा ने अरुण की ओर देखकर मुँह खोला, मानो कुछ कहने को हो, फिर रुक गयी और मुस्करा दी।

जल्लाद ने साहब की ओर देखा। साहब ने धीरे से एक उँगली उठाकर फिर नीचे झुका दी...

तख्ता हट गया, रस्सी तन गयी...

साहब वग़ैरह जल्दी से वहाँ से हट गये, मानो शर्म से भाग गये हों...

अरुण घुटने टेक कर बैठ गया... आँखें बन्द कर ली... मैं चुपचाप हथकड़ी पकड़े खड़ा रहा।...

आठ-दस मिनट बाद वह उठा, और सीढ़ियाँ उतर कर गड्ढे के अन्दर चला गया...

जल्लाद ने सुषमा का शरीर उतार कर नीचे लिटा दिया था, हाथ खोल दिए थे। उनके अंग नीले होने लगे थे, पर अभी अकड़े नहीं थे...

अरुण झुककर बहुत देर तक उसके मुँह की ओर देखता रहा। फिर बहुत धीमी, काँपती आवाज में बोला, “शारदा, तुम्हारी जीत हुई...”

इसी वक़्त डॉक्टर आया। अरुण को देखकर कुछ झेंप-सा गया, फिर चुपके से सुषमा की नब्ज़ देखने लगा। सिर हिलाकर बोला, “हूँ। इनको दफ़्तर में ले जाओ - पब्लिक लेने आयी है।” यह कहकर चला गया।

अरुण भी मानो सपने में ही खड़ा हो गया। बोला - “शारदा, तुम तो डूब गयी थीं, अब तुम्हारी छाया ही को लेने आयी है पब्लिक!”

उसने हाथ उठाकर एक अंगड़ाई-सी ली, फिर मानो सपने से जाग पड़ा... उसका चेहरा देखते-देखते बदल गया... आँखें बुझ-सी गयीं...

भर्राई हुई आवाज़ में वह बोला, “पब्लिक!”

फिर एक बड़ी डरावनी हँसी हँसा... और बोला, “चलो!”

मैंने ले जाकर उसे कोठरी में बन्द कर दिया...

इसके बाद मुझे उससे बोलने में कुछ डरा-सा लगने लगा। मैं अपनी जगह बैठकर ड्यूटी देता और चला जाता...

एक हफ़्ते बाद एक दिन सवेरे ही चीफ़ वार्डर आया और उससे बोला, “डिप्टी साहब का हुक्म है कि आपको कारखाने में काम पर जाना होगा।”

“काम पर जाए डिप्टी, और भाड़ में जाओ तुम! मैं कोई काम-वाम नहीं करूँगा।”

चीफ़ वार्डर चला गया। थोड़ी देर में डिप्टी आया और दरवाज़ा खुलवा कर अन्दर गया। बोला, “काम पर क्यों नहीं जाते?”

“मेरी मर्ज़ी! मैं कुली नहीं हूँ।”

“तुम क़ैदी हो क़ैदी! कोई बड़े लार्ड नहीं हो! उस दिन के बेंत भूल गये?”

“नहीं, अच्छी तरह याद हैं। आपको भी बहुत दिन नहीं भूलेंगे!”

“मैं तुम्हारी सारी अकड़ निकाल दूँगा!”

“क्या कर लेंगे? बेंत लगवायेंगे? वह मैं खा चुका हूँ... बेड़ियाँ लगवाएँगे, वे भी छः महीने पहनी हैं... फाँसी दे लीजिएगा? वह मैं देख आयाँ हूँ - उसमें बड़ा मज़ा है। ...बड़ा!”

डिप्टी ने उसका टिकट उठाया और उस पर कुछ लिख चला गया...

मैंने ताला बन्द करते हुए, “अरुण बाबू, यह क्या है?”

उसने हँसकर कहा, “कुछ नहीं, माफी बन्द और जब तक काम न करूँ कोठीबन्द!”

उस दिन से वह कोठरी से बाहर नहीं निकला। कभी-कभी जब मैं उसे समझाता तो वह हँसकर कहता, “मंगतू, अब तो यहीं कटेगी। काम करने की तो मैंने क़सम खा ली!”

अब मैं उससे कुछ-कुछ डरने लगा हूँ। जिस अरुण को मैं पहले जानता था - उसमें और इसमें कितना फ़र्क है... मैं उसकी कोठरी से कुछ दूर ही बैठता हूँ और ड्यूटी पूरी करके चला जाता हूँ... कभी-कभी उसे देख-भर लेता हूँ...

कभी-कभी गाता है। जब मैं उसे उस कोठरी के अन्धेरे में बैठे धीरे-धीरे गाते सुनता हूँ...

भूला-भूला रहता, मैं भी समझा लेती मन को-

क्यों बिखराया फिर तूने आ गरीबिनी के धन को?

तब मेरे दिल में एक धक्का लगता है, मैं सोचने लग जाता हूँ, कितनी कमीनी यह नौकरी है जिसमें मैं फँसा हूँ... और कैसे अज़ीब आदमी हैं ये पोलिटिकल क़ैदी...

पर सबसे तरसानेवाली उसकी शक्ल होती है जब बड़े सवेरे पौ फटने के वक्त वह आकर अपनी कोठरी के दरवाज़े के सीखचे पकड़ कर बैठ जाता है और भूरे आकाश में फटे हुए दूध की तरह छोटे-छोटे सफ़ेद बादल के टुकड़ों की ओर देखता हुआ गाने लगता है-

आसन तलेर माटिर पड़ि लूटिए रोबो,

तोमार चरण धूलस्य धूल धूसर होबो!

उस वक्त उसकी आवाज़ में ऐसी दबी हुई-सी आग होती है कि मेरा कलेजा दहक उठता है? मैं वहाँ से उठकर दूर जा बैठता हूँ कि वह आवाज़ मेरे कानों तक न पहुँचे...

पर उसके शब्दों से, उन गानों से, उस डरावनी हँसी से, उस टिकटी से; उस फाँसी के नज़ारे से, और उस अजीब औरत की हँसती आँखों से हटकर जाने को जगह नहीं है... शारदा की छाया को तो पब्लिक ने फूँक दिया, पर यह सुषमा की छाया जो हर वक़्त मेरे पास रहती है, इससे छुटकारा कहाँ है?...

(दिल्ली जेल, अक्टूबर 1931)
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Wednesday, 9 November 2016

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जागो फिर एक बार | हिंदी कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Jaago Fir Ek Baar | Hindi Poem | Sooryakant Tripaathi Nirala

जागो फिर एक बार !

जागो फिर एक बार!
                 प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
                 अरुण-पंख तरुण-किरण
                  खड़ी खोलती है द्वार-
जागो फिर एक बार!
                  आँखे अलियों-सी
                  किस मधु की गलियों में फँसी,
                  बन्द कर पाँखें
                  पी रही हैं मधु मौन
                  अथवा सोई कमल-कोरकों में?-
                  बन्द हो रहा गुंजार-
जागो फिर एक बार!
                  अस्ताचल चले रवि,
                  शशि-छवि विभावरी में
                  चित्रित हुई है देख
                  यामिनीगन्धा जगी,
                  एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय,
                  आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी
                  घेर रहा चन्द्र को चाव से
                  शिशिर-भार-व्याकुल कुल
                  खुले फूल झुके हुए,
                  आया कलियों में मधुर
                   मद-उर-यौवन उभार-
जागो फिर एक बार!
                   पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे,
                   सेज पर विरह-विदग्धा वधू
                   याद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन की
                   मूँद रही पलकें चारु
                   नयन जल ढल गये,
                   लघुतर कर व्यथा-भार
                   जागो फिर एक बार!
                   सहृदय समीर जैसे
                   पोंछों प्रिय, नयन-नीर
                   शयन-शिथिल बाहें
                   भर स्वप्निल आवेश में,
                   आतुर उर वसन-मुक्त कर दो,
                   सब सुप्ति सुखोन्माद हो,
                    छूट-छूट अलस
                    फैल जाने दो पीठ पर
                    कल्पना से कोमल
                    ऋतु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ।
                    तन-मन थक जायें,
                    मृदु सरभि-सी समीर में
                    बुद्धि बुद्धि में हो लीन
                    मन में मन, जी जी में,
                    एक अनुभव बहता रहे
                    उभय आत्माओं मे,
                    कब से मैं रही पुकार
जागो फिर एक बार!
                    उगे अरुणाचल में रवि
                    आई भारती-रति कवि-कंठ में,
                    क्षण-क्षण में परिवर्तित
                    होते रहे प्रकृति-पट,
                    गया दिन, आई रात,
                    गयी रात, खुला दिन
                    ऐसे ही संसार के बीते दिन, पक्ष, मास,
                    वर्ष कितने ही हजार-
जागो फिर एक बार!
                                                          -सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 
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Tuesday, 1 November 2016

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हमारे बारे में

जीवन उद्यम- एक हिंदी साहित्य आधारित ब्लॉग है जो जीवन को साहित्य से जोड़ता है | |

यहाँ पढ़िए उत्कृष्ट, शिक्षाप्रद तथा प्रेरणादायक हिंदी साहित्य | जीवन उद्यम का विश्वास है कि इस आयाम (ब्लॉग) पर लिखित साहित्य सामग्री पाठकगण के जीवन में नई चेतना का विकाश करेगी | कहानियां उसकी गुरु बनेंगी, कवितायेँ उसकी मित्र तथा लेख उसके पथ-प्रदर्शक |

क्योंकि महात्मा गाँधी कहतें हैं "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है" इसलिए यह हमारा छोटा सा प्रयास हिंदी भाषा की सेवा में निहित है | आयें हम सब मिलकर इस प्रयास को सफल बनायें |
हमारे संपर्क सूत्र है :  bahaduranjeet366@gmail.com
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Wednesday, 26 October 2016

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इन्सान के दुशमन वैज्ञानिक | हिंदी लेख | राजेन्द्र त्यागी | Insaan Ke Dushman | Hindi Essay| Ranjendra Tyagi

   'इन्सान के दुश्मन वैज्ञानिक' राजेंद्र त्यागी जी द्वारा रचित एक व्यंगात्मक लेख है जिसमे लेखक ने वैज्ञानिकों के जीवों के लुप्त होने की चिंता को अधिक महत्व न देकर मनुष्य में लुप्त हो रही मनुष्यता का ज़िक्र किया | लेखक ने अपनी चिंता इस बात पर भी व्यक्त की है की यदि दो इन्सान और जानवर के जींस मिलाकर ने जीव की उत्पत्ति की गई तो इसके क्या संभवित परिणाम क्या होंगे |



       जीव वैज्ञानिक अब मानव व जानवरों के जींस मिलाकर नया जीव उत्पन्न करने की  तैयारी में हैं | इससे पूर्व चूहे को सुपर चूहा बनाया जा चूका है | सुना हैं, गिद्धों की पैदावार बढ़ाने में भी जीव विज्ञानी काफ़ी सफलता प्राप्त कर चुके हैं | लगता है कि जीव विज्ञानी इंसान विरोधी हो गए हैं | कारण स्पष्ट  है, बन्दर-कुत्ते, चूहे-बिल्ली, भेड़-बकरी पता नहीं किस-किस जानवर के भविष्य को लेकर जीव विज्ञानी चिंतित हैं, किन्तु इंसान से गायब इंसानियत उनकी चिंता का विषय नहीं है | इंसान को सुपर इंसान बनाने की बात उनके भेजे में नहीं आ रही है | इंसानों की संख्या निरंतर घट रही है, यह उनके लिए चिंता का विषय नहीं है | इसके विपरीत जनसंख्या-नियंत्रण पर अवश्य जोर दे रहे हैं | वे नहीं जानते हैं की जिनकी बढती पैदावार तुम्हारी चिंता का विषय है, उनमें इंसान हैं, कितने | उन्हें तो इंसान की शक्ल-ओ-सूरत के सभी जीव इंसान नजर आते हैं | चूहे-बिल्ली अथवा गिद्ध हमारे लिए ज्यादा चिंता का विषय नहीं है | हमारी चिंता का विषय तो व नया जीव है, जिसे मानव व जानवर के संयुक्त जीन्स  से बनाने की तयारी चल रही है | इस विषय को लेकर हमारी चिंता द्विआयामी है | वैज्ञानिकों का इरादा यदि जानवर के जींस में मानव जींस आरोपित कर उत्तम किस्म का जानवर बनाना है, तो कल्पना करो कि नये किस्म के उस जीव का चरित्र कैसा होगा ? अभी इस विषय में कल्पना ही की जा सकती है, क्योंकि अभी इस बारे में विज्ञानी भी कसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं |
     हमारा मानना है कि वह नया जानवर इस सृष्टि का सर्वाधिक खतरनाक जानवर होगा | कारण स्पष्ट है, जानवर भले ही किसी भी रूप में हो, इंसान उन्हें खतरनाक ही मानकर चलता है |एक-दो दुधारुवों को छोड़कर, मगर डरता उनसे भी है | पुन: कल्पना कीजिए, जब जानवर के चरित्र में मानवीय सद्गुण व्याप्त हो जाएँगे, तो स्थिति क्या होगी ? जानवर भी बलात्कारी हो जाएँगे | भ्रष्टाचारी हो जाएँगे, असत्य भाषी हो जाएँगे, लैग-पुलर हो जायेंगे | अभी तक कहा जाता है, 'आदमी जानवर से ज्यादा खतरनाक है!' तब क्या स्थिति इसके विपरीत नहीं हो जाएगी | जानवर आदमी से ज़्यादा खतरनाक नहीं हो जाएगा?
     अब जरा दूसरी संभावना पर गौर कीजिये | इस नए शोध से यदि आदमी में जानवर के गुण आ गए, तो वह सुपर मैन होगा या नरपिशाच? नरपिशाच की कल्पना मात्र से ही क्या पसीने नहीं आने लगते हैं? स्पष्ट है कि वैज्ञानिक यदि नरपिशाच निर्मित करने पर विचार कर रहे हैं, तो जो थोड़े बहुत इंसान शेष हैं भी, तब भी वे स्वर्ग की ओर पलायन कर जाएँगे | और इंसान ढूंढे नहीं मिलेगा | जानवर तो जानवर है ही, इंसान के भेष में भी जानवरों  की तादाद बढ़ जाएगी | अब आप ही बताइए, क्या हमारी चिंता जायज़ नहीं है |
     जीव विज्ञानी गिद्धों की घटती पैदावार को लेकर चिंतित हैं | ऊर्जा गिद्धों की पैदावार बढाने में लगा रहे हैं | सुना है, सरकार भी इस विषय को लाकर काफी चिंतित है | सरकार की चिंता को लेकर हमें कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि सजातीय के प्रति चिंतित होना जीवों का स्वभाव है | सरकार नामक गठबंधन में सामिल तत्वों कुछ हों या न हों, किन्तु उनके जीव होने से इंकार नहीं किया जा सकता |
     वैसे, भी सरकारों का सरोकार मुख्य रूप में चिंता और चिंतन से ही है, अत: गिद्धों के प्रति उनका मोह आश्चर्य का विषय नहीं है | आश्चर्य हमें वैज्ञानिकों की सोच को लेकर है, क्योंकि हम उन्हें बुद्धूजीवी नहीं बुद्धिजीवी मानते हैं और गिद्धों का विजातीय मानते हैं | हमारा मानना है कि कम से कम वैज्ञानिकों का मुख्य उद्देश्य तो मानव सेवा ही है | फिर न जाने क्यों, उन्हें अचानक गिद्ध मोह हो गया? क्यों उनकी पैदावार बढ़ाने में अभियान चला रहे हैं? पता नहीं क्यों अपनी ऊर्जा उनका उत्पादन बढ़ाने में ज़ाया करने पर वे उतारू हैं? इसे सोहबत का असर भी कहा जा सकता है और परिस्थतिजन्य अन्य कारण भी |
     अभियान केवल गिद्धों की पैदावार को लेकर ही चलाया जाता तो भी हमारी चिंता का वजन ज्यादा न होता , हमारे लिए चिंता सरकारी स्तर की होती | चिंता का वज़न वजनी होने का कारण इंसानों की अपेक्षा गिद्दों को कहीं अधिक महत्व देना है |
     गिद्धों की पैदावार घट रही है, यह सुनकर भी आश्चर्य होता है और इंसानियत विरोधी ऐसे लोगों  की बुद्धि पर तरस भी आता है | वास्तविकता तो यह है कि पैदावार गिद्धों की नहीं, इंसानों की घट रही है | गिद्ध एक ढूंढो, हज़ार मिलते हैं और इंसानों हज़ार के बीच एक भी मुश्किल से!
     हम इतना अवश्य स्वीकारते हैं कि मरे जानवरों को आहार बनाने वाले गिद्धनुमा विशाल परिंदे आसमान में परिक्रमा करते अब नहीं दिखाई पड़ते, लेकिन उनकी न तो उनकी संख्या में ही कमी आई और न ही उनका पैदवार घटी है, केवल स्वरुप बदला है |
     परिवर्तित स्वरुप को पहचानो और अपनी दृष्टि बदलो, चारों ओर गिद्ध ही गिद्ध नज़र आएँगे | उनके स्वरुप में ही नहीं, स्वभाव में भी परिवर्तन आया है | परिंदे गिद्ध मृत देह का भक्षण करते थे, परिवर्तित गिद्ध जीवित को ही अपना आहार बना रहे हैं |
     परिंदे पर्यावरण के लिए लाभदायक होते होंगे, हम इनकार नहीं करते, मगर विचारणीय प्रश्न यह भी है कि परिवर्तित गिद्ध समाज के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं |
     खैर जो भी है, खोज गिद्धों की नहीं, जटायु की होंनी चाहिए और उन्हीं  की घटती पैदावार चिंता का विषय होना चाहिए | लुप्त होते गिद्धों के लिए, सरकार व वैज्ञानिकों को लुप्त होती इंसानियत की चिंता होनी चाहिए | इंसानियत वाले सुपर इन्सान बनाने के प्रयास करने चाहिए |

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Monday, 3 October 2016

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राष्ट्रीयता | हिंदी लेख |गणेशशंकर विद्यार्थी | Rashtreeyta | Hindi Essay | Ganesh Shankar Vidyarthi |

राष्ट्रीयता 

भारत में हम राष्ट्रीयता की पुकार सुन चुके हैं | हमें भारत के उच्च और उज्वल भविष्य का विश्वास है | हमें विश्वास है कि हमारी बाढ़ किसी के रोके नहीं रुक सकती |

देश में कहीं-कहीं राष्ट्रीयता के भाव को समझने में गहरी और भद्दी भूल की जा रही है | आये दिन हम इस भूल के अनेकों प्रमाण पाते हैं | यदि इस भाव के अर्थ भली-भाँती समझ लिए गए होते तो इस विषय में बहुत-सी अनर्गल और अस्पष्ट बातें सुनने में न आतीं | राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है | राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है | राष्ट्रीयता सामजिक बन्धनों का घेरा नहीं है | राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है | इसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं | प्राकृतिक विशेषता और भिन्नता देश को संसार से अलग और स्पष्ट करती है और उसके निवासियों को एक विशेष बंधन-किसी सादृश्य के बंधन-से बंधती है | राष्ट्र पराधीनता के पालने में नहीं पलता | स्वाधीन देश ही राष्ट्रों की भूमि है, क्योंकि पुच्छ-विहीन पशु हों तो हों, परन्तु अपना शासन अपने हाथों में न रखने वाले राष्ट्र नहीं होते | राष्ट्रीयता का भाव मानव-उन्नति की एक सीढ़ी है | उसका उदय नितांत स्वाभाविक रीति से हुआ | यूरोप के देशों में यह सबसे पहले जन्मा |
     मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊँचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्राण तक दे सके | समय की गति के साथ आदर्शों में परिवर्तन हुए | धर्म के आदर्श के लिए लोगों ने जान दी और तन कटाया | परन्तु संसार के भिन्न-भिन्न धर्मों के संघर्षण, एक-एक देश में अनेक धर्मों के होने तथा धार्मिक भावों की प्रधानता से देश के व्यापार, कला-कौशल और सभ्यता की उन्नति में रूकावट पड़ने से, अंत में धीरे-धीरे धर्म का पक्षपात कम हो चला और लोगों के सामने  देश-प्रेम का स्वाभाविक आदर्श सामने आ गया | जो प्राचीन काल में धर्म के नाम पर कटते-मरते थे, आज उनकी संतति देश के नाम पर मरती है | पुराने अच्छे थे या ये नये, इस पर बहस करना फिजूल ही है, पर उनमें भी जीवन था और इनमें भी जीवन है | वे भी त्याग करना जानते थे और ये भी और उन अभागों से लाख दर्जे अच्छे और सौभाग्यवान हैं जिनके सामने कोई आदर्श नहीं और जो हर बात में मौत से डरते हैं | ये पिछले आदमी अपने देश के बोझ और अपनी माता की कोख के कलंक हैं | देश-प्रेम का भाव इंग्लैंड में उस समय उदय हो चूका था, जब स्पेन के कैथोलिक राजा फिलिप ने इंग्लैंड पर अजेय जहाजी बेड़े आरमेड़ा द्वारा चढ़ाई की थी, क्योंकि इंग्लैंड के कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, दोनों प्रकार के ईसाइयों ने देश के शत्रु का एक-सा स्वागत किया | फ़्रांस की राज्यक्रांति ने राष्ट्रीयता को पूरे वैभव से खिला दिया | इस प्रकाशमान रूप को देखकर गिरे हुए देशों को आशा का मधुर सन्देश मिला | १९वीं  शताब्दी थी | वर्तमान जर्मनी का उदय इसी शताब्दी में हुआ | पराधीन इटली ने स्वेच्छाचारी आस्ट्रिया के बन्धनों से मुक्ति पाई | यूनान को स्वाधीनता मिली और बालकन के यूनान को स्वाधीनता मिली और बालकन के अन्य राष्ट्र भी कब्रों से सर निकाल कर उठ पड़े | गिरे हुए पूर्व ने भी अपने विभूति दिखाई | बाहर वाले उसे दोनों हाथों से लूट रहे थे | उसे चैतन्यता प्राप्त हुई | उसने अँगड़ाई ली और चोरों के कान खड़े हो गये | उसने संसार की गति की ओर दृष्टि फेरी | देखा, संसार को एक नया प्रकाश मिल गया है और जाना कि स्वार्थपरायणता के इस अंधकर को बिना उस प्रकाश के पार करना असम्भव है |
     उसके मन में हिलोरें उठीं और अब हम उन हिलोरों के रत्न देख रहे हैं | जापान एक रत्न है-ऐसा चमकता हुआ कि  राष्ट्रीयता उसे कहीं भी पेश कर सकती है | लहर रुकी नहीं | बढ़ी और खूब बढ़ी | अफीमची चीन को उसने जगाया और पराधीन भारत को उसने चेताया | फारस में उसने जागृति फैलाई और एशिया के जंगलों और खोहों तक में राष्ट्रीयता की प्रतिध्वनि इस समय किसी न किसी रूप में उसने पहुँचाई | यह संसार की लहर है | इसे रोका नहीं जा सकता | वे स्वेच्छाचारी अपनी हाथ तोड़ लेंगे-जो उसे रोकेंगे और उन मुर्दों की खाक का भी पता नहीं लगेगा - जो इसके सन्देश को नहीं सुनेगे | भारत में हम राष्ट्रीयता की पुकार सुन चुके हैं | हमें भारत के उच्च और उज्वल भविष्य का विश्वास है | हमें विश्वास है कि हमारी बाढ़ किसी के रोके नहीं रुक सकती | रास्ते में रोकने वाली चट्टानें आ सकती हैं | बिना चट्टानें पानी की किसी बाढ़ को  नहीं टोक सकतीं, परन्तु एक बात है, हमें जान-बूझकर मूर्ख नहीं बनना चाहिए | ऊटपटांग रास्ते नहीं नापने चाहिए |
     कुछ लोग 'हिन्दू राष्ट्र' -'हिन्दू राष्ट्र' चिल्लाते हैं | हमें क्षमा किया जाय, यदि हम कहें-नहीं, हम इस बात पर जोर दें- कि वे एक बड़ी भारी भूल कर रहे हैं और उन्होंने अभी तक 'राष्ट्र शब्द के अर्थ ही नहीं समझे | हम भविष्यवक्ता नहीं, पर अवस्था हमसे कहती है कि अब संसार में 'हिन्दू राष्ट्र' नहीं हो सकता, क्योंकि राष्ट्र का होना उसी समय संभव है, जब देश का शासन देशवालों के हाथ में हो और यदि मान लिया जाय कि आज भारत स्वाधीन हो जाये, या इंग्लैंड उसे औपनिवेशिक स्वराज्य दे दे, तो भी हिन्दू ही भारतीय राष्ट्र के सब कुछ न होंगे और जो ऐसा समझते हैं- हृदय से या केवल लोगों को प्रसन्न करने के लिए-वे भूल कर रहे हैं और देश को हानि पहुँचा रहे हैं | वे लोग भी इसी प्रकार की भूलकर रहे हैं जो टर्की या काबुल, मक्का या जेद्दा का स्वप्न देखते हैं, क्योंकि वे उनकी जन्मभूमि नहीं और इसमें कुछ भी कटुता न समझे जानी चाहिए, यदि हम यह कहें कि उनकी कब्रें इसी देश में बनेंगी और उनके मरिसेये- यदि वे इस योग्य होंगे तो - इसी देश में गाये जायेंगे, परन्तु हमारा प्रतिपक्षी, नहीं, राष्ट्रीयता का विपक्षी मुँह बिचका कर कह सकता है कि राष्ट्रीयता स्वार्थों की खान है | देख लो इस महायुद्ध को और इंकार करने का साहस करो की संसार के राष्ट्र पक्के स्वार्थी नहीं है ? लोहे से डॉक्टर का घाव चीरने वाला चाकू और रेल की पटरियाँ बनती हैं और इसी लोहे से हत्यारे का छूरा और लड़ाई की तोपें भी बनती हैं | सूर्य की प्रकाश फूलों को रंग-बिरंगा बनाता है पर वह बेचारा मुर्दा लाश का क्या करें, जो उसके लगते ही सड़कर बदबू देने लगती है | हम राष्ट्रीयता के अनुयायी हैं, पर वही हमारी सब कुछ नहीं, वक केवल हमारे देश की उन्नति का उपाय-भर है |
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